नोटबंदी हमारे लिए साधन है, साध्य तो अभी दूर है

  • 2016-11-23 09:30:04.0
  • डा. भरत झुनझुनवाला
नोटबंदी हमारे लिए साधन है, साध्य तो अभी दूर है

सरकार के सामने सरकारी खर्चों की गुणवत्ता सुधारना असल चुनौती है। भारत सरकार का जनहित हासिल करने का पुराना नुस्खा है कि जनकल्याण के नाम पर शिक्षा, स्वास्थ्य एवं रोजगार गारंटी के कार्यक्रमों में सरकारी कर्मचारियों को पोषित करो। इन खर्चों से जनता को लाभ होना संदिग्ध है, परंतु सरकारी कर्मचारियों को लाभ होना निश्चित है। यदि सरकारी राजस्व की बर्बादी वर्तमान की तरह होती रही, तो नोटबंदी से जनता पर कर का बोझ बढ़ेगा और पूरा आपरेशन जनता के लिए अभिशाप बन जाएगा.

500 तथा 1000 रुपए के नोट बंद करके सरकार ने साहसिक और सराहनीय कदम उठाया है। आज देश में बड़े पैमाने पर नकद में धंधा हो रहा है, जिससे कर से बचा जा रहा है। मसलन मुझे कभी-कभी न्यायालय में पर्यावरण संबंधित वाद दायर करने हेतु हजारों पन्ने फोटो कापी कराने पड़ते हैं। मेरे फोटोकापियर मित्र इसकी रसीद नहीं देते हैं, चूंकि वे कागज को नकद में खरीदते हैं। इस कागज को बनाने वाली फैक्टरी और बेचने वाला दुकानदार भी कर नहीं देते हैं। फोटोकापियर मित्र को भी इससे हुई आय पर कर नहीं देना होता है। यदि इस फोटोकापी का भुगतान मैं डेबिट कार्ड से करूं तो यह बिक्री फोटोकापियर के खाते में दिखेगी। इस बिक्री के लिए उन्हें कागज की खरीद भी खाते में दिखानी होगी। क्रमश: दुकानदार एवं फैक्टरी को भी इस बिक्री को खाते में दिखाना होगा और उस पर कर देना होगा। आज देश का एक वर्ग कर की चोरी कर मजे उड़ा रहा है, जबकि दूसरा वर्ग कर के बोझ से दबता जा रहा है। इसलिए बड़े नोटों को निरस्त करने के सरकार के कदम का भरपूर स्वागत किया जाना चाहिए। आने वाले समय में इन दोनों वर्गों के बीच सामाजिक न्याय स्थापित होगा।

इसके बावजूद सरकार के सामने सरकारी खर्चों की गुणवत्ता सुधारना असल चुनौती है। भारत सरकार का जनहित हासिल करने का पुराना नुस्खा है कि जनकल्याण के नाम पर शिक्षा, स्वास्थ्य एवं रोजगार गारंटी के कार्यक्रमों में सरकारी कर्मचारियों को पोषित करो। इन खर्चों से जनता को लाभ होना संदिग्ध है, परंतु सरकारी कर्मचारियों को लाभ होना निश्चित है। निजी स्कूलों के अध्यापकों की तुलना में सरकारी अध्यापक 10 गुना वेतन पाते हैं और वर्ष के अंत में आधा परिणाम देते हैं। सरकारी अस्पतालों में मरीज अपने पैसों से दवा खरीद कर लाते हैं और उनके लिए सप्लाई की गई दवाओं को ब्लैक किया जाता है। रोजगार गारंटी योजना के अंतर्गत प्रधानों द्वारा 30 से 50 फीसदी कमीशन सरकारी अधिकारियों को दिया जा रहा है।

पिछले साठ वर्षों से सरकार ने ऐसी नीतियां बनाई हैं, जिनसे गरीबी बढ़े जैसे बड़ी कपड़ा मिलों को प्रोत्साहन देकर जुलाहे के रोजगार को समाप्त कर दिया गया है। साठ के दशक में वाराणसी के सारनाथ इलाके में रोड के किनारे जुलाहों को साड़ी की बुनाई करते दिख जाना आम बात थी। आज ये बुनकर लुप्त हो गए हैं। ऐसे स्वरोजगारियों को गरीब बनाने के बाद उनकी गरीबी मिटाने के लिए सरकारी कर्मचारियों की फौज खड़ी की गई है। जनता भ्रम में रहती है कि उसके बच्चे को मुफ्त शिक्षा मिल रही है, जबकि बच्चे को घटिया शिक्षा देकर आजीवन गरीब बनाए रखा जाता है। गांधीजी ने कहा था कि नंगे को कपड़े नहीं, स्वरोजगार दीजिए, परंतु कल्याणकारी कर्मचारियों के सरदारों को यह नागवार लगता है। नोटबंदी को सार्थक दिशा देने के लिए सरकारी खर्चों का वर्गीकरण इस प्रकार हो कि सच्चे और झूठे खर्चों का स्पष्ट भेद हो जाए। जरूरत इस बात की है कि सरकारी कर्मचारियों को पोसने के स्थान पर जनता को पोसा जाए।

पिछली एनडीए सरकार के कार्यकाल में विजय केलकर की अध्यक्षता में वित्तीय घाटा नियंत्रित करने के संबंध में एक कमेटी बनाई गई थी। केलकर ने सुझाव दिया था कि सरकारी खर्चों को सार्वजनिक एवं निजी सेवाओं में वर्गीकृत किया जाना चाहिए। सार्वजनिक सेवाएं वे हैं, जिन्हें व्यक्ति बाजार से नहीं खरीद सकता। ये केवल सरकार ही मुहैया करा सकती है, जैसे-नहर, सडक़, बिजली, कानून, न्याय, रक्षा, मुद्रा, शिक्षा के लिए पाठ्यक्रम तय करना, परीक्षा लेना, प्रमाण पत्र जारी करना इत्यादि। ये ऐसी मदें हैं, जिनका कार्यान्वयन सरकार ही कर सकती है, व्यक्ति विशेष नहीं कर सकता।
 इस प्रकार की सार्वजनिक सुविधाओं पर सरकारी खर्च का सुप्रभाव प्रमाणित है। उदाहरण के लिए केएन रेड्डी ने एक अध्ययन में पाया था कि स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जन शिक्षा, अनुसंधान, प्रयोगशालाएं, संक्रामक रोगों से बचाव इत्यादि सार्वजनिक सुविधाओं पर किए गए खर्च से जन स्वास्थ्य में ज्यादा लाभ हुआ है। इसके विपरीत सरकारी अस्पतालों में उपचार पर किए गए खर्च का जन स्वास्थ्य पर प्रभाव न्यून रहा। ये निजी खर्च थे।

इस अंतर का कारण यह रहा कि अनुसंधान, प्रयोगशालाएं आदि सेवाओं की उपलब्ध्ता से जनता की स्वयं स्वस्थ रहने की इच्छा गहरी होती है, जबकि मुफ्त उपचार उपलब्ध होने से जनता स्वयं अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह हो जाती है। जैसे मुफ्त में पाचक उपलब्ध हो, तो व्यक्ति बासी भोजन खाने में परहेज नहीं करता है। पाठ्यक्रम एवं परीक्षा सही हो, तो छात्रों में पढऩे की प्रवृत्ति स्वयं बनती है, परंतु सरकार ने व्यवस्था कर रखी है कि नकल करके बच्चे पास हो जाते हैं और इस कार्य के लिए सरकारी शिक्षकों को ऊंचा वेतन दिया जाता है। यदि सरकार परीक्षा सख्त कर दे, तो छात्र स्वयं पढऩे लगेंगे। नोटबंदी को सही दिशा देने के लिए सरकारी खर्चों को 'सार्वजनिक सुविधाओं' और 'निजी सुविधाओं' के वर्गों में बांटना चाहिए, जैसा केलकर ने सुझाव दिया था। सरकार की पहली जिम्मेदारी उन सुविधाओं को सुचारू रूप से उपलब्ध कराना है, जिन्हें जनता स्वयं हासिल नहीं कर सकती है। हमें प्रतिदिन बताया जा रहा है कि बुनियादी संरचना में अमुक हजार करोड़ रुपए निवेश की जरूरत है। यदि सरकार इस निवेश को अंजाम दे दे, तो रोजगार स्वयं ही उत्पन्न हो जाएंगे। कानून व्यवस्था सही होने से बिहार के लोगों ने जमीन पड़ती छोडऩे के स्थान पर सब्जी इत्यादी उगाना शुरू कर दिया है। यही बात गांधीजी ने कही थी, परंतु कल्याणकारी माफिया के सरदारों को यह नुस्खा पसंद नहीं आता है। यदि मलेरिया के लिए तालाब का छिडक़ाव हो गया, तो ग्रामीणों का स्वास्थ्य ठीक हो जाएगा तो सरकारी डाक्टरों की नियुक्ति का आधार ही नहीं रह जाएगा। यदि परीक्षा व्यवस्था ठीक हो गई तो न पढ़ाने वाले सरकारी गुरुओं का भंडाफोड़ हो जाएगा।

यूपीए सरकार के कर्णधार सी रंगराजन, मनमोहन सिंह और मानटेक अहलूवालिया सभी मूल रूप से सरकारी नौकर रहे थे। अपने कुनबे का हित उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता थी। इस दुराग्रह को पूरा करने के लिए नुस्खा निकाला था कि तालाब का छिडक़ाव एवं परीक्षा में सुधार कम करो और सरकारी सरकारी डाक्टरों एवं अध्यापकों की नियुक्ति अधिक करो। गांव में सडक़ और सिंचाई कमजोर बनाए रखो, जिससे वे रोजगार न कर सकें। फिर उनकी गरीबी दूर करने के लिए सरकारी शिक्षकों और स्वास्थ्य कर्मियों की फौज खड़ी कर लो और रोजगार गारंटी के कमीशन वसूलने का रास्ता खोल दो। सरकार के सामने सरकारी खर्चों की गुणवत्ता सुधारना असल चुनौती है। यदि सरकारी राजस्व की बर्बादी वर्तमान की तरह होती रही, तो नोटबंदी से जनता पर कर का बोझ बढ़ेगा और पूरा आपरेशन जनता के लिए अभिशाप बन जाएगा।