चल रही है हिंदुओं का नामोनिशान मिटाने की साजिश

  • 2016-11-30 11:30:00.0
  • मनोज शास्त्री
चल रही है हिंदुओं का नामोनिशान मिटाने की साजिश

''सर्वधर्म समभाव'' और ''वसुधैव कुटुंबकम'' को जीवन का आधार मानने वाले हिंदुओं की स्थिति उन देशों में काफी बदतर है जहां वे अल्पसंख्यक हैं। भारत से बाहर रह रहे हिन्दुओं की आबादी लगभग 20 करोड़ है। सबसे ज्यादा खराब स्थिति दक्षिण एशिया के देशों में रह रहे हिंदुओं की है। दक्षिण एशियाई देशों, बांग्लादेश, भूटान, पाकिस्तान और श्रीलंका के साथ-साथ फिजी, मलेशिया, त्रिनिनाद-टोबेगो में हाल के वर्षों मे हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ अत्याचार के मामले बढ़े हैं। इनमे जबरन मतांतरण, यौन उत्पीडऩ, धार्मिक स्थलों पर आक्रमण, सामाजिक भेदभाव, संपत्ति हड़पना आदि शामिल हैं। कुछ देशों में राजनीतिक स्तर पर भी हिंदुओं के साथ भेदभाव की शिकायतें सामने आयी हैं। 

हिंदू अमेरिकन फाउन्डेशन की आठवीं वार्षिक मानवाधिकार रिपोर्ट से इसका खुलासा हुआ। यह रिपोर्ट 2011 की है। जिसे हाल ही में जारी किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान में 1947 में कुल आबादी का 25 प्रतिशत हिंदू थे। अभी इनकी जनसंख्या कुल आबादी का मात्र 1.6 प्रतिशत रह गयी है। वहां गैर मुस्लिमों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार हो रहा है। 24 मार्च 2005 को पाकिस्तान में नये पासपोर्ट में धर्म की पहचान को अनिवार्य कर दिया गया है। स्कूलों में इस्लाम की शिक्षा दी जाती है। गैर मुस्लिमों खासकर हिंदुओं के साथ असहिष्णु व्यवहार किया जाता है। जनजातीय बहुल इलाकों में अत्याचार ज्यादा है। इन क्षेत्रों में इस्लामिक कानून लागू करने का भारी दबाव है। हिंदू युवतियों और महिलाओं के साथ दुष्कर्म, अपहरण की घटनाएं आम हैं। उन्हें इस्लामिक मदरसों में रखकर जबरन उनका मतांतरण का दबाव डाला जाता है। गरीब हिंदू तबका बंधुआ मजदूर की तरह जीने को मजबूर है। 

1. बांग्लादेश-  एक आंकड़े के अनुसार पिछले 25 वर्षों में बांग्लादेश से लगभग 55 से 60 लाख हिंदू पलायन करके भारत आ चुके हैं। एक प्रतिष्ठित पत्रिका के अनुसार बांग्लादेश के अंदर झूठी रिपोर्टस के आधार पर हिंदुओं की संख्या बढ़ाने का कार्य किया जा रहा है। एक कड़वा सच यह है कि बांग्लादेश को जब सन् 1988 में मुस्लिम देश घोषित किया गया तबसे यह देश हिंदुओं की संख्या कम करने पर ध्यान केंद्रित करता रहा है। बांग्लादेश ने वेस्टेड प्रापर्टीज रिटर्न (एमेंडमेंट) बिल 2011 को लागू किया है। जिसमें जब्त की गयी या मुसलमानों द्वारा कब्जाई गयी हिंदुओं की जमीन को वापस लेने के लिए क्लेम करने का अधिकार नहीं है। इस बिल के पारित होने के बाद हिंदुओं की जमीन कब्जा करने की प्रवृत्ति बढ़ी है, और इसे सरकारी संरक्षण भी मिल रहा है। इसका विरोध करने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों पर जुल्म ढाये जाते हैं। जो पिछले कुछ समय से काफी अधिक बढ़ गयी है। अभी हाल ही में बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले की घटनाएं इस हद तक बढ़ गयीं कि बांग्लादेश की मानवाधिकार आयोग(एनएचआरसी) को हस्तक्षेप करते हुए कहना पड़ा कि ब्राह्मणबरिया के नसीरनगर में हिंदू समुदाय पर बड़े पैमाने पर किये गये हमले सुनियोजित थे। एनएचआरसी की एक समिति के प्रमुख इनामुल हक चौधरी ने दैनिक समाचार प़त्र ''द डेली स्टार'' से कहा कि क्षेत्र के दौरे के दौरान उन्होंने पाया कि हमले सुनियोजित थे। तीन सदस्यीय समिति नसीरपुर पहुंची और हमलों को लेकर मंदिर के पुजारियों और चश्मदीदों से बातचीत की। 

हमले में कम से कम पांच मंदिरों में तोडफ़ोड़ की गयी थी और हिंदुओं के लगभग 100 घरों में लूटपाट की गयी थी। भारतीय उच्चायोग के एक प्रतिनिधिमंडल ने प्रथम सचिव राजेश उइके के नेतृत्व में प्रभावित स्थलों का दौरा किया। डेली स्टार के मुताबिक एनएचआरसी और भारतीय उच्चायोग के प्रतिनिधिमंडल का दौरा तब हुआ है जब अज्ञात अपराधियों ने चटगांव जिले के हाथाजारी उपजिला में मां दुर्गा की मूर्ति तोड़ दी और एक मंदिर के कीमती सामान लूट लिए। रसराज दास नाम के व्यक्ति ने फेसबुक पृष्ठ पर कथित रूप् से मुस्लिम भावनाओं को आहत करने वाली सामग्री पोस्ट की थी। इसके बाद डंडे और धारदार हथियारों से लैस करीब 200 धार्मिक कट्टरवादियों ने ब्राह्मणबरिया के नसीरनगर के अनेक इलाकों में कम से कम पांच मंदिरों पर हमले किये और हिंदुओं के करीब 100 घरों में तोडफ़ोड़ और लूटपाट की और सैंकड़ों लोगों की पिटाई भी की।  

2. पाकिस्तान- हिंदू अमेरिकन फाउन्डेशन की आठवीं वार्षिक मानवाधिकार रिपोर्ट से इसका खुलासा हुआ। यह रिपोर्ट 2011 की है। जिसे हाल ही में जारी किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान में 1947 में कुल आबादी का 25 प्रतिशत हिंदू थे। अभी इनकी जनसंख्या कुल आबादी का मात्र 1.6 प्रतिशत रह गयी है। वहां गैर मुस्लिमों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार हो रहा है। 24 मार्च 2005 को पाकिस्तान में नये पासपोर्ट में धर्म की पहचान को अनिवार्य कर दिया गया है। स्कूलों में इस्लाम की शिक्षा दी जाती है। गैर मुस्लिमों खासकर हिंदुओं के साथ असहिष्णु व्यवहार किया जाता है। जनजातीय बहुल इलाकों में अत्याचार ज्यादा है। इन क्षेत्रों में इस्लामिक कानून लागू करने का भारी दबाव है। हिंदू युवतियों और महिलाओं के साथ दुष्कर्म, अपहरण की घटनाएं आम हैं। उन्हें इस्लामिक मदरसों में रखकर जबरन उनका मतांतरण का दबाव डाला जाता है। गरीब हिंदू तबका बंधुआ मजदूर की तरह जीने को मजबूर है। हिंदू अमेरिकन फाउन्डेशन की आठवीं वार्षिक मानवाधिकार रिपोर्ट में जम्मू-कश्मीर में हिंदुओं के खिलाफ हो रहे अत्याचार का भी जिक्र है। पाकिस्तान ने कश्मीर के 35 फीसदी भू-भाग पर अवैध तरीके से कब्जा कर रखा है। 
1980 के दशक से यहां पाकिस्तान समर्थित आतंकी सक्रिय हैं। कश्मीर घाटी से अधिकांश हिंदू आबादी का पलायन हो चुका है। तीन लाख से ज्यादा कश्मीरी हिंदू अपने ही देश में शरणार्थी के तौर पर रह रहे हैं। कश्मीरी पंडित रिफ्यूजी कैंप में बदतर ििस्थ्त में रहने को मजबूर हैं। 

3. बहु-धार्मिक, बहु-सांस्कृतिक और बहुभाषी देश कहे जाने वाले भूटान में भी हिंदुओं के खिलाफ अत्याचार हो रहा है। 1990 के दशक में दक्षिण और पूर्वी इलाके से एक लाख हिंदू अल्पसंख्यकों और नियंगमापा बौद्धों को बेदखल कर दिया गया। 
मलेशिया घोषित इस्लामी देश है इसलिये वहां की हिंदू आबादी को अकसर भेदभाव का सामना करना पड़ता है। मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थानों को अक्सर निशाना बनाया जाता हैै। सरकार मस्जिदों को सरकारी जमीन और मदद मुहैया कराती है, लेकिन हिंदू धार्मिक स्थानों के साथ इस नीति को अमल में नहीं लाती, लेकिन हिंदू धार्मिक स्थानों के साथ इस नीति को अमल में नहीं लाती। हिंदू पर कार्यकर्ताओं पर तरह-तरह के जुल्म होते हैं और उन्हें कानूनी मामलों में जबरन फंसाया जाता है। उन्हें शरीयत अदालतों में पेश किया जाता है। सिंहली बहुल श्रीलंका में भी हिंदूओं के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है।पिछले कई दशकों से हिंदूओं और तमिलों पर हमले हो रहे हैं।हिंसा के कारण उन्हें लगातार पलायन का दंश झेलना पड़ रहा है। ंिहंदू संस्थानों को सरकारी संरक्षण नहीं मिलता।

यह चिंता की बात है कि दक्षिण एशिया में रह रहे हिंदूओं पर अत्याचार के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन चंद मानवाधिकार संगठनों की बात छोड़ दें तो वहां रह रहे हिंदुओं के हितों की रक्षा के लिए आवाज उठाने वाला कोई नहीं है। जिस तरह से श्रीलंका में तमिलों के मानवाधिकार हनन के मुद्दे पर अमेरिका,फ्रांस और नार्वे ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में प्रस्ताव रखा और तमिल राजनीतिक दलों के दबाव में ही सही भारत को प्रस्ताव के पक्ष में वोट डालना पड़ा उसी तरह की पहल भारत को भी दक्षेस के मंच पर तो करनी ही चाहिए।
 (वरिष्ठ पत्रकार कमलेश रघुवंशी की फेसबुक वाल से)