स्वाधीनता का उत्सव बनाम दायित्व

  • 2016-08-17 12:30:16.0
  • निरंकार सिंह
स्वाधीनता का उत्सव बनाम दायित्व

देश की आजादी के उनहत्तर वर्ष हो चुके हैं और आज जरूरत है अपने भीतर के तर्कप्रिय भारतीयों को जगाने की, पहले नागरिक और फिर उपभोक्ता बनने की। हमारा लोकतंत्र इसलिए बचा है कि हम सवाल उठाते रहे हैं। लेकिन वह बेहतर इसलिए नहीं बन पाया क्योंकि एक नागरिक के रूप में हम अपनी जिम्मेदारियों से भागते रहे हैं। किसी भी लोकतांत्रिक प्रणाली की सफलता जनता की जागरूकता पर ही निर्भर करती है। पर आज जनता उदासीन है और देश के तमाम नेताओं का नैतिक प्रभाव समाप्त हो चुका है। आम जनता की धारणा यह है कि मंत्रियों व विधायिका के सदस्यों से लेकर पार्षद और सरपंच तक तथा छोटे-बड़े अधिसंख्य कर्मचारी और अधिकारी भ्रष्ट हो गए हैं। इस भ्रष्टाचार के अनेक रूप हैं। ऐसी मान्यता अतिशयोक्तिपूर्ण हो सकती है, पर चारों ओर व्याप्त भ्रष्टाचार के प्रत्यक्ष और भरपूर अनुभवों के आधार पर जनता अपनी राय बना लेती है।

एक बहुत बड़े संविधान विशेषज्ञ सर आयवर जेनिंग के अनुसार किसी मंत्री का सबसे प्राथमिक, सबसे पहला जो गुण होना चाहिए वह यह कि वह ईमानदार हो और उसे भ्रष्ट नहीं बनाया जा सकता। इतना ही जरूरी नहीं बल्कि लोग देखें और समझें भी कि यह आदमी ईमानदार है। उन्हें उसकी ईमानदारी में विश्वास भी होना चाहिए। इसलिए कुल मिलाकर हमारे लोकतंत्र की समस्या मूलत: नैतिक समस्या है। संविधान, शासन प्रणाली, दल, निर्वाचन ये सब लोकतंत्र के अनिवार्य अंग हैं। पर जब तक लोगों में नैतिकता की भावना न रहेगी, लोगों का आचार-विचार ठीक न रहेगा तब तक अच्छे से अच्छे संविधान और उत्तम राजनीतिक प्रणाली के बावजूद लोकतंत्र ठीक से काम नहीं कर सकता। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि लोकतंत्र की भावना को जगाने व संवद्र्धित करने के लिए आधार प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक और शिक्षणात्मक है।

लोकतंत्र में जनता स्वयं अपनी पसंद की सरकार बनाती और कर आदि देकर उसे टिकाए रहती है। इसलिए राज्य-शक्ति पर लोक-शक्ति का जब तक नियंत्रण नहीं होगा तब तक लोकतंत्र सफल नहीं हो सकता है। मगर आज अधिकतर लोगों को राज्य-शक्ति पर अटूट श्रद्धा है। लोग राज्य की आलोचना करते हैं, परिस्थिति के विषय में भारी असंतोष भी व्यक्त करते हैं, फिर भी इन सारी समस्याओं का यदि कोई हल है तो वह राज्य के द्वारा ही हो सकता है, ऐसी एक रूढ़ मान्यता भी लोगों के मन में बस गई है।
लेकिन आजादी और लोकतंत्र के साथ जुड़े सपनों को साकार करना है, तो सबसे पहले जनता को स्वयं जागृत होना होगा। जब तक स्वयं जनता का नेतृत्व पैदा नहीं होता, तब तक कोई भी लोकतंत्र सफलतापूर्वक नहीं चल सकता। सारी दुनिया में एक भी देश का उदाहरण ऐसा नहीं मिलेगा जिसका उत्थान केवल राज्य की शक्ति द्वारा हुआ हो। कोई भी राज्य बिना लोगों की शक्ति के देश का उत्थान नहीं कर सकता।

पर लोकतंत्र के मूलभूत तत्त्व को समझा नहीं गया है और इसीलिए लोग समझते हैं कि सब कुछ सरकार कर देगी, हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं है। लोगों में अपनी पहल से जिम्मेदारी उठाने व निभाने का संस्कार विकसित नहीं हो पाया है। फलस्वरूप देश की विशाल मानव-शक्ति अभी खर्राटे लेती पड़ी है और देश की उपयोगी पूंजी बनाने के बदले आज बोझरूप बन बैठी है। जबकि सवा सौ करोड़ मनुष्यों की शक्ति, सवा सौ करोड़ मस्तिष्क और ढाई सौ करोड़ भुजाओं की शक्ति असीम होती है। लेकिन उसे नींद से झकझोरकर जागृत करना है। किसी भी देश को महान बनाते हैं उसमें रहने वाले लोग। लेकिन अभी हमारे देश के नागरिक अपनी जिम्मेदारी से बचते रहे हैं। चाहे सडक़ पर चलने की बात हो अथवा साफ-सफाई की बात हो, जहां-तहां हम लोगों को गंदगी फैलाते और बेतरतीब ढंग से वाहन चलाते देख सकते हैं। फिर चाहते हैं कि सब कुछ सरकार ठीक कर दे।

ऐसा लोक मानस रहेगा तो लोकतंत्र क्या और कैसे काम करेगा? पर इसमें राजकीय पक्षों का, सरकार का और सरकार की नीति का भी बहुत दोष है। इस कारण भी जनता निष्क्रिय बनती है, अभिक्रम शून्य बनती है। सरकार ने बहुत सारे कार्य किए हैं, इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं खोली हैं, विशाल बांध बनवाए हैं, फौलाद के कारखाने खोले हैं आदि-आदि बहुत सारे काम सरकार के द्वारा हुए हैं। पर अभी करोड़ों लोगों को कार्य में प्रेरित नहीं किया जा सका है। लोकतंत्र में जनता के सहयोग, जनता की सक्रिय भागीदारी को आवश्यक माना जाता है। जनता की प्रचंड शक्ति, यदि एक बार संगठित होकर कमर कस ले तो दुनिया की कोई भी सरकार उसके आगे बौनी लगेगी।

वास्तव में होना तो यह चाहिए कि लोग अपनी सूझ-बूझ के साथ अपनी आंतरिक शक्ति के बल पर खड़े हों और अपने पास जो कुछ साधन सामग्री हो उसे लेकर कुछ करना शुरू कर दें। और फिर सरकार उसमें आवश्यक मदद करे। उदाहरण के लिए गांव वाले बड़ी-बड़ी पंचवर्षीय योजनाएं नहीं समझ सकेंगे, पर वे लोग यह बात जरूर समझ सकेंगे कि अपने गांव में कहां कुआं चाहिए, कहां सिंचाई की जरूरत है, कहां पुल की आवश्यकता है। वास्तव में बाहर के लोग इन सब बातों से अनभिज्ञ होते हैं। और फिर भी हमने सरकारी ढांचा इस तरह का बना रखा है कि गांव की योजना बाहर के अनभिज्ञ आदमी भी दिल्ली में बैठे-बैठे बना लें।

सही बात यह है कि गांव के लोगों के लिए ग्रामस्वराज्य की योजना एकदम सीधी-सादी है। आवश्यकता तो इस बात की है कि उनमें एक खास दृष्टि पैदा हो। यदि उन्हें यह दृष्टि मिल जाय तो हमारे राजनीतिकों और अधिकारियों की तुलना में वे लोग स्वयं ग्रामस्वराज्य  की और गांवों के विकास की योजना बहुत अच्छी तरह बना सकते हैं और अपने काम स्वयं ही संभाल सकते हैं। लेकिन इसके लिए सब सरकार और बाहरवाले किया करेंगे यह जो गांठ बंध गयी है, उसे खोलने की जरूरत है।

सरकार की दृष्टि ऐसी नहीं है, जिससे जनता की अपनी सूझ-समझ को प्रोत्साहन मिले। ब्रिटिश शासन में जनता और सरकार एक दूसरे से अलग पड़ गए थे, उस समय की खाई आज तक भरी नहीं है। सरकार वर्षों से खाद्य में आत्मनिर्भरता के लिए बड़ी-बड़ी योजनाएं बना रही है, तरह-तरह के वादे भी आए दिन सुनने को मिलते हैं, कठिन परिश्रम करके उत्पादन बढ़ाने के लिए आए दिन भाषण सुनने-पढऩे को मिलते हैं, पर कहीं कुछ नहीं होता। सरकारी लोगों ने तो अपना काम केवल भाषण देना और फाइलों का जंगल फैलाना ही मान रखा है।

जब हम गांवों में जाकर प्रत्यक्ष देखेंगे तो पहली प्रतिक्रिया यही होगी कि देश और प्रदेशों की राजधानियों में की जा रही बड़ी-बड़ी घोषणाएं वास्तविक जमीनी स्थिति से कितनी दूर और यथार्थ से कितनी कटी हुई हैं। बुलंद अल्फाज, शानदार योजनाएं, अनेकानेक सुधार। लेकिन किसी न किसी कारण ये सभी या उनमें से अधिकांश आसमान में त्रिशंकु की भांति लटकी रह गई हैं। गांवों में तो जो दिखाई पड़ता है वह है घोर दरिद्रता, दुख, विषमता, शोषण, पिछड़ापन, गतिहीनता, पस्ती और निराशा। आजादी मिलने के बाद सात दशक हो गए, पर इतने वर्षों में सरकारी योजनाओं और कानून द्वारा कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं लाया जा सकता है।

समाजवादी समाज रचना के वादे तो बहुत हुए हैं और योजनाओं के पीछे अरबों रुपए भी खर्च हुए हैं, फिर भी ऐसी स्थिति है कि देश में लाखों घरों में दिन में दो बार चूल्हा नहीं सुलगता और बच्चे रो-रोकर भूखे सो जाते हैं। औद्योगिक विकास जरूर हुआ है, देश की संपत्ति में वृद्धि भी हुई है, पर उसका लाभ किसे मिला है? महालनवीस कमेटी की रिपोर्ट तथा कई अन्य अध्ययनों का निष्कर्ष है कि गरीब अधिक गरीब बने हैं और धनिक अधिक धनी। बेकारों की संख्या बढ़ी है। अभी सबको जरूरत भर का अन्न नहीं मिलता। रहने के लिए मकान नहीं। हजारों गांवों में अभी पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है।

देश में कुछ भी नहीं हुआ है, ऐसा नहीं है। पर जो कुछ हुआ है उसका आर्थिक लाभ धनवानों को, उच्च वर्ग को, बड़े किसान को मिला। छोटे दुकानदार, मध्यम वर्ग, गरीब, भूमिहीन, आदिवासी आदि तो वैसे के वैसे ही रहे, अथवा उनकी स्थिति और अधिक बिगड़ गई। गांवों में खेती के नए तरीके, नए बीज, साधन और आर्थिक उत्पादन यह सब आया है, मगर इससे गांव का नक्शा नहीं बदला, क्योंकि अधिकतर गरीबों के पास तो जमीन ही नहीं है और जिनके पास है भी तो वह बहुत कम है।

 फलस्वरूप गरीब और पैसे वाले के बीच की खाई अंग्रेजों के समय की अपेक्षा आज अधिक बढ़ी हैै। हमारे नेताओं ने विकास का जो रास्ता चुना उसने हमें इस मंजिल पर पहुंचाया है। विकास की योजनाओं का मुख्य या सर्वप्रथम लक्ष्य यह होना चाहिए कि हर एक व्यक्ति को जीवन की प्राथमिक जरूरतों की चीजें मिल सकें। पर हमारे देश में इतना भी कब सध सकेगा, कहना मुश्किल है। पर कोई रास्ता तो निकलना चाहिए।

रास्ता यही है कि हम स्वाधीनता संघर्ष के मूल्यों को पहचानें और अपनी प्राथमिकताएं नए सिरे से तय करें। विकास के मौजूदा मॉडल में जोर संपन्नता के कुछ टापू बनाने और चकाचौंध पैदा करने पर है, और इसके लिए समूची आबादी की बुनियादी जरूरतें पूरी करने तथा प्राकृतिक संसाधनों को भावी पीढिय़ों के लिए बचाए रखने के तकाजे की अनदेखी की जा रही है।