तिब्बत के मार्फत यूरोप की पड़ताल

  • 2016-09-26 06:30:15.0
  • डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री
तिब्बत के मार्फत यूरोप की पड़ताल

सम्मेलन का आयोजन यूरोपीय संसद में ही काम कर रहा तिब्बत इंट्रेस्ट ग्रुप करवा रहा था । उनके साथ कुछ और समूह भी जुड़ गए थे । जिनमें से आईसीटी प्रमुख कहा जा सकता है । आईसीटी यानी इंटरनेशनल कैंपेन फार तिब्बत । इस संस्था के प्रधान आजकल रिचर्ड गेरे हैं । इस तिब्बत सम्मेलन का उद्घाटन दलाईलामा ने किया । समय- समय की बात है । कुछ साल पहले भी इसी बेल्जियम में अंतरराष्ट्रीय तिब्बत सम्मेलन था । यहां की सरकार ने चीन के दबाव में आकर ऐन वक्त पर दलाईलामा को वीजा देने से इनकार कर दिया था । इस बार दलाईलामा को वीजा दिया गया । शायद दक्षिण चीन सागर में चीन की दादागिरी के खिलाफ अमरीका के साथ इक_े होने की कोई यूरोपियन नीति हो.

बेल्जियम को यूरोप का केंद्र माना जाता है । शायद यही कारण रहा होगा कि यूरोपियन यूनियन यानी यूरोप संघ का कार्यालय और संसद बेल्जियम में स्थापित की गई हो। ब्रसल्ज में यूरोपीय यूनियन की संसद है। इसी ब्रसल्ज में तिब्बत को लेकर आठ सितंबर से दस सितंबर तक का तीन दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हो रहा था। हिंदोस्तान से पांच प्रतिनिधि आमंत्रित थे। हुबली के अमृत जोशी किसी कारणवश जा नहीं रहे थे। इसलिए बचे हम चार। हिंदोस्तान के कोर गु्रप फार तिब्बतन कॉज के अध्यक्ष रिंचन खांडू खिरमे, गांधी शांति प्रतिष्ठान के पूर्व सचिव सुरेंद्र कुमार, कोर ग्रुप के ही अरविंद निकोसे और मैं। भारत तिब्बत सहयोग मंच की ओर से मेरी पत्नी डा. रजनी गंगाहर जा रही थी। यह अलग बात है कि कि उसका पूरा खर्चा मुझे ही करना था क्योंकि आधिकारिक तौर पर आयोजक चार प्रतिनिधियों की व्यवस्था करने के लिए सहमत थे। रजनी ने तिब्बत समस्या पर ही अपना शोध प्रबंध लिखा है, इसलिए मैंने सोचा उसका इस सम्मेलन में जाना लाभकारी ही होगा। सम्मेलन का आयोजन यूरोपीय संसद में ही काम कर रहा तिब्बत इंट्रेस्ट ग्रुप करवा रहा था। उनके साथ कुछ और समूह भी जुड़ गए थे। जिनमें से आईसीटी प्रमुख कहा जा सकता है। आईसीटी यानी इंटरनेशनल कैंपेन फार तिब्बत। इस संस्था के प्रधान आजकल रिचर्ड गेरे हैं। इस तिब्बत सम्मेलन का उद्घाटन दलाईलामा ने किया। समय- समय की बात है। कुछ साल पहले भी इसी बेल्जियम में अंतरराष्ट्रीय तिब्बत सम्मेलन था। यहां की सरकार ने चीन के दबाव में आकर ऐन वक्त पर दलाईलामा को वीजा देने से इनकार कर दिया था। इस बार दलाईलामा को वीजा दिया गया। शायद दक्षिण चीन सागर में चीन की दादागिरी के खिलाफ अमरीका के साथ इक्कठे होने की कोई यूरोपियन नीति हो।

हमारा जहाज अल अमीरात कंपनी का था। अंग्रेजी में अमीरात को एमीरेट्स कहते हैं। अपना अपना उच्चारण और उद्देश्य है। जैसे फ्रांस का पारी अंग्रेजी में पेरिस हो जाता है। ओसमान ओटोमन बन जाता है। मजारसकी हंगरी हो जाता है और भारत इंडिया बन जाता है। विषयांतर हो रहा है। हमारे जहाज को दिल्ली से चल कर दुबई पहुंचना था और वहां से नया जहाज पकड़ कर ब्रसल्ज पहुंचना था। लेकिन हमारा जहाज दिल्ली से ही आधा पौने घंटा देर से चला। लगता था इस जहाज में यात्रा कर रहे अधिकांश यात्रियों को कहीं न कहीं आगे ही जाना था। यही जहाज लेट था तो आगे के जहाज  भाग कर ही पकड़े जा सकते थे। इसलिए जैसे ही यात्री एयरपोर्ट पर पहुंचे एयरलाइन की लडकियां चिल्ला रहीं थीं- बारसीलोना, बारसीलोना। ब्रसल्ज, ब्रसल्ज। न्यूयार्क, न्यूयार्क। जालंधर के बस स्टैंड का दृश्य था, जहां बसों के कंडक्टर शहरों का नाम ले लेकर सवारियों की तलाश करते हैं।

यहां अंतर केवल इतना था कि सवारियां निश्चित थीं,अब उनको केवल शहरों के अनुसार छांटना मात्र था। भागते दौड़ते हम अपने अगले जहाज तक पहुंच ही गए। यह कहने की जरूरत ही नहीं कि दुबई के एयरपोर्ट पर ही हमें अपने तक पहुंचने के लिए रेल यात्रा भी करनी पड़ी और बस यात्रा भी। यह हवाई अड्डा बहुत बड़ा है। 

हम तो दौड़ते भागते जहाज तक पहुंच गए, लेकिन हमारा सामान उतनी भागदौड़ नहीं कर सका। आखिर सामान ही तो ठहरा। आदमी और सामान का क्या मुकाबला? जब जहाज ब्रसल्ज के नजदीक पहुंचा, तो हमारे नामों की घोषणा की गई। मुझे लगा इस देश में भारतीयों का खास सम्मान किया जाता है। लेकिन वह सम्मान नहीं था बल्कि हमारा सामान दुबई से नहीं आ सका था, इस रहस्य की घोषणा की जा रही थी। खैर दूसरे दिन सामान आ गया और बाकायदा तिब्बत पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भी शुरु हो गया। दलाईलामा ने उसका उद्घाटन किया। यूरोपियन यूनियन संसद के कुछ सदस्य आए हुए थे। जर्मन संसद की उप सभापति भी थीं। रिचर्ड गेरे तो थे ही। पचास देशों से 250 प्रतिनिधि आए हुए थे। वहीं सोनम मिल गए जो कभी अरुणाचल प्रदेश में तिब्बत कल्याण अधिकारी रहे थे। उन्होंने रिंचन खांडू खिरमे को पहचान लिया। उन्होंने हमें ब्रसल्ज के लगभग सभी प्रसिद्ध स्थान दिखा दिए। मेट्रो का किराया लेने से भी इनकार कर दिया। कहने लगे भारत ने तिब्बत के लिए इतना कुछ किया है। बेल्जियम में भारतीयों की कुछ मदद कर देता हूं, तो बहुत संतुष्टि मिलती है।  बेल्जियम और तिब्बत सम्मेलन की बातें कभी बाद में। दस सितंबर को सम्मेलन समाप्त हुआ। मैं और रजनी दोनों बस पकड़ कर पेरिस की ओर चल दिए। बस तक पहुंचाने के लिए भी सोनम ला आए हुए थे। अलबत्ता बार- बार संकेत देते रहे कि अपना बैग संभाल कर रखो, क्योंकि यहां लोग बैग छीनने में बिलकुल भी समय नहीं लगाते।

सोनम ला को भी बेल्जियम में रहते हुए पंद्रह साल हो गए हैं। ब्रसल्ज से पेरिस का सफर बस में लगभग तीन घंटों का है, लेकिन जैसे ही बस फ्रांस की सीमा में दाखिल हुई पुलिस ने उसे रोक लिया। तलाशी इतनी सघन कि एक- एक कपड़ा जांचा गया। सूंघने के लिए कुत्ता तो था ही। सारा यूरोप आतंकवाद की गिरफ्त में है। पेरिस में रजनी की मौसी के सुपुत्र दुर्लभ चंद्र पिछले पचास साल से रहते हैं, लेकिन वह दूसरे दिन कनाडा से आने वाले थे। घर में उनकी बेटी नेहा अपने दो छोटे बच्चों के साथ थी। उसने हमें कहा था कि जैसे ही हम पेरिस के बस स्टेशन पर पहुंच जाएं,  तो उसे तुरंत फोन कर दें। वह लेने आ जाएगी। हमने बस स्टेशन पहुंच कर इस लिए फोन करना मुनासिब नहीं समझा कि अचानक घर के दरवाजे पर पहुंच कर सरप्राइज देंगे। हमने टैक्सी वाले को घर का पता दिया तो उसने जीपीएस के पीछे चलते हुए हमें वांछित घर के दरवाजे पर पहुंचा दिया। जैसे ही हमने टैक्सी के बाहर पैर रखा तो नेहा का फोन आया, आप कहां हो? हमने सोचा घर के अंदर से फोन कर रही होगी। इसलिए इत्मीनान से कहा, आपके घर के आगे। तो उसने आश्चर्य से उत्तर दिया, लेकिन मैं तो आपको लेने के लिए (गारे दे नारदू) पर खड़ी हूं।
हम उसे सरप्राइज देने निकले थे, उसने हमें ही सरप्राइज दे दिया। मैं अठारहवीं शताब्दी के अंतिम दो दशकों के फ्रांस का साक्षी बनना चाह रहा हूं।

उस समय फ्रांस में लुई सोलहवें का राज्य था। देश की आर्थिक स्थिति बद से बदतर होती जा रही थी। ऐसा नहीं कि औद्योगिक क्रांति के चलते देश में आर्थिक समृद्ध नहीं आई थी, लेकिन उसका मोटा हिस्सा पादरी वर्ग और कुलीन वर्ग ने ही पचा लिया था। जनसाधारण, खासकर किसानों में असंतोष बढ़ता जा रहा था। इसके चलते देश में टैक्स सुधार की चर्चा होने लगी थी। पादरी और कुलीन वर्ग चौकन्ना हो गया था कि कहीं उनको भी टैक्सों के घेरे में न ले लिया जाए। असंतोष और शोर के उन्हीं स्वरों के बीच लुई सोलहवें ने 4 मई, 1789 को एस्टेटस-जनरल की बैठक वर्साय में बुला ली। एस्टेटस जनरल की यह बैठक 1614 के बाद पहली बार बुलाई गई थी। एस्टेटस जनरल को हिंदी में क्या कहा जा सकता है? शायद अनुवाद संभव न हो, इसे केवल उदाहरण और दृष्टांत से समझाया ही जा सकता है। एस्टेटस जनरल स्पष्ट ही तीन श्रेणियों में विभक्त थीं। पहला वर्ग पादरी वर्ग, दूसरा कुलीन वर्ग और तीसरा जन साधारण का वर्ग। पादरी, फ्रांसीसियों और भगवान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाते थे। इसलिए वे भी सांसारिक टैक्सों से मुक्त थे। लेकिन पादरी वर्ग में भी आगे दो उप वर्ग थे।