चौपट होती स्कूली शिक्षा

  • 2016-08-06 13:00:51.0
  • प्रो. एनके सिंह
चौपट होती स्कूली शिक्षा

सरकारी विद्यालयों में 50 फीसदी से भी कम ऐसे विद्यार्थी हैं, जो गुना-भाग ठीक से कर पाते हैं। क्या हमारे प्रदेश के विद्यार्थी सचमुच इतने निकम्मे हैं या फिर शिक्षण प्रणाली की खामियों ने उनकी यह हालत कर दी है? प्रदेश में शिक्षा के मौजूदा हालत में सुधार को लेकर कोई सार्थक चर्चा नहीं हो रही है और न ही नीति नियंता इसके प्रति गंभीर दिखते हैं। इस बात में कोई दो राय नहीं कि प्रदेश के विद्यार्थी बहुत प्रतिभाशाली हैं, लेकिन यह जानने की कभी किसी ने जहमत नहीं उठाई कि उन्हें किस पद्धति के तहत पढ़ाया जा रहा हैज्

स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुहैया करवाने के पैमाने पर हिमाचल सरकार की नाकामी प्रदेश की युवा पीढ़ी के साथ संभवतया सबसे बड़ा अन्याय है। यह देखकर तरस आता है कि आज हमारी युवा पीढ़ी को जिस कड़ी स्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है, उसमें किसी को इस बात का जरा भी एहसास नहीं कि एक पूरी प्रतिभाशाली युवा पीढ़ी की किस कद्र उपेक्षा की जा रही है। प्रदेश में गरीब परिवारों के लडक़ों व लड़कियों को थोड़ी-बहुत सुविधाएं मिल जाएं

, तो वे दूसरे राज्यों के विद्यार्थियों को स्पर्धा में कड़ी चुनौती देते हुए सफलता की इबारत लिख सकते हैं। हालांकि राज्य के कुछ बच्चों ने इन तमाम चुनौतियों से लड़ते हुए विभिन्न क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है, लेकिन उनका यह सफर बाधाओं से मुक्त नहीं रहा। हर कदम पर चुनौतियों से लड़ते-भिड़ते हुए अंतत: उन्हें यह मुकाम हासिल हुआ है। हकीकत यह है कि शिक्षा की नींव विद्यालय स्तर पर डाली जाती है और राजनीतिक प्रभुत्व वाली सरकारी कार्य पद्धति में यह महत्त्वपूर्ण कार्य हाशिए पर धकेल दिया गया है। उच्चतर प्राथमिक विद्यालयों की संख्या 1991 में 89 से बढक़र 1999 तक 1469 हो गई थी, लेकिन शिक्षा क्षेत्र में सरकार का बजट पिछले कई सालों से पांच फीसदी के आसपास अटका हुआ है। कुछ स्कूलों में स्टाफ या अन्य सुविधाओं के अभाव में बच्चों को दो शिफ्टों में पढ़ाया जा रहा है, वहीं प्रदेश में स्कूली अधोसंरचना व निम्न शिक्षा गुणवत्ता को नजरअंदाज करके प्रदेश के सियासतदां हर दिन कोई नया स्कूल खोलने की घोषणा कर रहे हैं। इसी का नतीजा है कि 2016 की बोर्ड परीक्षाओं में 16 सरकारी स्कूलों का परिणाम शून्य फीसदी था, वहीं 86 सरकारी स्कूल ऐसे थे, जिनका परीक्षा परिणाम दस फीसदी से भी कम था।

सरकारी विद्यालयों में 50 फीसदी से भी कम ऐसे विद्यार्थी हैं, जो गुना-भाग ठीक से कर पाते हैं। क्या हमारे प्रदेश के विद्यार्थी सचमुच इतने निकम्मे हैं या फिर शिक्षण प्रणाली की खामियों ने उनकी यह हालत कर दी है? प्रदेश में शिक्षा के मौजूदा हालत में सुधार को लेकर कोई सार्थक चर्चा नहीं हो रही है और न ही नीति नियंता इसके प्रति गंभीर दिखते हैं। इस बात में कोई दो राय नहीं कि प्रदेश के विद्यार्थी बहुत प्रतिभाशाली हैं, लेकिन यह जानने की कभी किसी ने जहमत नहीं उठाई कि उन्हें किस पद्धति के तहत पढ़ाया जा रहा है। अभी हाल ही में प्रदेश सरकार ने कहा था कि जिन विद्यालयों में बोर्ड परीक्षाओं में शिक्षक 50 फीसदी से भी कम परिणाम दे पाए हैं, उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई होगी। यह दोषियों को धमकाने की एक ठेठ नौकरशाही प्रतिक्रिया है, जिसमें शिक्षकों में डर पैदा किया जाता है कि आप अच्छे परिणाम दो या फिर सजा भुगतने के लिए तैयार रहो। इसका परिणाम यह होता है कि स्कूलों में बड़े पैमाने पर नकल को बढ़ावा मिलता है। अभी हाल में जब किसी कक्षा में कुछ विद्यार्थी पास हो गए, तो शिक्षक इस बात के प्रति आश्वस्त दिखे कि अब उनके खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई नहीं हो सकती। सबसे बुरी बात तो यह है कि ऐसे प्रकरण में न तो किसी तरह का पेशेवर विश्लेषण किया जा सकता है और न ही उनको दूर करने के लिए सहभागिता आधारित चर्चाएं अथवा खराब प्रदर्शन को दूर करने वाला नया दृष्टिकोण पैदा करने के लिए कार्यशालाओं का आयोजन किया जाता है।

सरकार इस मुगालते में है कि शिक्षकों के कमजोर प्रदर्शन के प्रति उन्हें चेतावनी देना या फिर उनमें डर की भावना पैदा करना परिस्थितियों को सुधारने के लिए पर्याप्त है। वास्तव में मैंने कुछ अध्यापकों से बात की तो उन्होंने मुझे बताया, 'इस व्यवस्था से भी कोई फर्क पडऩे वाला नहीं है। हम बच्चों को नकल करने की इजाजत दे देंगे और इस तरह से सारे बच्चे पास हो जाएंगे।' एक गांव में पास होने वाली कुछ लड़कियों ने मुझे बताया कि अध्यापकों ने स्वयं उनके लिए नकल का बंदोबस्त किया हुआ था। यह है स्कूली शिक्षा का भविष्य! कुछ शिक्षकों में आम तौर पर यह शिकायत भी रहती है कि उनसे बहुत ज्यादा गैर शैक्षणिक कार्य करवाया जाता है और स्थानीय से लेकर प्रदेश स्तर तक के नेताओं का उनके काम में बहुत ज्यादा दखल रहता है।

यह सच है कि चुनाव, जनगणना या आधार कार्ड तैयार करवाने सरीखे कार्यों में शिक्षकों से बहुत ज्यादा काम लिया जाता है, वहीं स्कूल में किसी स्थानीय नेता के आगमन पर शैक्षणिक कार्य नहीं हो पाता।

 छोटा राज्य यानी बच्चों के कल्याण के लिए ज्यादा ध्यान देने की जरूरत, लेकिन इसके ठीक विपरीत हिमाचल में अपनी भावी पीढ़ी के प्रति बेपरवाही का आलम बदस्तूर जारी है। ऐसे विद्यार्थियों की संख्या भी बहुत ज्यादा है, जो उच्च शिक्षा के लिए राज्य से बाहर पड़ोसी राज्यों हरियाणा, पंजाब, दिल्ली या फिर देश के दूसरे राज्यों की ओर रुख करते हैं, वहीं कुछ युवाओं को राज्य में ही घर-बार छोडक़र किसी दूसरे स्थान पर शिक्षा के लिए डेरा जमाना पड़ता है। लेकिन इस स्थानांतरण में उन्हें अपनी स्कूली शिक्षा का वह खोखला आधार भी ढोना पड़ता है, जिसको कभी पूरी तरह से मजबूती ही नहीं मिल पाई। नतीजा यह होता है कि दूसरे राज्यों के बच्चों के साथ स्पर्धा में उनका पलड़ा वहां हमेशा हल्का पड़ जाता है। इस अंतर को पाटने के लिए उन्हें या तो और कड़ी मेहनत करनी पड़ती है या फिर सफलता हासिल करने के लिए अन्य शैक्षणिक तकनीकों पर निर्भर रहना पड़ता है।

पिछले वर्षों में पांचवें वेतन आयोग के लागू होने के बाद शिक्षकों के वेतन में समुचित वृद्धि की गई थी और इन्हें पर्याप्त अवकाश भी मिल जाता है। स्थानीय स्तर पर मार्गदर्शन और जिला स्तर पर निरीक्षण के जरिए स्कूलों के प्रदर्शन को सुधारने के लिए इनकी कार्य पद्धति पर नजर रखने हेतु स्पष्ट उद्देश्यों के साथ निगरानी की व्यवस्था करनी होगी। मुझे आज भी याद है कि मेरे स्कूल के दिनों में होने वाला निरीक्षण किसी बुरे स्वप्न की तरह भयावह हुआ करता था और स्कूल में बेहतर प्रदर्शन के लिए जोरदार तैयारियां होती थीं। शिक्षकों के कार्य का विस्तृत रूप से मूल्यांकन किया जाता था और निरीक्षण के आधार पर जो रिपोर्ट तैयार होती थी, उसे काफी गंभीरता के साथ लिया जाता था। अब सियासत का शिक्षा में दखल और निरीक्षण कार्य में आई शिथिलता के कारण शिक्षण कार्य की गहराई से देखरेख नहीं हो पा रही है।

सरकार को मौजूदा स्थिति और शिक्षण कार्य को बेहतर बनाने के कार्य को गंभीरता के साथ लेना होगा, ताकि स्कूलों में शिक्षा गुणवत्ता में सुधार किया जा सके। अगर जरूरत पड़ती है, तो सरकार द्वारा शिक्षा से संबंधित मसलों की उचित जांच के लिए विशेषज्ञों की एक समिति (नौकरशाहों की नहीं) का गठन किया जाना चाहिए और उसके द्वारा तैयार की जाने वाली कार्य नीति संबंधित रिपोर्ट को लगातार निगरानी में सख्ती के साथ क्रियान्वित किया जाना चाहिए। जब तक समूचा तंत्र सही ढंग से अपनी भूमिका नहीं निभाता, तब तक सिर्फ नई पाठशालाएं खोल देने से इस मर्ज से राहत नहीं मिलेगी।