शिक्षकों की संख्या है मूल समस्या

  • 2016-11-22 12:30:03.0
  • उगता भारत ब्यूरो
शिक्षकों की संख्या है मूल समस्या

आशीष बहल 
मुफ्त मिड-डे मील, मुफ्त वर्दी, मुफ्त किताबें आदि के बावजूद लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में न पढ़ा कर किसी भी प्राइवेट स्कूल में भेज देते हैं। इन हालात को बदलने का एकमात्र तरीका है कि लुभावनी योजनाओं के स्थान पर स्कूलों में अध्यापकों की नियुक्तियों को बढ़ाया जाए, ताकि प्रति कक्षा एक शिक्षक मिल सके.

शिक्षा समाज का आईना है और समृद्ध समाज को सशक्त शिक्षा का आधार माना जाता है। लेकिन सरकारी शिक्षा का गिरता स्तर और छात्रों की दिन-प्रतिदिन घटती संख्या चिंता का विषय बना हुआ है। सरकारी शिक्षण संस्थानों से निकल कर ही कई लोगों ने सफलता के परचम लहराए हैं। उन्हीं लोगों के दृष्टिकोण में आए बदलाव से सरकारी शिक्षा अपने अस्तित्व की जंग लड़ती नजर आ रही है। सूबे के आज लगभग 2000 से अधिक स्कूल कम छात्र संख्या के कारण बंद होने के कगार पर खड़े हैं। यहां इंतजार है तो बस एक सरकारी फरमान का। आने वाले समय में ऐसा न हो कि सरकारी स्कूल कहानी बन कर रह जाएं। प्राथमिक शिक्षा, जिसे शिक्षा की नींव माना जाता है, वहां हालात और भी दयनीय हैं। प्रश्न उठता है कि सरकार की कई लुभावनी योजनाओं, जिनमें मुफ्त मिड-डे मील, मुफ्त वर्दी, मुफ्त किताबें, कई छात्रवृत्ति आदि बांट कर भी क्यों लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में न पढ़ा कर किसी भी प्राइवेट स्कूल में भेज देते हैं। इस प्रश्न का हल जाने बिना सरकारी शिक्षा को बचाना संभव नहीं है। इसका सबसे बड़ा कारण है कक्षा और अध्यापक का अनुपात सही न होना। अभिभावक अपने बच्चों को उन स्कूलों से निकाल लेते हैं, जहां एक या दो अध्यापकों के सहारे पूरा स्कूल चलता है।

जरूरत के मुताबिक शिक्षकों की व्यवस्था न होने से उस विद्यालय शिक्षा का स्तर और परिणाम, दोनों में ही गिरावट आती है। यह एक विडंबना है कि सरकार इतनी योजनाएं चलाती है, पर कभी इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता कि प्राथमिक स्तर पर एक कक्षा के लिए एक अध्यापक नियुक्त हो। अगर हिमाचल प्रदेश की बात करें, तो लगभग 6300 प्राथमिक स्कूल ऐसे हैं, जहां मात्र दो अध्यापक ही कार्यरत हैं। 1300 के लगभग सरकारी स्कूलों में तो एक ही अध्यापक के सहारे सारा काम हो रहा है। इन्हें भी अध्यापन के साथ-साथ अतिरिक्त सरकारी दायित्वों को भी निभाना होता है। ऐसे में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की कल्पना कैसे की जा सकती है। इसके विपरीत निजी स्कूलों में हर विषय के लिए अलग अध्यापक का प्रावधान है।ऐसे में कैसे कल्पना कर सकते हैं कि सरकारी विद्यालयों के हालात बदल पाएंगे। इन हालात को बदलने का एकमात्र तरीका है कि लुभावनी योजनाओं के स्थान पर स्कूलों में अध्यापकों की नियुक्तियों को बढ़ाया जाए, ताकि प्रति कक्षा एक अध्यापक मिले। यह समय की मांग है, क्योंकि बदलती परिस्थितियों और स्पर्धा में लोगों को मुफ्त शिक्षा के बजायगुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहिए। यह भी कि शिक्षा को बचाने में मात्र सरकारी योजनाएं ही काफी नहीं होंगी। लोगों को भी सरकारी विद्यालयों में विश्वास दिखाते हुए न केवल अपने बच्चों को इनमें दाखिल करवाना चाहिए, बल्कि वहां के शैक्षणिक माहौल का भी निरीक्षण करते रहना चाहिए। भले ही हिमाचल के सरकारी स्कूलों में आज भी बेहतर शिक्षा दी जा रही है, परंतु अभिभावकों को अब ऐसी शिक्षा चाहिए, जिसमें नई तकनीकी हो, कम्प्यूटर शिक्षा हो, या स्मार्ट क्लास रूम हो। अब आप ही बताएं कि इस चकाचौंध वाली बनावटी दुनिया में जहां बच्चों को घरों में भी वातानुकूलित कमरों में बिठाया जाता है, भला उस सरकारी स्कूल में जहां अभी चटाई पर बिठा कर अर्थपूर्ण शिक्षा दी जाती है, लोगों को कैसे पसंद आएगी। योजनाओं में मात्र लाभ की बात जब तक होगी, तब तक लालची लोग ही जुड़ेंगे। यदि सच में सरकारी विद्यालयों की हालत में सुधार लाना है, तो समय के साथ चलते हुए कुछ सुधारात्मक कदम उठाने बहुत जरूरी हैं। 

कहते हैं कि जो समय के साथ बदलाव जरूरी है। पुराने ढर्रे पर दी जाने वाली शिक्षा को लोग अब पसंद नहीं कर रहे। इसलिए देश में जब नई शिक्षा नीति की चर्चा जोरों पर है, ऐसे में समाज को वही परोसा जाए, जो वे चाहते हैं। कुछ युवा प्रशिक्षित कंधों पर बोझ डालने का समय आ गया है। जमाने से चली आ रही पदोन्नति के नियमों में सुधार लाना होगा। शिक्षा में उच्च पदों पर सीधी भर्ती होनी चाहिए। मुख्याध्यापक, प्रधानाचार्य, शिक्षा अधिकारी तक के पदों में कुछ भर्ती सीधी परीक्षा द्वारा होनी चाहि, जिससे युवा ऊर्जावान लोग निकल कर सामने आएं, जो शिक्षा की पौराणिक व्यवस्था में बदलाव लाकर नई तकनीक की शिक्षा बच्चों को दे सकें। प्रतियोगिता के इस दौर में जब हर किसी में आगे बढऩे की होड़ जोर पकड़ रही है, ऐसे में हम अपने बच्चों को किसी भी क्षेत्र में कमजोर नहीं रख सकते।बुनियादी शिक्षा से ही भविष्य में करियर की नींव पक्की होगी, इसलिए इसमें कोताही बरतने का मतलब होगा  इसलिए बहुत जरूरी हो जाता है कि शिक्षा ऐसी हो, जो सभ्य नागरिक तैयार करने के साथ-साथ युवाओं का भविष्य भी सुरक्षित करे। जिस तरह से शिक्षा व्यवस्था को एक प्रयोगशाला बना कर रख दिया है, वह बहुत घातक स्थिति है। हम समाज को नौकर बनाने के जुनून में ऐसे खोए हुए हैं कि शिक्षा के असल मकसद से कोसों दूर हो गए। अभी समय है कि इसके प्रति सचेत हो जाएं। सरकारी विद्यालयों की हालत और हालात दोनों को बदलना जरूरी है और ऐसा समाज की भागीदारी के बगैर संभव ही नहीं। अत: शासन के साथ-साथ समाज भी अब इसमें अपनी भागीदारी तय करे।