कौन बनेगा लखनऊ के सिंहासन का स्वामी

  • 2017-01-05 06:30:30.0
  • राकेश कुमार आर्य

कौन बनेगा लखनऊ के सिंहासन का स्वामी

इस समय सभी प्रदेश वासियों के मन मस्तिष्क में एक ही प्रश्न कौंध रहा है कि इस बार प्रदेश के सिंहासन का स्वामी कौन बनने जा रहा है? सपा के कलह ने राजनैतिक समीकरणों को कुछ हिलाया तो है, पर इस सारे घटनाक्रम से अखिलेश यादव जिस प्रकार निपटे हैं और उन्होंने अपनी सपा को 'गुण्डों से मुक्त' कराने की दिशा में ठोस कदम उठाया है-उससे भाजपा सहित उनके सभी विरोधियों को यह समझ में आया है कि प्रदेश का सिंहासन अपने नियंत्रण में लेना इतना सरल नही है, जितना वह मान रहे थे। ऊपर से भाजपा और बसपा चाहे जो कहें पर सच यह है कि उन्हें सपा की भीतरी कलह ने अपनी शतरंजी चालों को सावधानी से खेलने के लिए विवश किया है।
कुमारी मायावती अभी तक 'नोटबंदी' की 'मोदी मार' से अभी उभर भी नही पाई थीं कि अब 'वोटबंदी' की सपा की राजनीति का वह शिकार हो गयी हैं। अखिलेश बड़ी सावधानी से अपने मतदाताओं के बीच अपनी जगह बना गये हैं, और जिन्हें मायावती अपने साथ लाने के लिए आतुर दीख रही थीं, वे मत अखिलेश के साथ रूक गये से लगते हैं। कारण कि अखिलेश ने अपनी पार्टी की राजनीतिक उठापटक के बीच अपने आपको जिंदा शहीद दिखाकर अपने मतदाताओं की सहानुभूति प्राप्त कर ली है। 

इस सारे घटनाक्रम को कुछ लोगों ने सपा का नाटक भी माना है और कहा है कि नेताजी ने बड़ी सावधानी से अगले पांच वर्ष भी अपने बेटे के लिए सुरक्षित कर लिए हैं। मायावती सारे खेल को समझकर दुखी हैं, उन्हें मुस्लिम मत फिर सपा की ओर जाता दीख रहा है और उनकी परंपरागत वोटों में भी 'मोदीसेंध' लगने की पूरी संभावना दीख रही है। यदि ऐसा होता है तो बसपा के लिए यह बहुत ही दुखदायक होगा। 
अगले चुनावों को लेकर मायावती का छह माह पूर्व जितना उत्साह था वह भी अब ठण्डा पड़ता जा रहा है। जिससे हाथी के लिए लखनऊ दूर होता सा दिखाई पड़ रहा है।
अब आते हैं कांग्रेस पर। लगता है इस पार्टी ने अखिलेश को अपना नेता मान लिया है। अब कांग्रेस अपने चुनाव प्रचार के लिए प्रियंका वडेरा को लाना तो चाहती है, पर उन्हें वह मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत नहीं करेगी। कांग्रेस नही चाहेगी कि अपनी इस अंतिम आशा का खाका वह यूपी चुनावों में हारकर पिटवा ले। विशेषत: तब जबकि राहुल के असफल होने पर प्रियंका को वह एक हथियार के रूप में तैयार कर रही हो। 

कांग्रेस अपनी स्थिति को संभालने के स्थान पर स्वयं को अखिलेश की शरण में ले जाती सी जान पड़ रही है। राहुल गांधी समझ रहे हैं कि यूपी में पराजय तो निश्चित है पर पराजय के उपरांत वह लखनऊ से दिल्ली आने का सुरक्षित और सम्मानपूर्ण रास्ता खोज रहे हैं। जिससे वह मुंह छिपाकर दिल्ली आ सकें। वह चाहते हैं कि चाहे जो हो-पर भाजपा को लखनऊ के सिंहासन से रोक दिया जाए। सरकार चाहे जिस किसी की बन जाए-बस भाजपा की नहीं बननी चाहिए। राहुल के लिए यदि इतना भी हो गया तो भी वह अपने लिए ढोल नगाड़े बजवा लेंगे और सारी जीत का श्रेय अपनी माता को देना भी नहीं भूलेंगे। वास्तव में कांग्रेस के लिए यह स्थिति अत्यंत लज्जास्पद है। इस पार्टी ने अपना राष्ट्रीय स्वरूप गंवाकर अब स्वयं को क्षेत्रीय दलों की सेविका के रूप में भी परोसना आरंभ कर दिया है। सब समय-समय की बात है-कभी क्षेत्रीय दलों के अध्यक्षों या मुख्यमंत्रियों को इंदिरा गांधी यदि मिलने का समय भी दे दिया करती थीं तो वह अपने आपको सौभाग्यशाली समझा करते थे। जबकिआज क्षेत्रीय दल राहुल को बुला लें तो राहुल गांधी स्वयं को सौभाग्यशाली मानते हैं। इसके उपरांत भी कुछ लोगों को भ्रम है कि राहुल गांधी निरंतर प्रगति कर रहे हैं। राहुल के लिए लखनऊ दूर है और उससे भी अधिक दूर है जितना उनके लिए 'दिल्ली दूर' है। 

अब भाजपा की ओर चलते हैं। भाजपा ने नोटबंदी में लगभग सफलता पा ली है, पर वह वोटबंदी में अभी सफल होती नही दीख रही। उसके लिए मुस्लिम मतदाता अब भी दूरी बनाये खड़ा है। उसका लक्ष्य था कि इस बार मुस्लिम मतदाता को धु्रवीकरण करने से रोका जाए। परंतु सपा की कलह से मुस्लिम मतदाता अखिलेश के साथ खड़ा हो गया  लगता है। यही कारण है जो भाजपा को दुखी कर रहा है, फिर भी उनका चेहरा अर्थात नरेन्द्र मोदी प्रदेश की जनता को समान रूप से आकर्षित कर रहे हैं। मोदी के बढ़ते कदम उनके विरोधियों को एक हो जाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। सारा विपक्ष इस समय एक अखिलेश के पीछे आ जाए तो उसे सफलता भी मिल सकती है, पर भाजपा के लिए सुखदायी स्थिति केवल यह है कि भरसक प्रयासों के उपरांत भी सपा बसपा एक नही हो पाएंगी। सपा कांग्रेस या बसपा कांग्रेस एक हो सकती हैं-पर बसपा और सपा नहीं। कुल मिलाकर विपक्ष का बिखरे रहना भाजपा के लिए सुफलदायक हो सकता है।
इसके उपरंात भी भाजपा में एक सर्वमान्य नेता का मुख्यमंत्री के लिए चयन न हो पाना, अभी तक अपने प्रत्याशियों का चयन भाजपा द्वारा न किया जाना-ये दो ऐसे कारण हैं जिनके चलते प्रदेश का मतदाता अभी तक भाजपा की ओर खुलकर भाग नही पा रहा है।

इस सबके उपरांत भी वर्तमान में भाजपा और सपा में टक्कर होना निश्चित लग रहा है। सपा ने अपने आपको तीसरे स्थान पर जाने से रोक लिया है। निश्चय ही कुछ समय पूर्व प्रदेश में बसपा और भाजपा की टक्कर चल रही थी, पर इस समय स्थिति में कुछ परिवर्तन आ गया है।  देश के सर्वोच्च न्यायालय ने चुनावी प्रक्रिया को पूर्णत: पंथनिरपेक्ष बनाने की दिशा में ठोस पहल की है, और जाति-संप्रदाय को चुनावों से दूर रखने के आदेश राजनीतिक दलों के लिए दिये हैं। अब खुल्लम-खुल्ला मायावती जाति और संप्रदाय का उपयोग नही कर पाएंगी। अच्छा हो कि कोई राजनीतिक दल आगामी चुनावों में ऐसा कुछ भी न कर पाएं जिससे सामाजिक स्वास्थ्य पर विपरीत  प्रभाव पड़े। नोटबंदी से वोटबंदी और वोटबंदी से अब माननीय न्यायालय की इस हदबंदी से परिस्थितियां काफी हद तक स्पष्ट हो गयीं हैं। जाति और संप्रदाय की राजनीति करने वाला अब कोई भी दल अपनी जीत का दम ठोंककर दावा नही कर सकता। भाजपा और सपा में टक्कर होती दीख रही है, यदि चुनाव आयोग और सक्रिय हुआ और उसने पूर्णत: न्यायपूर्ण चुनाव कराये तो यूपी के आगामी चुनाव बहुत ही रोचक बन जाएंगे। इस बार लखनऊ के सिंहासन का स्वामी वही बनेगा जो इन चुनावों में नीति, नियम और न्याय में विश्वास करते हुए आगे बढ़ेगा।