विचारणीय और दुखद : अन्न की बर्बादी और भूखी आबादी

  • 2016-09-27 09:00:45.0
  • संजीव पांडेय
विचारणीय और दुखद : अन्न की बर्बादी और भूखी आबादी

संजीव पांडेय
एक तरफ देश में लोग भूख से मर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रति वर्ष 670 लाख टन खाद्य पदार्थ बर्बाद हो रहा है। एक सरकारी अध्ययन के अनुसार ब्रिटेन के कुल उत्पादन के बराबर भारत में अनाज बर्बाद हो रहा है। यानी लगभग बानबे हजार करोड़ रुपए का खाद्य पदार्थ हर साल बर्बाद हो जाता है। खाद्य पदार्थों की जितनी बर्बादी इस देश में प्रतिवर्ष हो रही है उससे पूरे बिहार की आबादी को एक साल खिलाया जा सकता है। भारत सरकार के सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्ट हार्वेस्ट इंजीनियरिंग ऐंड टेक्नोलॉजी के एक अध्ययन के मुताबिक उचित भंडारण की कमी ने देश में खाद्यान्न की बर्बादी को बढ़ाया है। खाद्य वस्तुओं की बर्बादी का सीधा असर किसानों पर पड़ रहा है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था को भी नुकसान दे रहा है। इससे जहां एक तरफ महंगाई बढ़ रही है, वहीं किसानों को निवेश पर लाभ तो क्या, लागत भी वसूल नहीं हो पा रही है। देश के कई राज्यों में किसान घाटे की खेती के कारण आत्महत्या करने को बाध्य हो रहे हैं। महाराष्ट्र, पंजाब, गुजरात जैसे राज्यों से किसानों की आत्महत्या की खबरें आती रहती हैं। खाद्य पदार्थ न मिलने के कारण भूख से मरने वालों की समाचार भी मिलते हैं। यही नहीं, भूख से पीडि़त भीड़ द्वारा सार्वजनिक वितरण प्रणाली की दुकानों की लूट की खबरें भी आ रही हैं। उत्तर प्रदेश के बांदा जिले से एक खबर हाल ही में आई कि भूख से परेशान महिलाओं की एक भीड़ ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली के दुकानों को लूट दिया।

भारत में खाद्य पदार्थों की महंगाई बढ़ाने में मुख्य भूमिका फलों, सब्जियों और दालों की है। अध्ययन के मुताबिक सही भंडारण के अभाव में प्याज, सब्जियों और दालों की बर्बादी ज्यादा हो रही है। अगर अध्ययन पर भरोसा करें तो दस लाख टन प्याज और बाइस लाख टन टमाटर प्रति वर्ष खेत से बाजार पहुंचते-पहुंचते रास्ते में बर्बाद हो जाते हैं। इस समस्या से निपटने के लिए सरकार ने आज तक उचित कदम नहीं उठाए। बर्बादी से बड़े बचाव का एकमात्र तरीका भंडारण की उचित व्यवस्था करना है। भंडारण की कई स्थानीय विधियां तो गांवों में हैं, लेकिन अब उनका भी इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। एक सौ बीस जिलों में अध्ययन के बाद पाया गया कि अनुचित प्रबंधन और जलरोधक भंडारण के अभाव में काफी खाद्य पदार्थ उत्पादन के बाद बर्बाद हो रहे हैं। अगर यही खाद्य पदार्थ लोगों तक पहुंच जाएं तो देश में निश्चित तौर पर भुखमरी कम होगी। इसलिए भंडारण में ज्यादा से ज्यादा निवेश की जरूरत है।

दिलचस्प बात है कि अनाज की बर्बादी की जानकारी सरकार को है। लेकिन सरकार इस दिशा में कदम उठाने के बाबत गंभीर नहीं है। 2008 में सूचनाधिकार कानून के तहत दिए गए एक जवाब में खुद केंद्र सरकार ने माना था कि प्रति वर्ष लाखों टन अनाज गोदामों में भी सड़ जाता है। लेकिन सरकार इसे गरीबों में बांटने में दिलचस्पी नहीं दिखा रही है। जबकि सड़ते हुए अनाज को सही समय पर बांट दिया जाता तो लाखों लोगों को भोजन मिल सकता था। एक तरफ तो सरकार ने अनाज के भंडारण पर करोड़ों रुपए खर्च किए, लेकिन दूसरी तरफ उसकी उदासीनता इस हद तक थी कि अनाज गोदाम में ही सड़ गया। सरकार ने उस समय भी माना था कि अनाज खराब होने की वजह उसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाना, भंडारण और खराब वितरण प्रक्रिया है।  2013 में संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में कुल खाद्यान्न उत्पादन का एक तिहाई हिस्सा बर्बाद होता है, जो समूची विश्व अर्थव्यवस्था का 750 अरब अमेरिकी डॉलर (लगभग सैंतालीस लाख करोड़ रुपए) है। रिपोर्ट में भारत पर खास अंगुली उठाई गई थी। उसमें कहा गया था कि खाद्य पदार्थों की बर्बादी के लिए भारत विशेष रूप से जिम्मेवार है। वैसे तो रिपोर्ट में चीन पर भी अंगुली उठी थी। रिपोर्ट के मुताबिक चीन और भारत हर साल 1.3 अरब टन खाद्यान्न की बर्बादी करते हैं। 2013 में ही संसद में एक सवाल का जवाब देते हुए तत्कालीन केंद्रीय मंत्री शरद पवार ने स्वीकार किया था कि सालाना पचास हजार करोड़ रुपए मूल्य का खाद्य पदार्थ उत्पादन के बाद बर्बाद हो रहा है। एक बड़ी आबादी वाले देश में, जहां एक तरफ लोग भूख से मर रहे हैं, इतने खाद्य उत्पादों की बर्बादी चिंता का विषय है। उस समय भी सरकार ने स्वीकार किया था कि देश में फल, सब्जी, प्याज, टमाटर की बर्बादी सबसे ज्यादा हो रही है।

अगर भंडारण की उचित व्यवस्था हो तो किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिल सकता है। इस साल किसानों ने बंपर प्याज का उत्पादन किया। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में इस कदर प्याज का उत्पादन हुआ कि किसान उसे मुफ्त में बांटने को मजबूर हो गए। कई जगहों पर किसानों ने पचास पैसे किलो प्याज बेचा। प्याज के भारी उत्पादन के बावजूद किसानों को कोई फायदा नहीं हुआ। उनके लिए प्याज की खेती घाटे का सौदा रहा। उसका मुख्य कारण बंपर उत्पादन के बाद भंडारण की कोई उचित व्यवस्था नहीं होना था। अगर भंडारण की उचित व्यवस्था होती तो किसान प्याजों का भंडारण कर सकते थे। मध्यप्रदेश में तो किसान प्याज के बंपर उत्पादन से इतने ज्यादा परेशान हो गए कि उन्होंने प्याज पशुओं को खिलाना शुरू कर दिया था।  हालांकि केंद्र सरकार भंडारण की व्यवस्था को बढ़ाने के लिए तमाम दावे कर रही है। कृषिमंत्री राधामोहन सिंह का दावा है कि सरकार जल्द खराब हो जाने वाले कृषि उत्पादों के भंडारण लिए तेजी से काम कर रही है। उनके अनुसार भारत विश्व में सबसे अधिक शीत भंडारण क्षमता स्थापित करने वाला मुल्क हो गया है। सरकार के अनुसार भारत की शीत भंडारण क्षमता तीन करोड़ बीस लाख टन है। सरकार के अनुसार पिछले दो वर्ष के दौरान दस लाख टन क्षमता से अधिक भंडारण की लगभग ढाई सौ परियोजनाएं शुरू की गई हैं।

सरकार का दावा है कि खराब हो जाने वाली फसलों का उत्पादन करने वाले किसानों को मदद दी जाएगी, ताकि वे अपने विपणन दायरे को विस्तारित करें। उन्हें ज्यादा से ज्यादा शीत भंडार गृह उपलब्ध करवाया जाएगा।

यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछले पंद्रह सालों में हर साल किसी एक खाद्य वस्तु की महंगाई ने देश की जनता को काफी रुलाया। हालांकि जरूरी सारे खाद्य पदार्थ लगातार महंगे हो रहे हैं। आम गरीब जनता को खाने के लाले हैं। किसी एक साल प्याज काफी महंगा हो गया तो उसके बाद टमाटर का नंबर आता है। प्याज और टमाटर तो प्रति वर्ष महंगे हो रहे हैं। वहीं पिछले दो सालों में दालों ने आम जनता को रुला दिया है। दालों की कीमतों में भारी इजाफा हुआ है। लेकिन सरकार का इस पर कोई ध्यान नहीं गया। लगातार सरकार यह दावा करती रही है कि जल्द ही दालों की कीमतें कम होंगी लेकिन कोई कमी नजर नहीं आई। उचित मूल्य और भंडारण के अभाव में किसानों ने देश में दालों की खेती ही छोड़ दी। इस समय देश में अरहर की दाल देशी नहीं बल्कि विदेशी है। दालों को मोजांबिक और म्यांमा से आयात किया जा रहा है।

सवाल है कि देश में अनाज और अन्य खाद्य पदार्थों की कमी नहीं है, फिर भी लोग भूख से क्यों मर रहे हैं? देश के कई भागों में सूखे की स्थिति है। फिर अनाज का इतना उत्पादन है कि लोग भूख से नहीं मरेंगे। भारत में एक अनुमान के अनुसार लगभग बीस करोड़ की आबादी भुखमरी झेल रही है। दुनिया में सबसे ज्यादा भुखमरी से ग्रस्त आबादी अफ्रीका और भारत में ही है। पहले लैटिन अमेरिकी देशों में भी भुखमरी के हालात थे। लेकिन लैटिन अमेरिकी देशों की सरकारों ने खासे प्रयास किए। इससे वहां की स्थिति में काफी हद तक सुधार हुआ। भारत के पूर्वी और मध्य राज्यों बिहार, बंगाल, ओड़ीशा, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ से अक्सर भूख से मरने की खबरें आती हैं। मगर चिंता की बात है कि औद्योगिक रूप से विकसित राज्य महाराष्ट्र और गुजरात में भी भूख से मरने की खबरें आ रही हैं। इन राज्यों में भूख से मरने की खबर इन राज्यों के विकास मॉडल पर सवाल उठाता है।

ब्रिटिश राज में अकाल के कारण अनाज उत्पादन में कमी आती थी। इसके चलते लोग भूख से मरते थे। 1943 में बंगाल में लाखों लोगों की मृत्यु भूख के कारण हुई थी। उस समय बंगाल में अकाल से मरने वालों की संख्या चार लाख तक पहुंच गई थी। लेकिन तकनीकी क्रांति के युग में लोग अनाज के अभाव में भूख से मर जाएं, तो विकास के मॉडल पर सवाल तो उठेंगे ही। 

एक तरफ सरकार दावा करती है कि फसल का रिकार्ड उत्पादन हो रहा है, देश में पर्याप्त अनाज का भंडार है। वहीं दूसरी तरफ देश के कई सूखा पीडि़त राज्यों के लोगों के हालात पर सुप्रीम कोर्ट में सरकार घिर जाती है। सूखे से पलायन और भूख से होने वाली मौतों पर सरकार को सुप्रीम कोर्ट से निर्देश मिल रहे हैं। एक तरफ खाद्य पदार्थ बर्बाद हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत लोगों को प्रति माह पांच किलो अनाज देने में भी विफल हो रही है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद सरकार गंभीर नहीं है।

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