नोटबंदी से प्रभावित होंगे छोटे उद्योग

  • 2016-12-22 12:30:01.0
  • डा. भरत झुनझुनवाला

नोटबंदी से प्रभावित होंगे छोटे उद्योग

वस्तुस्थिति से सरकार का उद्देश्य स्पष्ट होता है। सरकार की दृष्टि बड़े उद्योगों को बढ़ावा देने की है, जो कि टैक्स अदा करते हैं। छोटे उद्योगों से सरकार को कोई लाभ नहीं है। बड़े उद्योगों के विस्तार के अनेक लाभ हैं। यथा सरकार को टैक्स ज्यादा मिलेगा, सरकारी कर्मियों के वेतनमान बढ़ेंगे, सरकारी ठेकों की संख्या बढ़ेगी। अतएव सरकार ने युक्ति निकाली कि नोटबंदी के माध्यम से छोटे उद्योगों को बैंक के माध्यम से व्यापार करने पर मजबूर करो, उन्हे टैक्स अदा करने को मजबूर करो, वे बंद हो जाएंगे.

सरकार ने नोटबंदी को काले धन के सफाए के अस्त्र के रूप में पेश किया है, परंतु लगभग पूरा कालाधन बैंकों में जमा होकर 'सफेद' हो गया है। रिजर्व बैंक के अनुसार 500 तथा 1000 रुपए के कुल 14.5 लाख करोड़ रुपए की मुद्रा अर्थव्यवस्था में प्रचलन में थी। इसमें से 12.50 लाख करोड़ रुपए लेख लिखते समय बैंक में जमा हो चुके थे। आने वाले 15 दिनों में शेष नोट भी बैंकों में जमा हाने की संभावना है। कालेधन को नष्ट करने का उद्देश्य पूरी तरह असफल रहा है, बल्कि काला धन पुन: नए नोटों में पैदा हो चुका है। करोड़ों रुपए के नए नोट जब्त हो रहे हैं। इससे प्रमाणित होता है कि काला धन पूर्ववत जारी है। नोटबंदी का असल प्रहार स्माल स्केल इंडस्ट्रीज पर हुआ है। तमाम उद्योग बंद हो रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि नोटबंदी को लेकर सरकार का मूल उद्देश्य छोटे उद्योगों का सफाया करके बड़े उद्योगों को खुला मैदान उपलब्ध कराना है। छोटे उद्योगों की तुलना में बड़े उद्योग ज्यादा कुशल होते हैं। इनके द्वारा बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है। जैसे गुड़ बनाने के उद्योग में प्रतिदिन 10 बोरी गुड़ बनता है, तो चीनी मिल में 5000 बोरी। गुड़ के उद्योग में गन्ने के रस को कढ़ाइयों में डालकर उबाल कर गाढ़ा किया जाता है। इसमें ईंधन की खपत ज्यादा होती है। चीनी मिल में उसी रस को भाप से इवेपोरेटर मशीन में गाढ़ा किया जाता है। इसमें ईंधन कम लगता है। बड़ी मिलों द्वारा कुशल कारीगरों को ऊंचे वेतनमानों पर तैनात किया जाता है। इनके पास क्वालिटी कंट्रोल के लिए प्रयोगशाला उपलब्ध रहती है। इन मिलों के द्वारा उत्पादित चीनी की गुणवत्ता बेहतरीन और दाम कम होते हैं। तुलना में गुड़ में मिठास कम और दाम ज्यादा होता है। इसी प्रकार कपड़ा, कागज, रोलिंग मिल इत्यादि में बड़े उद्यमों में लागत कम आती है।

बड़ी कंपनियों की इस कुशलता के बावजूद अब तक की हमारी सरकार छोटे उद्योगों को समर्थन देती रही है, चूंकि छोटे उद्योगों द्वारा रोजगार ज्यादा बनाए जाते हैं। जैसे 5,000 बोरे प्रतिदिन बनाने वाली चीनी की फैक्टरी में 1000 श्रमिक लगते हैं। इतने ही बोरे गुड़ बनाने में कम से कम 20,000 श्रमिक लगेंगे, क्योंकि गुड़ बनाने में सभी काम श्रमिकों द्वारा किए जाते हैं यथा ट्रैक्टर से गन्ने को उतारना, क्रशर में गन्ने को डालना, खोई को सुखाना, रस को उबालना एवं जमाना इत्यादि। छोटे उद्योग उद्यमिता विकास के भी केंद्र होते हैं। जैसे धीरुभाई अंबानी कभी छोटे उद्यमी थे। वह छोटे उद्यमी बन सके, चूंकि सरकार ने छोटे उद्योगों को संरक्षण दे रखा था। 

यदि इन्हें संरक्षण नहीं दिया गया होता, तो धीरुभाई न तो छोटे उद्यमी बन पाते और न ही समयक्रम में बड़े उद्यमी बन पाते। छोटे बच्चे को बड़े युवाओं से संरक्षण दिया जाता है, तब ही वह बड़ा होकर ताकतवर बनता है। इसी प्रकार छोटे उद्योगों को सरकार इसलिए संरक्षण देती है कि वे बड़े उद्योगों का सामने खड़े हो सकें। सारांश यह है कि छोटे उद्योगों की उत्पादन लागत ज्यादा आती है, परंतु समाज इस भार को वहन करता है, चूंकि इनके द्वारा रोजगार उत्पन्न किए जाते हैं। साथ ही ये उद्यमिता विकास की पाठशालाएं भी हैं। बड़े उद्योगों के सस्ते माल के सामने छोटे उद्योगों के टिक पाने में बड़ी भूमिका नकद कारोबार की है। जैसे गुड़ के कारखाने द्वारा गन्ना नकद में खरीदा जाता है, श्रमिकों को वेतन नकद में दिया जाता है और गुड़ को नकद में बेचा जाता है। पूरे कारोबार में एक्साइज ड्यूटी, सेल्स टैक्स तथा इनकम टैक्स अदा नहीं किया जाता है।

कहा जा सकता है कि नकद में यह कारोबार गैर कानूनी है। लेकिन समाज इसे स्वीकार करता है, चूंकि ऐसे कारोबार रोजगारपरक हैं। साथ ही छोटे उद्यमियों को आगे बढ़ाने में सहायक हैं। कानून का विषय अलग है। संभव है कि समाज सही और कानून गलत हो। कानून में संशोधन की जरूरत हो। बहरहाल इतना कहा जा सकता है कि नकद में धंधा करने के कारण ही छोटे उद्योग टैक्स देने से बचते हैं और जीवित हैं। यहीं नोटबंदी का प्रभाव पड़ता है। सरकार चाहती है कि छोटे उद्योगों द्वारा खरीद-बेच बैंक के माध्यम से की जाए। ऐसा होने से उद्योग टैक्स के दायरे में आ जाएंगे। उदाहरण के लिए वर्तमान में इनके द्वारा श्रमिक को नकद पेमेंट किया जाता है। प्राविडेंट फंड नहीं काटा जाता है। श्रमिक को बैंक से पेमेंट करने पर वह रोजगार कागजों में आ जाएगा। लेबर इन्सपेक्टर द्वारा इनसे प्राविडेंट फंड वसूला जाएगा। इसी प्रकार राज्यों में गन्ने की खरीद एवं गुड़ की बिक्री पर मंडी टैक्स आदि वसूल किया जा सकता है। नोटबंदी के कारण छोटे उद्योगों को टैक्स देना होगा। इनका माल महंगा हो जाएगा। ये बड़े उद्योगों के सामने नहीं टिक सकेंगे। नोटबंदी से छोटे उद्योग बंद होंगे। छोटे उद्योग पहले ही बड़े उद्योगों के सामने टिक नहीं पा रहे हैं। बैंकों द्वारा छोटे उद्योगों को दिए जाने वाले ऋण में जनवरी 2016 में 2.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। जून 2016 में इनको दिए जाने वाले ऋण में 3.6 प्रतिशत की गिरावट आई है।

स्पष्ट है कि छोटे उद्योग दबाव में हैं। कारण कि नई तकनीकों ने छोटे उद्योगों की रफ्तार में ब्रेक लगा दी है। जैसे पहले आपको एक किलो गोभी चाहिए थी, तो आप स्वयं नुक्कड़ के ठेले वाले से जाकर खरीद कर लाते थे। अब आप ग्रोसरी स्टोर को ऑनलाइन आर्डर दे सकते हैं और माल आपके दरवाजे पर पहुंच जाएगा। नुक्कड़ के ठेले वाले का धंधा चौपट हो रहा है। इसी प्रकार ब्रेड, बिस्कुट, दर्जी, टैक्सी आदि के धंधे बड़े उद्योगों द्वारा छीने जा रहे हैं। तकनीक के इस आतंक के बाद नोटबंदी का प्रभाव छोटे उद्योगों के कफन में कील ठोंकने जैसा होगा। वस्तुस्थिति से सरकार का उद्देश्य स्पष्ट होता है। सरकार की दृष्टि बड़े उद्योगों को बढ़ावा देने की है, जो कि टैक्स अदा करते हैं। छोटे उद्योगों से सरकार को कोई लाभ नहीं है। बड़े उद्योगों के विस्तार के अनेक लाभ हैं। यथा सरकार को टैक्स ज्यादा मिलेगा, सरकारी कर्मियों के वेतनमान बढ़ेंगे, सरकारी ठेकों की संख्या बढ़ेगी। अतएव सरकार ने युक्ति निकाली कि नोटबंदी के माध्यम से छोटे उद्योगों को बैंक के माध्यम से व्यापार करने पर मजबूर करो, उन्हे टैक्स अदा करने को मजबूर करो, वे बंद हो जाएंगे। बड़े उद्योगों को खुला मैदान उपलब्ध कराकर अधिक टैक्स हासिल करो, ताकि सरकारी कर्मियों के बजट में वृद्धि हो सके। जय हो साफ-सुथरी अर्थव्यवस्था की!