अखरे न किसी को वेतन वृद्धि

  • 2016-08-24 09:30:19.0
  • डा. भरत झुनझुनवाला
अखरे न किसी को वेतन वृद्धि

सातवें वेतन आयोग के सुझाव के अनुसार सरकार ने केन्द्रीय कर्मियों के वेतन में वृद्धि की है। इनके हाथ में अतिरिक्त आय आयेगी, जिससे ये बाजार में माल खरीदेंगे। विशेषकर कार, टेलीविजन एवं फ्रिज इत्यादि के निर्माताओं में उत्साह बना है। उन्हें आशा है कि केन्द्रीय कर्मियों द्वारा उनके उत्पादों को अधिक मात्रा में खरीदा जायेगा। इस प्रभाव को सकारात्मक मानते हुए कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि केन्द्रीय कर्मियों द्वारा की गई खरीद का सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था पर भी सुप्रभाव पड़ेगा। कार निर्माताओं द्वारा स्टील अधिक मात्रा में खरीदी जायेगी। ज्यादा संख्या में श्रमिकों को कार के उत्पादन में लगाया जायेगा। अर्थव्यवस्था चल निकलेगी।

बात सही है। कार तथा फ्रिज की बिक्री बढ़ेगी। परन्तु यह आधी कहानी है। केन्द्रीय कर्मियों को दिये गये अतिरिक्त वेतन के स्रोत को भी देखना होगा। जैसे फ्रिज खरीदा जाये तो किचन में उत्साह तो बनेगा किन्तु देखना होगा कि बच्चे की स्कूल फीस में कटौती करके तो फ्रिज नहीं खरीदा गया है। तब परिवार के समग्र हित को झटका लगेगा चूंकि अच्छी शिक्षा के अभाव में भविष्य में बच्चे की आय न्यून रह जायेगी। वहीं फ्रिज ठेके में हुए किसी प्राफिट से खरीदा गया होता तो प्रभाव पूरी तरह सकारात्मक रहता। तब किचन में फ्रिज का उत्साह और बच्चे का भविष्य दोनों ही सही दिशा में चलते।

केन्द्रीय कर्मियों को बढ़े हुए वेतन सरकार द्वारा वसूले गये टैक्स से दिये जायेंगे। अत: देखना होगा कि टैक्स कौन अदा करता है। टैक्स के दो प्रकार हैं-प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष। प्रत्यक्ष टैक्स में मुख्यत: आयकर आता है। आयकर को प्रत्यक्ष इसलिये कहा जाता है क्योंकि यह करदाता द्वारा सीधे अपनी आय में से नकद रूप में सरकार को अदा किया जाता है। एक्साइज ड्यूटी, कस्टम ड्यूटी एवं सेल टैक्स इत्यादि अप्रत्यक्ष टैक्स के अंतर्गत आते हैं। ये टैक्स खरीदे गये माल के अन्दर जोड़ दिये जाते हैं। ये टैक्स उपभोक्ता को सीधे तौर पर नहीं दिखाई देते। अतएव ये अप्रत्यक्ष टैक्स कहे जाते हैं।

अपने देश में दोनों तरह के टैक्स का हिस्सा लगभग आधा-आधा है। इन दोनों टैक्सों में प्रत्यक्ष टैक्स अमीरों द्वारा अदा किया जाता है, चूंकि ये आयकर अदा करते हैं। अत: सरकार द्वारा वसूले गये 100 रुपये के टैक्स में 50 रुपये प्रत्यक्ष टैक्स के रूप में वसूले जा रहे हैं। शेष 50 रुपये अप्रत्यक्ष टैक्स के रूप में वसूले जा रहे हैं। अप्रत्यक्ष टैक्स अमीर-गरीब दोनों से समान वसूला जाता है। मान लेते हैं कि इसमें 25 रुपये गरीब द्वारा तथा 25 रुपये अमीर से वसूले जा रहे हैं। केन्द्रीय कर्मियों को दिये गये 100 रुपये के बढ़े हुए वेतन में 75 रुपये अमीर से तथा 25 रुपये गरीब से वसूले जा रहे हैं। टैक्स की इस वसूली से इनके हाथ में क्रय शक्ति घटेगी। टैक्स देने वाले अमीर द्वारा कार, फ्रिज आदि कम खरीदे जायेंगे। टैक्स देने वाले गरीब द्वारा बच्चे के लिये कपड़े, गृहिणी के लिये मिक्सी तथा युवा के लिये मोटरसाइकिल कम खरीदी जायेगी।

दूसरी तरफ केन्द्रीय कर्मियों के हाथ में 100 रुपये की अतिरिक्त आय उपलब्ध हो जायेगी। इस रकम में वे कार और फ्रिज खरीदेंगे। अत: समग्र रूप से देखा जाये तो सरकारी कर्मियों के वेतन में वृद्धि का प्रभाव खपत के स्थानान्तरण का होगा। आयकर अदा करने वाले अमीर व गरीब की खपत में कटौती होगी जबकि केन्द्रीय कर्मियों की खपत में वृद्धि होगी।

खपत के स्थानान्तरण के दो पक्ष हैं। कुछ खपत अमीर से लेकर केन्द्रीय कर्मियों को दी जायेगी। इसे दो अमीरों के बीच स्थानान्तरण कहा जा सकता है। चूंकि 30,000 प्रति माह पाने वाला केन्द्रीय कर्मी अमीर ही माना जाना चाहिये। शेष खपत गरीब से लेकर केन्द्रीय कर्मियों को दी जायेगी। गरीब परिवार की मोटरसाइकिल के स्थान पर केन्द्रीय कर्मी द्वारा कार खरीदी जायेगी। अत: कार निर्माताओं में बना उत्साह ठीक ही है। परन्तु मोटरसाइकिल की बिक्री में आयी गिरावट की अनदेखी की जा रही है। समग्र रूप से बाजार में अतिरिक्त मांग शून्य रहेगी।

वसूली गई रकम का उपयोग केन्द्रीय कर्मियों को वेतन देने के स्थान पर हाईवेे बनाने, ई-गवर्नेन्स पोर्टेल बनाने अन्तरिक्ष में स्पेस शटल भेजने के लिये किया जाता तो अलग प्रभाव पड़ता। मान लीजिये सरकार ने ऊपर बताये अनुसार 100 रुपये का अतिरिक्त टैक्स वसूल किया और इसका निवेश हाईवे बनाने में किया। टैक्स अदा करने वाले अमीर द्वारा कार एवं गरीब द्वारा मोटरसाइकिल की खरीद कम हुई। लेकिन हाईवे बनाने के लिये सीमेंट, स्टील तथा श्रम की मांग में वृद्धि हुई। खपत का स्थानान्तरण इस व्यवस्था में भी हुआ। टैक्स अदा करने वाले की खपत घटी जबकि सरकारी निवेश बढ़ा।

परन्तु दूसरे चक्र में प्रभाव बिल्कुल अलग पड़ता है। गरीब से 25 रुपये लेकर 100 रुपये का अतिरिक्त वेतन सरकारी कर्मियों को देने से आम आदमी और सरकारी कर्मियों में वैमनस्य बढ़ता है। आज आप देश के किसी भी गांव में चले जाइये, सरकारी कर्मियों के घर अवश्य ही पक्के मिलेंगे।

कुछ वर्ष पूर्व विश्व बैंक द्वारा किये गये अध्ययन में बताया गया था कि आम आदमी की तुलना में सरकारी कर्मियों के वेतन भारत में पांच गुना थे। विश्व में यह अधिकतम अन्तर था। सातवें वेतन आयोग को लागू करने के बाद यह अन्तर दस गुणा हो जायेगा। आम आदमी इन सरकारी कर्मियों से पहले ही पीडि़त है। ठेले वाले को अपनी आय से इन्हें हफ्ता देना ही पड़ता है। अत: गरीब का पेट काटकर सरकारी कर्मियों को पोषित करने से सामाजिक वैमनस्य बढ़ेगा।

यही 100 रुपये यदि हाईवे बनाने में खर्च किये जाते तो अगले चक्र में प्रभाव बिल्कुल अलग पड़ता। हाईवे बनाने से अपने खेत में उत्पादित मूली और गोभी को गरीब बाजार तक आसानी से ले जा सकता। इस बढ़े हुए व्यापार से उसकी आय बढ़ती। अतिरिक्त टैक्स अदा करने से उसकी आय में जो कटौती हुई थी, वह हाईवे बनने से पूरी हो जाती।

केन्द्रीय कर्मियों के वेतन में की गई वृद्धि से कार निर्माताओं में बन रहा उत्साह सही है। लेकिन समग्र अर्थव्यवस्था की दृष्टि से यह हानिप्रद होगा। बाजार में कुल मांग में तनिक भी वृद्धि नहीं होगी। केन्द्रीय कर्मियों द्वारा कार अवश्य अधिक खरीदी जायेगी लेकिन आम आदमी द्वारा मोटरसाइकिल की खरीद में उतनी ही कटौती होगी। खपत का स्थानान्तरण गरीब से केन्द्रीय कर्मियों की ओर होगा। केन्द्रीय कर्मियों को बढ़े हुए वेतन ब्रिटिश सरकार की पालिसी के तहत दिये जा रहे हैं। ब्रिटिश सरकार ने इन्हें ऊंचे वेतन दिये थे और भारतीयों का दमन करने में इन्हें हथियार बनाया था। केन्द्र सरकार अब भी उसी राह पर चल रही है जबकि परिवेश बदल चुका है।