रोजगार से जुड़ें आर्थिक सुधार, तभी लाभ होगा

  • 2016-11-09 08:30:47.0
  • डा. भरत झुनझुनवाला
रोजगार से जुड़ें आर्थिक सुधार, तभी लाभ होगा

सेवा क्षेत्र पर ध्यान देना चाहिए, परंतु तत्काल कुछ श्रम सघन क्षेत्रों को चिन्हित करके रोजगार सृजन के लिए विशेष रूप से आरक्षित कर देना चाहिए। जैसे पावरलूम बंद करके हैंडलूम को बढ़वा देने से रोजगार सृजन होगा। आम आदमी के दैनिक वेतनमान बढ़ेंगे। रोजगार न बढ़ा पाने की स्थित में द्वितीय श्रेणी में पास हुए आर्थिक सुधार अगली परीक्षा में असफल होंगे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में कहा है कि देश के समक्ष उपस्थित समस्याओं का एकमात्र हल विकास है। युवाओं का कौशल विकसित किया जाए, तो वे अपने जीवन स्तर में सुधार ला सकते हैं। वर्तमान सरकार का ध्यान गरीब की उन्नति पर है। देश में युवाओं की बड़ी संख्या उपलब्ध है। उन्हें अवसर मिलें, तो वे दुनिया को बदल सकते हैं। प्रधानमंत्री के इस मंतव्य का भरपूर स्वागत किया जाना चाहिए, लेकिन प्रश्न विकास के मॉडल का है। विचार करना है कि वर्तमान मॉडल से हम अपने लक्ष्य तक पहुंच पाएंगे या नहीं। 25 वर्ष पूर्व मनमोहन सिंह द्वारा लागू किए गए सुधारों से आम आदमी को तीन तरह से लाभ हुआ है। आयातों के सरल होने से सस्ता विदेशी माल उपलब्ध हुआ। देश में उत्पादित माल की गुणवत्ता में भी अप्रत्याशित सुधार आया है, जैसे कलर टीवी उपलब्ध हुआ है। आम आदमी को दूसरा लाभ सरकारी कल्याणकारी कार्यक्रमों से मिला है। बड़ी कंपनियों के लाभ में वृद्धि हुई है। इनके द्वारा भारी मात्रा में कर अदा किया गया है। इस राजस्व के एक अंश का उपयोग आम आदमी के लिए कल्याणकारी योजनाओं को चलाने के लिए किया गया है। मनरेगा में 100 दिन का रोजगार मिला है। किसानों के ऋण को माफ किया गया।

इंदिरा आवास कार्यक्रमों से राहत मिली है। आम आदमी को तीसरा लाभ ट्रिकल डाउन से मिला है। हमारे सेवा क्षेत्र ने दुनिया में महारत हासिल की है। बड़े शहरों में बड़ी संख्या में हाई राइज बिल्डिंगें बनी हैं। युवा इंजीनियरों द्वारा इनमें फ्लैट खरीदे गए हैं। इनके द्वारा महिलाओं को घरेलू सहायिका का रोजगार दिया जा रहा है। 25 वर्ष पूर्व यदि दिल्ली में 10 लाख सहायिकाएं रोजगार पाती थीं, तो आज 30 लाख रोजगार प्राप्त कर रही हैं। परंतु यह 'ट्रिकल' पतला होता जा रहा है। 1993 में सहायिका 600 रुपए प्रति माह वेतन पाती थीं।आज उसी कार्य के लिए 1300 रुपए पा रही हैं। इस अवधि में सहायिका का वेतन दुगना हुआ है, जबकि महंगाई चार गुना बढ़ी है। अधिक संख्या में उन्हें काम मिला है, परंतु वेतन में गिरावट आई है। लेकिन खुशी इस बात की है कि कुछ ट्रिकल तो हुआ है। कम वेतन ही सही, रोजगार तो अधिक लोगों को मिला है। इन महान उपलब्धियों के सामने संकट भी गहरा रहा है, जो अभी नहीं दिख रहा है, जैसे गेहूं में शुरू में घुन कम ही दिखता है। दूसरे देशों में यह समस्या स्पष्ट दिखाई दे रही है। अमरीका में पुलिस अधिकारियों की लगातार हत्याएं की जा रही हैं। यूरोप में आतंकी गतिविधियां निरंतर बढ़ रही हैं। इंग्लैंड ने यूरोपीय यूनियन से बाहर आने का निर्णय लिया है। इन गतिविधियों की जड़ें आम आदमी के लिए कमाई के सिकुड़ते अवसर और बढ़ती असमानता में हैं। मध्यम वर्ग से ताल्लुक रखने वाले इंजीनियर की आय पांच गुना बढ़ गई है, जबकि उसके घर काम करने वाली सहायिका की आय आधी रह गई है। भारत में यह गहराता असंतोष तत्काल नहीं दिख रहा है, चूंकि चंपारन से आने वाली सहायिका एक बार दिल्ली की चकाचौंध में रम जाती है।

परंतु समय क्रम में चकाचौंध ओवरकम करने के बाद धीरे-धीरे असमानता का आक्रोश विकराल होता जाएगा। सस्ते विदेशी माल की उपलब्धि, मनरेगा और ट्रिकल के शोर में यह दर्द फिलहाल छिप गया है। सामान्य आदमी के जीवन की गुणवत्ता में पिछले 25 वर्षों में सुधार अवश्य हुआ है, लेकिन यह अपेक्षा से बहुत कम है। छात्र सेकेंड डिवीजन से पास हो जाए तो भी खुश होता है, यद्यपि रोजगार नहीं मिलता है। मूल समस्या अच्छे वेतन के रोजगारों की कमी की है। यदि मध्यम वर्ग का तीव्र गति से विकास हुआ, तो ट्रिकल की धारा कुछ मोटी हो जाएगी और आम आदमी को भी विकास का लाभ पहुंचेगा। मध्यम वर्ग का विस्तार वर्तमान गति से हुआ, तो अमरीका की तरह हमारा आम आदमी भी उद्विग्न हो जाएगा। देश की सरकार द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण होने का उत्सव मनाने में व्यस्त है। मेक इन इंडिया से आम आदमी को कोई सरोकार नहीं है।देश में मैन्यूफेक्चरिंग का विस्तार हो जाए, तो भी रोजगार कम ही उत्पन्न होंगे। पिछले 25 वर्षों में जीडीपी की विकास दर लगभग सात प्रतिशत रही है, लेकिन रोजगार की विकास दर मात्र दो प्रतिशत रही है। आज मैन्युफेक्चरिंग का चरित्र पूंजी प्रधान होता जा रहा है। 1992 में अपने निर्यातों में पूंजी सघन माल का हिस्सा 41 प्रतिशत था, जो कि 2010 में बढक़र 65 प्रतिशत हो गया है। नया उद्योग लगाने से यदि 1,000 रोजगार उत्पन्न होते हैं, तो उससे बने सस्ते माल के बिकने से 20,000 कुटीर उद्योग बंद हो जाते हैं, जैसे ब्रेड या कागज के लिफाफे बनाने के उद्योग।

स्किल इंडिया के कामयाब होने में भी संशय है। सही है कि युवाओं के कौशल विकास से वे स्वरोजगार कर सकते हैं। गांव के मेधावी बच्चे कम्प्यूटर गेम बना सकते हैं। वैश्विक बाजार में हम नए एवं सस्ते उत्पाद उपलब्ध करा सकते हैं, परंतु यह महज एक संभावना है। इस संभावना को मूर्त करना एक बड़ी चुनौती है। इस दिशा में अब तक का रिकार्ड कमजोर ही है। कॉल सेंटर कर्मचारी मुश्किल से 10,000 रुपए कमा रहे हैं। सेवाओं के निर्यात के प्रति सरकार भी उदासीन है। सरकार का ध्यान मेक इन इंडिया की छत्रछाया में मैनूफेक्चरिंग के विस्तार को हासिल करने का है। द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण विद्यार्थी को यदि प्रथम श्रेणी में पास करना हो तो अपनी कमियों को दूर करना होता है। इस हेतु सरकार को आगे कदम उठाने होंगे। सेवा क्षेत्र को गति दी जाए। नई सेवाओं जैसे कस्टम मूवी, डिजाइनर कपड़े, मनवांछित आकार के फल और सब्जी का उत्पादन, कम्प्यूटर गेम्स आदि को बढ़ावा देने की महत्त्वाकांक्षी योजनाएं शुरू की जाएं। इससे मध्यम वर्ग का विस्तार होगा। सरकार को चाहिए कि आईआईटी तथा आईआईएम की तर्ज पर इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ सर्विसेज स्थापित करे। तमाम देशों में स्थित भारत के दूतावासों में मेजबान देशों को सेवाओं के विस्तार के लिए अधिकारी नियुक्त किए जाएं। अपने देश में कार्यरत सेवा कंपनियों द्वारा विदेशियों को दिए जाने वाले धोखे पर सख्त कार्रवाई के लिए अलग पुलिस तंत्र स्थापित किया जाए। सेवा क्षेत्र पर ध्यान देना चाहिए, परंतु तत्काल कुछ श्रम सघन क्षेत्रों को चिन्हित करके रोजगार सृजन के लिए तत्काल आरक्षित कर देना चाहिए। जैसे पावरलूम बंद करके हैंडलूम को बढ़वा देने से रोजगार सृजन होगा। आम आदमी के दैनिक वेतनमान बढ़ेंगे। रोजगार न बढ़ा पाने की स्थित में द्वितीय श्रेणी में पास हुए आर्थिक सुधार अगली परीक्षा में असफल होंगे।