हजार घाव देने की लड़ाई में निशाने पर शिक्षा

  • 2016-10-30 09:30:02.0
  • डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री
हजार घाव देने की लड़ाई में निशाने पर शिक्षा

अब पाकिस्तान की शह पर आतंकी संगठनों ने निराशा में आकर अपनी अंतिम चाल चली है। उन्होंने घाटी में स्कूलों को बंद करवाना या जलाना शुरू कर दिया है। उद्देश्य स्पष्ट है। गरीब का बच्चा पढ़ेगा तो सोचेगा। सोचेगा तो समझेगा भी जरूर। एक बार वह समझ गया, तो गिलानियों, हमदानियों, खुरासानियों और करमानियों का रहस्य भी समझ जाएगा और पाकिस्तान की पंजाबी सेना का भी। लेकिन लगता है यह पाकिस्तान और आतंकी संगठनों की घाटी में अंतिम लड़ाई है, जो धीरे-धीरे बलूचिस्तान और गिलगित-बाल्टीस्तान के शोर में डूब जाएगी.
कश्मीर घाटी में पिछले लंबे अरसे से पाकिस्तान ने छद्म युद्ध छेड़ रखा है। जाहिर है कि इस युद्ध के लिए परंपरागत तरीकों और हथियारों का तो इस्तेमाल नहीं हो सकता। इसे कुछ विशेषज्ञ हजार घाव देने वाला युद्ध भी कहते हैं यानी शत्रु के शरीर पर एक-एक कर हजार घाव कर दो, ताकि वह निस्तेज हो जाए। पाकिस्तान भारत के शरीर पर हजार घाव करने के प्रयास में ही लगा हुआ है, क्योंकि आर-पार की लड़ाई वह 1947 से लेकर कारगिल युद्ध तक चार बार कर चुका है, लेकिन उसमें सफल नहीं हुआ। हजार घाव करने की लड़ाई में उसने कश्मीर घाटी के कुछ लोगों को भी शामिल कर लिया है। ये लोग क्षीण अल्पमत के लोग हैं, लेकिन इन्होंने कश्मीर घाटी के बहुसंख्यक लोगों को एक प्रकार से बंधक बना लिया है। बंधक बने ये लोग कभी हुर्रियत कान्फ्रेंस के लोगों द्वारा जारी किए गए कैलेंडर का पीछा करते हैं, कभी किसी आतंकवादी गुट द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति को पढ़ कर ही लाल चौक सुनसान हो जाता है। बहुत ही गहरी रणनीति से भूमिगत और उनके भूमि के ऊपर विचर रहे समर्थक भय और आतंक का वातावरण बना कर कश्मीर घाटी को बंधक बनाए हुए हैं। इस प्रकार के वातावरण में समाजविरोधी तत्त्व धन संपत्ति जुटाने और उगाहने के अभियान में जुट जाते हैं। लेकिन यह सब कुछ तब तक ही संभव है, यदि सरकार अपवित्र नैक्सस को तोडऩे में असफल रहती है। अब तक भारत सरकार का तरीका किसी भी ढंग से इस अपवित्र आतंकी गठबंधन से बातचीत करके कोई बीच का रास्ता निकालने का ही रहा है। उससे शांति की कुछ समय के लिए लीपापोती तो होती रहती है, लेकिन अंदर पनप रहे कीड़े नहीं मरते। आम जनता और भी ज्यादा भयग्रस्त हो जाती है। उसको लगता है कि जब आतंकी गठबंधन का सरकार कुछ नहीं बिगाड़ पाती, तो हमारी क्या बिसात है। कश्मीर घाटी में पिछले तीस साल से यही हो रहा है। वहां के स्थानीय राजनीतिज्ञों को इस आतंकी वातावरण से असीम लाभ मिलता है। वे दिल्ली को डराते रहते हैं कि कश्मीर घाटी और दिल्ली के बीच वही इस नाज़ुक दौर में सेतु का काम कर सकते हैं। उनके बिना कश्मीर घाटी से संवाद समाप्त हो जाएगा। इस संवाद के लोभ में उनके भ्रष्ट आचरण की ओर कोई ध्यान नहीं देता। आज कश्मीर घाटी में शेख अब्दुल्ला का कुनबा भ्रष्टाचार को लेकर इतना बदनाम है कि उनके भ्रष्ट आचरण की सौगंध खाने के लिए वहां का बच्चा-बच्चा तैयार है। लेकिन आप उनके इस भ्रष्टाचार की जांच नहीं करवा सकते, क्योंकि उनके अनुसार इससे घाटी की स्वायत्तता का हनन होता है। इसी स्वायत्तता की रक्षा करते-करते दिल्ली ने घाटी में पाकिस्तान पोषित राक्षस को झेलम किनारे पसरने दिया।

अब लगता है कि नरेंद्र मोदी की सरकार ने सत्ता में आने पर कश्मीर घाटी को समझने का मुहावराबदल लिया है। पहली बार भारत सरकार ने कश्मीर घाटी में सचमुच का विधानसभा चुनाव करवा दिया। 

सहसा चुनाव जिसमें वहां के लोग अपना प्रतिनिधि स्वयं चुन सकें। यह आतंकवादियों और पाकिस्तान दोनों के लिए चौंक उठने का समय था। मोदी ने बातचीत का रास्ता तो पाकिस्तान से भी खुला रखा, लेकिन बातचीत की भाषा बदल गई। अब रिरियाने या सफाई देने या मांगने की भाषा न रहकर मोटा-मोटी खरी-खरी सुनाने की भाषा हो गई। आतंकवादियों ने एक बार फिर बुरहान वानी के मरने के मौके का लाभ उठाकर कश्मीर बंद और लाल चौक बंद की पुरानी कवायद शुरू कर दी। पत्थर फेंकने का पुराना सिलसिला। जगह-जगह कुछ हजार लोगों के प्रदर्शन। सेना पर हमला। नियंत्रण रेखा पर फायरिंग इत्यादि। लेकिन इस रणनीति का सबसे अहम हिस्सा था। पत्थर फेंकते रहो, ताकि सरकार के पास कफ्र्यू लगाने के अलावा कोई चारा न रहे। सरकार बंदूक चलाए तो लाशों की गिनती बताओ और पेलेट गन चलाए तो शरीर पर लगे छर्रों का हिसाब-किताब प्रसारित करते रहो।

 भारत सरकार कितने दिन यह दबाव झेल सकेगी? गिलानी का पुराना अनुभव महीना दो महीना बताता था। उसके बाद सरकार फिर आकर किसी गिलानी- खुरासानी-करमानी-हमदानी के दरबाजे पर नाक रगड़ेगी। तब फिर वही पुराना सिलसिला शुरू हो जाएगा, लेकिन नरेंद्र मोदी की सरकार ने पाकिस्तान और कश्मीर घाटी में सक्रिय उसके आतंकी संगठनों को अलग-अलग उत्तर उन्हीं की भाषा में दिया। पाकिस्तान को उन्होंने बलूचिस्तान की चिंता करने के लिए कहा। बताया कि मजलूम बलोचों पर पाकिस्तान की पंजाबी सेना अत्याचार कर रही है। यह भी कहा कि जम्मू-कश्मीर का जो हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में है, वहां के लोग भारतीय नागरिक ही हैं। पाकिस्तान की पंजाबी सेना वहां भी बहुसंख्यक शिया समाज को मार रही है और पाकिस्तान से मुसलमानों को ला-लाकर वहां बसा रही है। उसे बंद कर देना चाहिए। गिलगित बाल्टीस्तान में इससे एक बारगी तूफान आ गया। वहां के लोगों को लगा कि उनकी चिंता करने वाला भी कोई है। वहां भारत जिंदाबाद के नारे लगने लगे। बलूचिस्तान के लोग आभार जताने लगे कि किसी ने तो उनकी चिंता की। दूसरा उत्तर मोदी सरकार ने आतंकी संगठनों को दिया। सरकार किसी गिलानी के पास नहीं गई। यदि बात करनी होगी तो जनता के चुने हुए नुमाइंदों के साथ की जाएगी। सीपीएम के कुछ लोग भाग कर गिलानी के दरवाजे तक गए भी, लेकिन झल्लाए गिलानी ने उनके लिए दरवाजा खोलने से भी इनकार कर दिया।
आतंकियों ने उड़ी में सेना के शिविर पर आक्रमण किया तो भारतीय सेना ने जम्मू-कश्मीर के पाकिस्तान द्वारा कब्जा किए गए इलाके के अंदर घुस कर आतंकी शिविरों को नष्ट कर दिया। मोदी सरकार के इस कदम से तो पाकिस्तान की घरेलू राजनीति में भी भूचाल आ गया। आतंकी संगठनों को लगता था कि वे दबाव का वातावरण बना कर प्रदेश की मुख्यमंत्री को डरा लेंगे और वह डर कर सरकार से हाथ खींच लेगी, तो दिल्ली और घाटी आमने-सामने हैं, ऐसा माहौल बनाने में सहायता मिलेगी। आज तक प्रदेश में यही होता रहा है। वहां का मुख्यमंत्री या तो आतंकियों के आगे हथियार डाल देता था या फिर आतंकियों की भाषा में ही बोलना शुरू कर देता था। लेकिन महबूबा मुफ्ती ने आतंकियों के राजनीतिक दबाव और आतंक के भय में आने से इनकार कर दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि आतंकी और उनके समर्थक अपने बच्चों को तो बाकी प्रदेशों में पढऩे के लिए भेज रहे हैं और गरीब के बच्चों को आगे करके उनका दोहन कर रहे हैं।

अब पाकिस्तान की शह पर आतंकी संगठनों ने निराशा में आकर अपनी अंतिम चाल चली है। उन्होंने घाटी में स्कूलों को बंद करवाना या जलाना शुरू कर दिया है। उद्देश्य स्पष्ट है। 
गरीब का बच्चा पढ़ेगा तो सोचेगा। सोचेगा तो समझेगा भी जरूर। एक बार वह समझ गया, तो गिलानियों, हमदानियों, खुरासानियों और करमानियों का रहस्य भी समझ जाएगा और पाकिस्तान की पंजाबी सेना का भी। लेकिन लगता है यह पाकिस्तान और आतंकी संगठनों की घाटी में अंतिम लड़ाई है, जो धीरे-धीरे बलूचिस्तान और गिलगित-बाल्टीस्तान के शोर में डूब जाएगी ।