बाजारवाद : नए रास्ते की तलाश में

  • 2016-12-30 08:30:24.0
  • मनोज कुमार
बाजारवाद : नए रास्ते की तलाश में

बाजार की गति को अब राष्ट्र-राज्य तय नहीं कर रहे हैं बल्कि वे बाजार की शक्तियों के सामने या तो असहाय हैं या नतमस्तक। यह बाजार अर्थशास्त्र के लिखित सिद्धांतों और नियम-कानूनों के मुताबिक भी नहीं चलता। बाजार की शक्तियां इतनी प्रबल हो चुकी हैं और इतने मुक्त रूप से काम कर रही हैं कि कोई भी देश या सरकार उन पर अंकुश लगाने में सक्षम नहीं है।
इंग्लैंड में ब्रेक्जिट और अमेरिका में ट्रम्प की जीत से कई तरह के नए संकेत मिले हैं। ये संकेत इन दोनों देशों की आंतरिक राजनीतिक-आर्थिक व सामाजिक उथल-पुथल के बारे में भी हैं और अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य के बारे में भी। जो तस्वीरें बन रही हैं वे कुल मिलाकर धुंधली ही हैं और उससे भ्रम ही ज्यादा फैल रहा है। ऐसी ही एक धुंधली और भ्रमपूर्ण तस्वीर भूमंडलीकरण के भविष्य को लेकर है। ब्रेक्जिट यूरोप में वर्तमान भूमंडलीकरण के ताबूत में कील साबित होगा और ट्रम्प की जीत भूमंडलीकरण के सिरमौर अमेरिका में ही इसे नेस्तनाबूद कर देगी ऐसा भी निष्कर्ष निकाला जा रहा है। ट्रम्प ने तो जलवायु समझौतों से अलग होने की घोषणा अभी से कर दी है।
असल में पिछले ढाई दशक से चल रहे भूमंडलीकरण से जो लाभ उठाए जा सकते थे वे इग्लैंड, अमेरिका और अन्य विकसित देशों का कॉरपोरेट जगत लगभग उठा चुका है। कॉरपोरेट नियंत्रित और संचालित वैश्विक पूंजीवाद को और आगे ले जाने में भूमंडलीकरण के वर्तमान स्वरूप की प्रासंगिकता अब संदेहास्पद हो चली है। नई संकटपूर्ण वैश्विक परिस्थितियों में कॉरपोरेटी पूंजीवाद नए रास्ते तलाश रहा है। इस तलाश से ही संभवत: ब्रेक्जिट और ट्रंप की जीत निकली है। आखिर वे कौन-सी परिस्थितियां हैं जो कॉरपोरेटी पूंजीवाद को नया रास्ता खोजने के लिए प्रेरित कर रही हैं।
यूरोप में औद्योगिक पूंजीवाद के विकास के साथ-साथ राष्ट्र-राज्यों का उदय हुआ था। औद्योगिक पूंजीवाद के लिए जरूरी बाजार, पूंजी और विज्ञान व तकनीकी के विकास को राष्ट्र-राज्यों का संरक्षण तथा प्रोत्साहन मिला। 1782 में अमेरिकी क्रांति और उसके बाद फ्रांसीसी क्रांति ने ऊंचे और आदर्शवादी लक्ष्य रखने के बावजूद हकीकत में राष्ट्र-राज्यों और पूंजीपतियों के गठजोड़ से इन देशों में इग्लैंड जैसे औद्योगिक विकास को ही लाने का काम किया। 1592 में कोलंबस की यात्रा से शुरू हुए भूमंडलीकरण ने आज 2016 में पूंजीवाद और राष्ट्र-राज्य के गठजोड़ की मदद से अपनी वह चरम अवस्था प्राप्त कर ली है जिसमें राष्ट्र-राज्य उसके लिए पहले की तरह मददगार नहीं रह गए और एक तरह से अपनी प्रासंगिकता खोते जा रहे हैं। इसलिए वर्तमान वैश्विक पूंजीवाद ऐसे नए हथियार और संस्थाएं विकसित करे जो राष्ट्र-राज्यों की परिधि और उसके नियमन से बाहर हो।

इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है आज का बाजार, जो सर्वव्यापी हो चुका है। इसके दायरे में पृथ्वी की प्रत्येक वस्तु आ गई है। जल, जंगल, जमीन, खनिज, हवा से लेकर मनुष्य की मेधा, बौद्धिकता, जीवों की कोशिकाएं और जर्मप्लाज्म, मां की कोख, अंतरिक्ष की कक्षाएं और तरंगें भी इस दायरे के अंदर हैं। यह सर्वव्यापी बाजार अब सभी तरह के नियंत्रणों से भी लगभग मुक्त हो चुका है। 
बाजार की गति को अब राष्ट्र-राज्य तय नहीं कर रहे हैं बल्कि वे बाजार की शक्तियों के सामने या तो असहाय हैं या नतमस्तक। यह बाजार अर्थशास्त्र के लिखित सिद्धांतों और नियम-कानूनों के मुताबिक भी नहीं चलता। बाजार की शक्तियां इतनी प्रबल हो चुकी हैं और इतने मुक्त रूप से काम कर रही हैं कि कोई भी देश या सरकार उन पर अंकुश लगाने में सक्षम नहीं है। इस बाजार में समानता का सिद्धांत नहीं बल्कि जिसकी लाठी उसकी भैंस का जंगल का कानून उसके साथ चलता है। उसे कोई चुनौती कहीं से भी नहीं मिल रही। भूमंडलीकरण ने इस बाजार को निर्मित किया है और यदि वैश्विक कॉरपोरेटी पूंजीवाद को आगे बढऩा है तो इसी बाजार के तंत्र को और इसके कॉरपोरेटी नियमन को आगे बढ़ाना होगा।
दूसरी महत्त्वपूर्ण चीज अनियंत्रित पूंजी का भारी सकेंद्रण है। आज पांच सौ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास दुनिया की आधी से ज्यादा पंूजी है। केवल 1 प्रतिशत लोग इस विशाल पूंजी के मालिक हैं और उन्हीं की जरूरतों के हिसाब से यह पूंजी आती-जाती है। इस पूंजी के लिए राष्ट्रों की सीमाओं का और उनके नियमनों का कोई अर्थ नहीं है, न ही कोई देश इसका अपना घर है, पूरा विश्व ही इसका घर और खेल का मैदान है। डिजिटल करेन्सी बिटकाइन का प्रादुर्भाव पूंजी के लेन-देन का अनियंत्रित रास्ता पक्का करता है। इस पूंजी को इक_ा करने में राष्ट्र-राज्यों की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही और उपनिवेशों की लूट को राष्ट्र-राज्यों ने सुगम और सुसाध्य बनाया।
पर अब यह पूंजी प्रौढ़ हो चुकी है और अब आगे इसे राष्ट्र-राज्यों की जरूरत नहीं है, उनके द्वारा इसकी सुरक्षा में लड़े गए युद्धों की भी शायद जरूरत नहीं है। यह बिना युद्ध के ही देशों को, समाजों को तबाह कर सकती है। एक मायने में यह मारक रूप से उच्छृंखल हो चुकी है। बिना ज्यादा सोच-विचार के कहीं भी हमला कर सकती है। इसके हमले का एक पहलू यह है कि आम जनता इसके हमले को देख और समझ नहीं सकती। इसका सबसे घातक और मारक हथियार है मीडिया और सूचना तकनीकी, जो मिनटों में मुद््दों की तस्वीर बदलने की क्षमता रखते हैं। बाजार को यही पूंजी नियंत्रित और संचालित करती है। 
मीडिया और सूचना तकनीक बाजारू मूल्यों का विस्तार और उन्हें स्थापित करते हैं। बाजार के साथ इस पूंजी को आगे बढऩा है तो विश्व में नए तरह के राजनीतिक और आर्थिक संबंध गढऩे होंगे।
तीसरी चीज। जिस तरह का एकाधिकार और नियंत्रण विज्ञान और तकनीकी पर आज वैश्विक कॉरपोरेटी व्यवस्था का है वैसा पहले किसी एक स्वतंत्र सत्ता का कभी नहीं रहा। विज्ञान और तकनीक का जैसा उपयोग बाजार के विस्तार और दुनिया भर से निचोड़ कर पूंजी के सकेंद्रण में भूमंडलीकरण के वर्तमान दौर में किया गया है वह अदभुत, पर डरावना है। सूचना तकनीकी ने इसके पक्ष में विश्व भर में आमराय बनाने, भोगवादी संस्कृति के प्रसार और आम लोगों को भ्रमित करने में हथियार की तरह काम किया है।
विज्ञान और तकनीकी भी अब राष्ट्र-निरपेक्ष है और इसका विकास व प्रयोग पूरी तरह वैश्विक कॉरपोरेटी व्यवस्था के हाथ में है।

उपरोक्त तीनों चीजें वर्तमान वैश्विक कॉरपोरेटी पूंजीवाद को टिकाए रखने और उसे आगे बढऩे के लिए नया रास्ता बनाने का जबर्दस्त माध्यम बन रही हैं। सर्वव्यापी बाजार की अनियंत्रितता, विशाल सघन पूंजी की मारक उच्छृखंलता और विज्ञान व तकनीकी के एकाधिकारी खेल ने देशों की राजनीति को भ्रष्ट, सिद्धांत-विहिन और लक्ष्य-विहीन, अर्थतंत्र को अराजक, समाज को खंडित और पर्यावरण का विध्वंस कर दिया है। भूमंडलीकरण की शक्तियां ऐसा ही चाहती भी हैं और कमोबेश वे अपने लक्ष्य में सफल रही हैं। उनके लिए यह बात कोई मायने नहीं रखती कि लोगों की आजीविका का क्या होगा या पर्यावरण का विनाश कैसे रोका जाएगा। उनके लिए अब व्यापार के बहुपक्षीय या द्विपक्षीय अंतरराष्ट्रीय समझौते भी महत्त्व खोते जा रहे हैं।
प्राकृतिक संसाधनों की कॉरपोरेटी लूट के खिलाफ दुनिया भर में आंदोलन चल रहे हैं। पुलिस और फौजें इन्हें निर्ममता से कुचल रही हैं। कानून-व्यवस्था बनाए रखने का पूरा जिम्मा राज्य का है। कॉरपोरेटी धन- संपत्ति और संस्थानों तथा निवेश की सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी भी राज्यसत्ता की है।
बाजार, पूंजी और तकनीक के खुले खेल में देशों के अंदर के सामाजिक ताने-बाने, सांस्कृतिक अस्मिता, इंसानी चेतना का जो विध्वंस हो रहा है उसे राज्यसत्ता असहाय-सी देख रही है। या तो उसे समझ नहीं या वह समझना नहीं चाहती कि अपने नागरिकों के लिए क्या करें।
असल में यह वैश्विक कॉरपोरेटी पूंजीवाद की जीत है जो उसे आगे बढऩे का रास्ता खोलती है और पहले की तरह इस नए पूंजीवादी युग की भी अगुआई इग्लैंड और अमेरिका में बैठे कॉरपोरेट जगत के शीर्ष व्यक्ति ही करेंगे। वे निद्र्वन्द आगे बढ़ सकेंगे या उन्हें अकाट्य चुनौतियां मिलेंगी, यह अलग सवाल है।
मनोज त्यागी