साइबर सुरक्षा की चुनौती अभी बाकी

  • 2016-12-22 11:00:45.0
  • डॉ. अश्विनी महाजन

साइबर सुरक्षा की चुनौती अभी बाकी

विकसित देशों में 75 प्रतिशत तक लेन-देन नकदी रहित होते हैं, जबकि भारत में 25 प्रतिशत से भी कम लेन-देन ही नकदी रहित हैं। हमारे देश में लंबे समय से लोगों में नकदी भुगतान की आदत है। विकसित देशों में धीरे-धीरे कर यह आदत बदली है। भारत में भी यह आदत रातोंरात नहीं, बल्कि धीरे-धीरे ही बदलेगी। सरकार द्वारा नकदी रहित लेन-देन के फायदे गिनाने के साथ-साथ, नकदी रहित लेन-देन से जुड़ी समस्याओं से निपटने हेतु देश में सख्त साइबर नियम बनाने भी उतने ही जरूरी हैं।


यदि आज से 15 साल पहले कोई बिना नकदी के भुगतान की बात सोचता था, तो उसके जहन में केवल चेक द्वारा भुगतान या क्रेडिट कार्ड का ही ध्यान आता था। क्रेडिट कार्ड भी भारत केंद्रित व्यवस्था नहीं थी। दुनिया में मात्र तीन ही बड़ी कंपनियां थीं, जो क्रेडिट कार्ड के माध्यम से राशि अंतरित करती थीं। हालांकि क्रेडिट कार्ड अधिकतर बैंकों के माध्यम से जारी होते थे, लेकिन उन्हें पूरा करने के काम को वीजा, मास्टर कार्ड और मॉस्ट्रो जैसी कंपनियां अंजाम देती थीं। अपनी जमा राशि को निकालने के लिए हमेशा बैंक में जाना पड़ता था। समय बदला और अब लोग पैसा निकालने के लिए बैंक नहीं जाते तथा आज पैसा एक खाते से दूसरे के खाते में भेजने के लिए चेक का काम और ऑनलाइन तरीकों को इस्तेमाल ज्यादा होने लगा है। नवंबर 8, 2016 से 500 व 1000 के नोटों के चलन को बंद करने और उसके बदले नई करंसी देने में देरी होने के चलते आज लोग मजबूरी में ही सही, लेकिन गैर नकदी लेन-देन के तरीके अपना रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि आज आपका मोबाइल फोन ही बैंक बन सकता है। मोबाइल फोन पर ऐप डाउनलोड कीजिए और घर बैठे अपने खाते की जानकारी लीजिए, अपने बिल भुगतान कीजिए या कोई और भुगतान। उधर ऑनलाइन भुगतानों के काम को आसानी से अंजाम देने के लिए कई सेवा प्रदान करने वाली कई कंपनियां जैसे पेटीएम, फ्रीचार्ज, रिचार्ज इत्यादि बाजार में उतर आई हैं। इनकी इस सेवा को 'प्रीपेड इंस्ट्रूमेंट' के नाम से जाना जाता है, जिसकी अनुमति कुछ शर्तों के साथ भारतीय रिजर्व बैंक देता है। बाजार में कुछ खरीदने जाएं, तो आपको नकद जेब में रखने की जरूरत नहीं। छोटे-छोटे दुकानदार जो क्रेडिट कार्ड की स्वाइप मशीन नहीं रखते, अब इन कंपनियों के माध्यम से भुगतान प्राप्त करने लगे हैं।

देश में यह सब इसलिए संभव हो पाया है, क्योंकि प्रौद्योगिकी के विकास से सेवाएं हमारे मोबाइल से जुड़ गई हैं। मोबाइल और उस पर भी स्मार्ट फोनों के माध्यम से अब ऑनलाइन लेन-देन संभव हो गए हैं। लोगों को बैंकिंग सुविधा उपलब्ध कराने और सभी सरकारी सबसिडी को सीधे लाभार्थी के खाते में भेजने की योजना को कार्य रूप देने के लिए अब देश में लगभग 90 प्रतिशत गृहस्थों के पास एक बैंक खाता है। जन-धन खाता योजना, जिनके पास बैंक खाता नहीं था, उनके जीरो बैलेंस बैंक खाता खोलने की योजना के चलते अभी तक लगभग 26 करोड़ बैंक खाते खुल चुके हैं। वे सभी एक एटीएम कार्ड पाने के अधिकारी हैं, जिससे देश भर के 2.5 लाख एटीएम में से किसी भी एक से पैसा निकाला जा सकता है। आज हमारे देश में 104 करोड़ से ज्यादा मोबाइल कनेक्शन हैं, जिसका मतलब यह है कि हमारा मोबाइल टेली घनत्व 80 से भी ज्यादा हो गया है। उसमें से लगभग 37 प्रतिशत इंटरनेट का उपयोग करते हैं। यानी नकदी रहित लेन-देन के लिए आवश्यक व्यवस्था हमारे देश में निर्माण हो रही है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में निरक्षरता और इंटरनेट सुविधाओं और बिजली जैसी आवश्यक अवसंरचना की कमी नकदी रहित लेन-देन की राह में सबसे बड़ी बाधा रहेगी।

उधर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार नकदी रहित लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए तमाम प्रयास कर रही है। इस सरकार के कार्यभार संभालने के बाद अभी तक 'रूपे' के नाम से लगभग 35 करोड़ डेबिट कार्ड जारी हो चुके हैं, जो स्वदेशी व्यवस्था पर आधारित हैं। गौरतलब है कि इससे पहले सभी डेबिट और क्रेडिट कार्ड विदेशी कंपनियों जैसे वीजा, मास्टर कार्ड, मॉस्ट्रो इत्यादि के नाम पर जारी होते थे, जिनकी फीस की भारी रकम विदेशों को अंतरित हो जाती थी। पिछले कुछ दिनों में नकदी रहित लेन-देन हेतु सरकारी बैंकों और सरकार द्वारा कई योजनाएं लागू करने की कवायद हुई है। यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) के नाम से एक स्कीम जारी हुई है, जिसके अनुसार नकदी रहित लेन-देन को एक बड़ा प्रोत्साहन मिल सकता है, क्योंकि इसके माध्यम से एक बैंक से दूसरे बैंक राशि भी अंतरित हो सकती है। एक ओर डेबिट और क्रेडिट कार्ड का चलन बढ़ रहा है, दूसरी ओर उसके खतरे उससे भी तेजी से बढ़ रहे हैं। 2016 के अक्तूबर माह में 32 लाख डेबिट कार्डों की गुप्त जानकारियां हैकरों द्वारा चुरा ली गईं और कई खातों से पैसा भी चुरा लिया गया। स्टेट बैंक, आईसीआईसीआई, एचडीएफसी समेत कई बैंकों के खातेदारों के पैसे हैकरों द्वारा निकाल लिए गए। पिछले दिनों प्रीपेड पेमेंट इंस्ट्रूमेंट जैसे पेटीएम और अन्य कंपनियों में चीनी कंपनियों की भागीदारी और उनके साथ खुफिया जानकारियां साझा करने की कवायद के मामले भी सामने आ रहे हैं। इस प्रकार नकदी रहित लेन-देन में संभावित खतरे दिखाई दे रहे हैं। आए दिन ट्विटर हैंडलों और ई-मेल के हैक होने की खबरें तो हम सुनते ही रहते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि नकदी रहित लेन-देन, जिसे बढ़ावा देने की बात हो रही है, वह कहां तक सुरक्षित है। यदि नकदी रहित लेन-देन को बढ़ावा देना सौदों में कशलता लाने के लिए जरूरी है तो इन समस्याओं से निपटना भी उतना ही आवश्यक है।

गौरतलब है कि इस साल जुलाई में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार देश में एटीएम और पीओएस टर्मिनल (स्वाईप मशीन) इत्यादि के माध्यम से 88 करोड़ लेन-देन हुए, लेकिन उनमें से 92 प्रतिशत एटीएम से नकद निकासी ही थी। लेकिन नोटबंदी के बाद एटीएम से संबंधित समस्याओं को देखते हुए नकदी रहित लेन-देन में एटीएम के योगदान पर एक सवालिया निशान जरूर लगता है। विकसित देशों में 75 प्रतिशत तक के लेन-देन नकदी रहित होते हैं, जबकि भारत में 25 प्रतिशत से भी कम लेन-देन ही नकदी रहित हैं। नकदी की कमी के चलते आज लोग ई-वॉलेट, प्रीपेड पेमेंट इंस्ट्रूमेंट, क्रेडिट कार्ड इत्यादि से भुगतान करने के लिए बाध्य हो रहे हैं। ऐसे लोग जो इस प्रकार की व्यवस्था के अभ्यस्त नहीं हैं, उन्हें काफी कठिनाई भी हो रही है। हमारे देश में लंबे समय से लोगों में नकदी भुगतान की आदत है। विकसित देशों में धीरे-धीरे कर यह आदत बदली है। भारत में भी यह आदत रातोंरात नहीं, बल्कि धीरे-धीरे ही बदलेगी। सरकार द्वारा नकदी रहित लेन-देन के फायदे गिनाने के साथ-साथ, नकदी रहित लेन-देन से जुड़ी समस्याओं एवं अपराधों से निपटने हेतु देश में सख्त साइबर नियम बनाने भी उतने ही जरूरी हैं। हमारे वित्तीय लेन-देन से संबंधित अधिकांश काम विदेशी ऑपरेटिंग सिस्टम पर होते हैं, जो हमारे लिए पूरी तरह से सुरक्षित नहीं है।