चिकित्सा शिक्षा को लगा पैसे का रोग

  • 2016-09-11 12:30:47.0
  • उगता भारत ब्यूरो
चिकित्सा शिक्षा को लगा पैसे का रोग

प्रमोद मीणा

निजी क्षेत्र को चिकित्सा शिक्षा में उतरने की छूट देने के पीछे तर्क दिया गया कि सरकारी महाविद्यालय उतने चिकित्सक तैयार नहीं कर सकते, जितनी जरूरत है। दूसरे,प्रतिस्पर्धा बढऩे पर शुल्क स्वत: कम हो जाएंगे। लेकिन चिकित्सा शिक्षा के निजी महाविद्यालयों की संख्या करीब पांच सौ तक पहुंच जाने पर भी क्या शुल्कों में गिरावट आई है?

भारत सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं की वस्तुस्थिति जानने के लिए समय-समय पर जो आयोग और समितियां गठित की हैं, उन सबकी रिपोर्टों में समान रूप से बार-बार एक ही तथ्य उभर कर आता है कि बहुसंख्यक भारतीय समुचित और यथेष्ट स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं। वर्तमान समय में देश की स्वास्थ्य सेवाओं पर दोहरा बोझ है। एक तो आम जनता संक्रामक और मौसमी बीमारियों से सतत रूप से आक्रांत रहती ही है। दूसरे, पेशेवर चिकित्सकों की जमात शहरों में ही केंद्रित होती जा रही है। इन दोनों प्रकार की चुनौतियों का सामना करने के लिए जहां हमें प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में कार्यरत चिकित्सकों की संख्या में गुणात्मक वृद्धि करनी होगी, वहीं पेशेवर चिकित्सकों का प्रशिक्षण इस प्रकार से करना होगा कि वे जहां हमारे देश की प्राथमिक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करने में सक्षम बनें, वहीं मानसिक रूप से भी यह जिम्मेदारी उठाने के लिए स्वयं को तैयार कर सकें। ऐसा देखा गया है कि वर्तमान चिकित्सा शिक्षा ऐसे स्नातक चिकित्सक तैयार नहीं कर पा रही जो गांवों और कस्बों में रह कर आम जनता की स्वास्थ्य विषयक तकलीफों का निदान कर सकें।

इस प्रकार चिकित्सा शिक्षा का अंधा विस्तार मात्र करके हम अपने यहां की स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान नहीं पा सकते। चिकित्सा महाविद्यालयों की संख्या में वृद्धि करना वास्तव में एक भोथरी रणनीति ही कहा जाएगा। इस रणनीति पर चल कर आप इस देश में स्वास्थ्य सेवाओं की मांग और आपूर्ति के बीच की खाई को नहीं पाट सकते और तब तो खासकर इस अंतराल को नहीं भरा जा सकता जब आप चिकित्सा शिक्षा को पूरी तरह से निजी क्षेत्र के रहमोकरम पर छोड़ देते हैं। अब तक के अनुभव हमें बताते हैं कि चिकित्सा शिक्षा प्रदान करने वाले निजी महाविद्यालय का शुल्क ढांचा एक आम नागरिक के बच्चे की पहुंच से बहुत बाहर होता है। एक अंग्रेजी अखबार में छब्बीस अगस्त को छपी खबर के मुताबिक तमिलनाडु में चिकित्सा स्नातक पाठ्यक्रम चलाने वाले निजी संस्थानों का औसत शुल्क लगभग दो करोड़ तक पहुंच गया है। परास्नातक और अन्य प्रकार की चिकित्सा उपाधियों वाले पाठ्यक्रमों के शुल्क निजी महाविद्यालयों और डीम्ड विश्वविद्यालयों में और भी ज्यादा ऊंचाई तक पहुंच चुके हैं। और हम जानते हैं कि एक आम आदमी का बच्चा दो करोड़ देकर डॉक्टर नहीं बन सकता।

वर्तमान व्यवस्था ने चिकित्सा शिक्षा तंत्र को वह औपचारिक रूप दे डाला है जहां आर्थिक स्तर और वर्गीय विशेषाधिकारों के आधार पर विद्यार्थियों में भेद पैदा हो गया है, श्रेणीकरण हो गया है। वैसे तो ऐसा स्तर भेद होना किसी भी क्षेत्र में अवांछनीय है लेकिन भावी चिकित्सकों के बीच इस प्रकार का भेदभाव बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है क्योंकि यह एक ऐसा पेशा है जहां आपको भगवान का दर्जा दिया जाता है। चिकित्सक में सहानुभूति, परोपकार और सेवाभाव की आम जनता बड़ी इज्जत करती है अत: इन गुणों को प्रोत्साहन दिए जाने की जरूरत है। लेकिन क्या निजी क्षेत्र से आप इन चीजों की उम्मीद कर सकते हैं?

चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में मची इस अंधी लूट और तमाम तरह के भ्रष्टाचार और अव्यवस्था का संज्ञान लेकर मई में सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार को हिदायत दी थी कि संसद की स्थायी समिति के सुझाव के अनुसार एक निगरानी समिति बनाई जाए जो भारतीय चिकित्सा परिषद के कार्यों पर निगरानी रख सके। यहां गौरतलब है कि देश में चिकित्सा शिक्षा के नियमन का काम यही परिषद देखती है लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि स्वयं यह संस्था आज निर्जीव और निष्प्रभ हो चुकी है। न तो भारतीय चिकित्सा परिषद देश भर में चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में पाठ्यक्रम और प्रशिक्षण के स्तर पर कोई गुणवत्तापूर्ण मानक निर्धारित कर पाई है और न ही इसने मेडिकल शिक्षा को सुलभ और सस्ता बनाने की दिशा में कोई मुकम्मल कदम ही कभी उठाया है। उलटे लोकहित के नाम पर निजी न्यासों और अन्य संस्थानों को चिकित्सा महाविद्यालय आदि खोलने का मौका देकर परिषद ने पहले ही चिकित्सा शिक्षा को आम आदमी की जेब से बाहर कर दिया है।

निजी क्षेत्र को चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में उतरने की छूट देने के पीछे तर्क दिया गया कि सरकारी महाविद्यालय उतनी संख्या में चिकित्सक तैयार नहीं कर सकते, जितनी जरूरत है। यह भी कहा गया कि प्रतिस्पर्धा बढऩे पर निजी महाविद्यालयों के शुल्क स्वत: ही कम हो जाएंगे। लेकिन आज चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत निजी महाविद्यालयों की संख्या लगभग पांच सौ तक पहुंच जाने पर भी क्या चिकित्सा पाठ्यक्रमों के शुल्कों में गिरावट आई है? इसका जवाब ना में ही होगा। यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जवाब तलब किए जाने पर सरकार के निर्देश पर नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट के साथ राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग विधेयक का जो मसौदा सरकार को सौंपा है वह विवाद के घेरे में आ गया है। कारण कि यह प्रस्तावित विधेयक चिकित्सा शिक्षा के लोकतंत्रीकरण और मानकीकरण के स्थान पर निजी क्षेत्र को खुली छूट देने की सिफारिश करता है कि वे कुछ सीटों को छोड़ शेष सीटों पर मनमाने शुल्क वसूल सकते हैं। स्पष्ट है कि गरीब मेधावी बच्चे चाहे नीट की परीक्षा में कितने ही अंक लाएं, पर निजी क्षेत्र की चिकित्सा शिक्षा उन्हें स्वप्न में भी नसीब नहीं हो सकती।

महंगी होती निजी क्षेत्र की चिकित्सा शिक्षा के मद््देनजर होना तो यह चाहिए कि नीति आयोग की जिस समिति ने इस विधेयक का मसौदा तैयार किया है, उसे निजी क्षेत्र के चिकित्सा महाविद्यालयों के अनाप-शनाप ढंग से बढ़ाए जा रहे शुल्कों का इस प्रकार से नियमन करना चाहिए कि गरीब आदमी के बच्चे को भी अपनी काबिलियत के दम पर चिकित्सक बनने का अवसर मिल सके। लेकिन विधेयक की प्रस्तावना में निजी चिकित्सा संस्थानों के शुल्कों के नियमन में सरकार की अक्षमता स्वीकार करके निजी क्षेत्र के समक्ष एक प्रकार से हथियार डाल दिए गए हैं। 

समिति की जो सबसे महत्त्वपूर्ण अनुशंसा है, वह कहती है कि निजी कंपनियों को मुनाफा कमाने के लिए चिकित्सा महाविद्यालय खोलने की अनुमति दी जानी चाहिए। यह तो वही हुआ कि कोई सरकार अपराध रोकने में अपनी नाकामी पर परदा डालने के लिए कह दे कि यह अपराध तो अपराध है ही नहीं, यह तो कानून की नजर में वैध है।

इस सिफारिश के पीछे कुछ तर्क दिए गए हैं जो बहुत ही हास्यास्पद हैं, जैसे क्यों न चिकित्सा क्षेत्र में मुनाफे को वैधता दे दी जाए? दूसरा तर्क दिया गया है कि मुनाफा कमाने पर जो वर्तमान रोक है और शुल्क पर जो थोड़ा-बहुत नियंत्रण रखा गया है, उससे चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की संभावनाएं सीमित हो जाती हैं और इसके चलते चिकित्सा शिक्षा के त्वरित विस्तार का हमारा लक्ष्य पीछे छूट जाता है। तीसरा तर्क है कि निजी चिकित्सा शिक्षा संस्थानों में शुल्क का नियमन बहुत ही कठिन है। इन सब तर्कों से यही निकल कर आता है कि चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में दबे-छिपे ढंग से पैसों का जो बड़ा लेन-देन चलता है, सरकार उसे रोकने में विफल रही है।

सरकार के नुमाइंदे और निजी क्षेत्र के चिकित्सा शिक्षा संचालक इस प्रस्तावित विधेयक के पक्ष में यह कह रहे हैं कि मसौदा विधेयक में चालीस फीसद सीटों पर शुल्क का नियमन नए आयोग (राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग) द्वाराकिए जाने का प्रावधान है जबकि सिर्फ साठ फीसद सीटों पर निजी महाविद्यालय अपने 'विवेक' से शुल्क तय करेंगे और इसकी कोई ऊपरी सीमा नहीं होगी। इस असमान शुल्क व्यवस्था के समर्थन में कहा गया है कि यह व्यवस्था निर्धन तबके के छात्रों के लिए अनुदान की तरह काम करेगी। लेकिन वस्तुत मसौदे में साफ संकेत है कि आयोग अधिकतम चालीस फीसद सीटों के शुल्क निर्धारण में ही दखल दे सकेगा। इसका मतलब हुआ कि निजी क्षेत्र अपनी पहुंच का बेजा इस्तेमाल करके चालीस फीसद से बहुत कम सीटों को ही आयोग के लिए छोड़ सकता है और मुनाफे को ही माई-बाप समझने वाले निजी क्षेत्र से आप नैतिकता की कोई उम्मीद नहीं रख सकते। निजी क्षेत्र के चिकित्सा शिक्षा संस्थानों को खुला खेल फर्रुखाबादी खेलने की छूट देने की यह सिफारिश हमारे उस घोषित लक्ष्य को ताक पर रखने वाली है जिसके तहत सरकार छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में कार्य करने के लिए तत्पर सुयोग्य चिकित्सकों को प्रशिक्षत करने के प्रति प्रतिबद्ध है।

वैसे इस प्रस्तावित विधेयक के मसौदे में कई उत्साहजनक बातें भी हैं, जैसे चिकित्सा शिक्षा के स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों के लिए पृथक-पृथक दो बोर्ड बनाना, चिकित्सा शिक्षा संस्थानों के मूल्यांकन के लिए एक तीसरे बोर्ड की अनुशंसा और श्रेणीकरण, नामांकन एवं चिकित्सकीय नैतिकता के लिए एक और (चौथा) बोर्ड रखा जाना। प्रशासनिक क्रियाकलापों को और कारगर बनाने की बात भी है। इन सब पहलों में सकारात्मक बदलावों की संभावना से हमें इनकार नहीं करना। लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि चिकित्सा शिक्षा के नियमन और विस्तार का कोई भी नया ढांचा खड़ा करते समय हमारी नजरें पंक्ति के सबसे अंत में खड़े उस व्यक्ति से कहीं भटक न जाएं जो हमारे राष्ट्रपिता गांधीजी की प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर था। लेकिन बाजारवाद की चकाचौंध में दिग्भ्रमित मध्यवर्ग भी इसकी मार से बच नहीं पाएगा।