आशाओं-निराशाओं के बीच में नोटबंदी

  • 2016-12-14 08:00:00.0
  • उगता भारत ब्यूरो

आशाओं-निराशाओं के बीच में नोटबंदी

जगदीश बाली
लोगों को आशाएं हैं कि कुछ महीनों में देश की शक्ल-औ-सूरत बेहतर होगी। कुछ सवाल भी हैं, पर सवाल तो हर काम के साथ जुड़े होते हैं और आशा है सरकार जवाब भी तलाशेगी। फिलहाल आशा तो यही है कि आम आदमी के जीवन की बगिया में बहार आएगी। इसलिए काले धन के विरुद्ध इस कतार में मेरा भी एक कदम दर्ज किया जाए.

देश के प्रधानमंत्री ने आठ नवंबर की शाम राष्ट्र के नाम एक आवाज दी, विमुद्रीकरण और 1000 और 500 के नोट बंद! इस उद्घोष को सुनकर राष्ट्र के आम जनकंठ से आवाज आई-हम सब एक हैं। अगले दिन तडक़े से हर बैंक व एटीएम के सामने लंबी कतारों में आम लोग खड़े होने लगे और कहीं उन्हीं कतारों में एक आम आदमी मैं भी था। कतार में लगा मैं मन ही मन खुश हो रहा था कि काला धन और भ्रष्टाचार को समाप्त करने की इस कवायद का मैं भी हिस्सा हूं। हर शहर, हर गांव, हर गली, हर कूचे में आजकल एक पर्व चल रहा है, जिसे ईमानदारी का महकुंभ कहा जा रहा है। अखबारों के पन्नों में, टीवी चैनल्स पर, आम सडक़ पर, कार्यालयों में चर्चा-ए-आम है कि काले धन वालों की अब खैर नहीं। बैंकों, एटीएम के आगे लंबी-लंबी कतारें इस बात का सबूत हैं कि आम आदमी चाहे-अनचाहे काले धन के विरुद्ध खड़ा है। लोग अपनी नींद, चैन त्याग कर घंटों कतारों में इंतजार कर रहे हैं, क्योंकि उनकी जेबों में जो पुराने नोट हैं, वे कह रहे हैं-हमें फिर से अपना बना लो सनम। इन नोटों को फिर से अपना बनाने की जद्दोजहद में परेशान तो वे जरूर हैं, फिर भी इस मुहिम का विरोध नहीं कर रहे।

हालांकि खबरें हैं कि कई लोगों की जीवन लीला भी इस ठेलम-ठेल में खत्म हो गई, मगर आम आदमी की तरफ से कहीं कोई विरोध का हो-हल्ला नहीं। कोई तडक़े आकर कतारबद्ध हो जाता है और जब सांझ होते भी उसका नंबर नहीं आता, वह निराश हो कहता है-आ अब लौट चलें। अगले दिन फिर कतारबद्ध होने के लिए फिर पहुंचता है और भ्रष्टाचार के विरुद्ध चली इस मुहिम का वह भी एक हिस्सा बन जाता है। उफ और ओफ तो करता है, पर सरकार के विमुद्रीकरण के इस कदम को कतई नहीं कोसता, उल्टे दो-चार अल्फाज समर्थन के कह देता है। कई गृहिणियों को इस चीज का मलाल तो है कि उनके द्वारा चोरी से संजोया हुआ धन चला गया या और घर वालों की नजर में भी आ गया है। उन्हें अपनी इस छोटी सी आर्थिक आजादी के छिनने की टीस तो है, परंतु इसे राष्ट्रहित की कवायद मानकर उन्होंने भी खुद को तसल्ली दे दी है। मजदूर, किसान, दिहाड़ीदार, रिक्शा, पान और ठेले वाले किसी ने रोटी त्यागी, किसी का चूल्हा नहीं जला, पर विरोध का एक भी नारा नहीं लगाया। हां, कुछ राजनीतिक दल जरूर चिल्ला रहे हैं, परंतु उनके इस विरोध को आम लोग छलावा ही समझ रहे हैं।

देश का आम लोग सरकार की इस मुहिम में शामिल है, परंतु खास लोग नजर नहीं आ रहे। हल्ला यह है कि इन धनकुबेरों की नींद हराम है, परंतु क्या वाकई असलियत में ऐसा है? एक पहलू यह है कि इन धनकुबेरों के बैंक खातों में पहले ही इतना धन है कि अगर ये अपने काले धन को सफेद करने का जुगाड़ नहीं भी कर पाए, तो भी इन्हें काला धन लुटने से कोई ज्यादा फर्क नहीं, क्योंकि इनके जीने के अंदाज में कोई ज्यादा बदलाव नहीं आने वाला।
इनका काला धन न तो बाहर आएगा न ही ये कतार में खड़े होंगे। जाहिर है कतार में तो आम लोग ही बचे हैं, क्योंकि अग्नि परीक्षा तो केवल ईमानदारों की ही होती है न। प्रधानमंत्री ने आग्रह किया है-सिर्फ पचास दिन का साथ चाहिए। यही मान कर तो आम आदमी आज कतारों में खड़ा है। पचास दिन क्या, उसने तो तो पांच साल आप के हवाले किए हैं। लेकिन उसके बाद क्या? क्या उसके बाद उसके अच्छे दिन आ जाएंगे? आम आदमी कब यह समझे कि उसकी आशाएं पूरी हुई हैं। नोट बदलने के बाद भी आम आदमी इन अच्छे दिनों की आस में कब तक कतार में खड़ा रहेगा? उसे कब यह लगेगा कि इस नोट की अदला-बदली ने उनके जीवन में बहार ला दी और उसके अच्छे दिन आ गए हैं? एक गरीब की आशा है कि काला धन खत्म होते ही शायद कुछ उसके खाते में भी आएगा। वह उम्मीद कर रहा है कि उसकी दाल, रोटी, भाजी सस्ती होगी। वह आस लगाए बैठा है कि दवाइयां सस्ती होंगी और उसे अपनी या परिवार वालों की बीमारियों की ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं होगी। उसे अपने बच्चों की उच्च और बेहतर शिक्षा के लिए मोटी रकम की जरूरत नहीं होगी। एक तबका इस आशा में है कि उनका टैक्स का भारी बोझ कुछ तो हल्का होगा। बमुश्किल स्कूटर, मारुति या ऑल्टो-800 का जुगाड़ करने वाला आशा कर रहा है कि जल्द ही सफर करना उसकी जेब पर भारी नहीं पड़ेगा।

निम्न मध्यम वर्ग उम्मीद लगाए बैठा है कि बैंकों से ऋण कम ब्याज पर मिल पाएगा। अगर बड़े-बड़े नामी गिरामियों व वांछित अपराधियों का हजारों का ऋण राइट ऑफ किया जा सकता है, तो कम से कम इतना तो आम आदमी सोच ही सकता है कि उसे कम ब्याज पर ऋण मिल जाए। खबर है कि बैंकों ने फिक्स्ड डिपॉजिट पर ब्याज तो कम कर दिया है, पर क्या ऋणों पर भी ब्याज दर कम हो पाएगी? कहा जा रहा है कि जाली नोट के बल पर फैलाए जा रहे आतंकवाद पर भी लगाम लगेगी। पर इस बात की क्या गारंटी है कि 2000 के जाली नोट नहीं छपेंगे, अगर छपे तो पकड़े जाएंगे।
भविष्य में यह आशा क्यों की जाए कि 2000 के नोट के चलते भ्रष्टाचार नहीं पनपेगा औए काला धन फिर से एकत्रित नहीं होगा? कुल मिलाकर लोगों को आशाएं हैं कि कुछ महीनों में देश की शक्ल-औ-सूरत बेहतर होगी। कुछ सवाल भी हैं, पर सवाल तो हर काम के साथ जुड़े होते हैं और आशा है सरकार जवाब भी तलाशेगी। फिलहाल आशा तो यही है कि आम आदमी के जीवन की बगिया में बहार आएगी। इसलिए काले धन के विरुद्ध इस कतार में मेरा भी एक कदम दर्ज किया जाए।