व्यापक असर की नोटबंदी

  • 2016-12-02 09:30:49.0
  • पीके खुराना

व्यापक असर की नोटबंदी

नोटबंदी एक अलग मसला है और इसका असर भी पूरे देश पर पड़ा है, वरना असलियत यह है कि रोजमर्रा के कामों के लिए आम आदमी का केंद्र सरकार से वास्ता नहीं पड़ता। आम आदमी का रोजमर्रा के कामों के लिए पंचायत, नगर पालिका, नगर निगम, तहसील, जिला कार्यालय, डिस्पेंसरी, अस्पताल, स्कूल आदि से ही वास्ता पड़ता है और वहां कामकाज का ढर्रा आज भी वही है, जो कि मोदी सरकार के सत्ता में आने से पहले था। इसलिए आम आदमी के जीवन में कोई ऐसा फर्क नहीं आया था, जिसे वह शिद्दत से महसूस करता.


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब से काले धन के विरुद्ध जंग छेड़ी है, तब से अलग-अलग लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। विपक्ष के नेता खुर्दबीन लेकर हर तरह से इसमें खामियां निकालने में जुटे हैं। भारत बंद की विफलता का अंदाजा लगाकर कुछ लोगों ने इसे आक्रोश दिवस बना डाला। एकाध विपक्षी नेताओं ने इसके पक्ष में बयान दिए, लेकिन ज्यादातर ने इस कदम के खिलाफ ही बोला। विपक्षी नेताओं पर चोट करते हुए मोदी समर्थकों ने भी अपने प्रचार की मुहिम तेज कर दी है।

कांग्रेस जब केंद्र में सत्ता में थी, तो कई घोटाले सामने आए। कांग्रेस और भाजपा का राज करने का ढर्रा इतना मिलता-जुलता था कि केंद्र में सरकार किसी की भी हो, जनता को कोई फर्क महसूस नहीं होता था। एक समान कठिनाइयां थीं, एक समान रिश्वत थी, बस वोट बैंक का फर्क था। इसी का परिणाम था कि जब सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे का आंदोलन चला, तो अरविंद केजरीवाल को देश के दोनों प्रमुख दलों के नेताओं के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोप लगाने की सुविधा थी और उसके लिए उन्हें किसी प्रमाण की भी आवश्यकता नहीं थी, बस आरोप लगा देना ही काफी था।

उसके बाद केंद्र में मोदी सरकार सत्ता में आई और सरकार के कामकाज का ढर्रा बदला। मोटे तौर पर तो यह भाजपा सरकार थी, लेकिन व्यावहारिक तौर पर यह मोदी सरकार थी, जिसमें सब कुछ मोदी की मर्जी से होता था। शुरू में नौकरशाह डरे हुए थे और उनके काम करने का तरीका बदला भी, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने अपना-अपना 'कंफर्ट जोन' फिर से ढूंढ लिया। नोटबंदी एक अलग मसला है और इसका असर भी पूरे देश पर पड़ा है, वरना तो असलियत यह है कि रोजमर्रा के कामों के लिए आम आदमी का केंद्र सरकार से वास्ता नहीं पड़ता। आम आदमी का रोजमर्रा के कामों के लिए पंचायत, नगर पालिका, नगर निगम, तहसील, जिला कार्यालय, डिस्पेंसरी, अस्पताल, स्कूल आदि से ही वास्ता पड़ता है और वहां कामकाज का ढर्रा आज भी वही है, जो कि मोदी सरकार के सत्ता में आने से पहले था। इसलिए आम आदमी के जीवन में कोई ऐसा फर्क नहीं आया था, जिसे वह शिद्दत से महसूस करता।

कांग्रेस शासन में खाद्य सुरक्षा अधिनियम आया, लेकिन क्या उससे आम जनता की हालत सुधरी? क्या गरीबों का भूख से मरना बंद हो गया? क्या गरीबी रेखा से नीचे जीवन काट रहे लोग गरीबी रेखा से ऊपर आ सके? यह कुछ बड़े प्रश्न आज हमारे समक्ष हैं। हां, सूचना का अधिकार अवश्य एक ऐसा हथियार था, जिसने जनता के हाथ में एक हथियार थमाया। हालांकि यह भी हमेशा कारगर नहीं होता है, लेकिन फिर भी इसकी अहमियत से इनकार नहीं किया जा सकता। कांग्रेस के खाद्य सुरक्षा अधिनियम की तुलना अगर हम मोदी सरकार के नारों से करें, तो पाएंगे कि यहां भी असल हाल वही है। मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत अभियान, नमामि गंगे तथा ऐसे अनेक नारों ने जनता को चौंकाया और थोड़ी देर के लिए प्रभावित किया, लेकिन उनका जमीनी असर कुछ भी न होने से लोग उन नारों को भूल गए। हां, सोशल मीडिया पर सक्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थकों ने जरूर लोगों को उपदेश देना जारी रखा। लंबे समय से डिप्रेशन जैसी मानसिक अवस्था में चल रहे भारतीयों के लिए मोदी के समर्थकों द्वारा लगातार मोदी का गुणगान काम आया और इस तरह मोदी समर्थकों में इजाफा ही हुआ।

सन् 2014 के लोकसभा चुनावों के समय भी सोशल मीडिया पर मोदी का गुणगान करने वालों की फौज विरोधियों का अपमान करने से नहीं चूकती थी। 'अटैक इज दि बेस्ट डिफेंस' के मंत्र पर चलते हुए इस फौज ने विपक्षियों पर तो हमले किए ही, लेकिन अपनी इस सफलता से अति उत्साहित इन लोगों ने विरोध के हर स्वर को जबरी दबाने का काम भी किया और ऐसे लोगों का अपमान भी आरंभ कर दिया, जो न मोदी समर्थक थे, न मोदी विरोधी। चूंकि वे मोदी के समर्थक नहीं थे, इसलिए जहां उन्हें मोदी सरकार अथवा विभिन्न राज्यों में सत्तासीन भाजपा सरकारों के किसी काम से कोई असहमति होती थी, तो वे अपना विचार प्रकट करने से चूकते नहीं थे। यह एक संयोग ही था कि इसी दौरान कुछ सुविधाभोगी बुद्धिजीवियों तथा भारत-विरोधी नारे लगाने वाले लोगों का भी पर्दाफाश हुआ, जिससे मोदी के समर्थकों का उत्साह और भी बढ़ा और उन्होंने विरोध का स्वर प्रकट करने वाले हर व्यक्ति को देशद्रोही कहना शुरू कर दिया। यही वह स्थिति थी, जब जनसाधारण मोदी समर्थकों से तंग आना शुरू हुआ। विरोध का हल्का-सा स्वर उठते ही यह तंत्र विरोध करने वाले व्यक्ति की इतनी छीछालेदार करने लग जाता है कि आम आदमी विरोध करने के बजाय चुप रह जाना ही श्रेयस्कर समझता है।
प्रधानमंत्री मोदी का काले धन पर यह प्रहार बहुत सीमित है। देश से बाहर रखा काला धन ज्यों का त्यों है और काले धन की शक्ति का केंद्र भी विदेशों में है। काले धन की बरामदगी की इक्का-दुक्का खबरों से देश को बहलाने की कोशिश हो रही है। दरअसल, देश के अंदर का बहुत-सा काला धन भी अब तक ठिकाने लग चुका है। काले धन को सफेद करने की मोदी सरकार की नई घोषणा से वस्तुत: कालाधन रखने वाले बड़े लोगों को ही लाभ होगा। गरीब-गुरबा के पास तो काला धन है ही नहीं, वह घोषित क्या करेगा? वह तो अपनी रोजमर्रा की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही लाइनों में लगने के लिए विवश है।

दूसरी तरफ थोक व्यापार और निर्माण कार्य आदि ठप हो जाने से कारीगर और मजदूर भारी मुसीबत में हैं। 'भूखे भजन न होई गोपाला' की स्थिति से जूझ रहे इन मजबूर गरीबों की विवशता को समझने के बजाय मोदी समर्थक देशभक्ति का पाठ पढ़ा रहे हैं और कोई बड़ी बात नहीं कि इनमें से ही कई लोग अपना काला धन सफेद करने के जुगाड़ में भी व्यस्त हों। आज इन गरीबों के पास आवाज नहीं है, विपक्ष नाकारा है और जनसाधारण की सुनवाई नहीं है। इसका मतलब यह नहीं है कि विरोध समाप्त हो गया है। मोदी समर्थक ही नहीं, खुद प्रधानमंत्री मोदी भी यह समझने को तैयार नहीं हैं कि दबा-कुचला विरोध जब प्रकट होगा, तो यह तूफान बन जाएगा और बड़ी से बड़ी शक्ति को भी बहा ले जाएगा। इस देश में मोदी को सबसे बड़ा खतरा अपने समर्थकों से ही है, जो जनसाधारण के साथ भी ऐसा व्यवहार कर रहे हैं, मानो वे विपक्षी दल हों। यह स्थिति सुखद नहीं है। अभी समय है कि सत्तापक्ष के लोग असंवेदनशीलता छोड़ें, जनसाधारण की समस्या का जायजा लें और उपदेश देने के बजाय उन समस्याओं के समाधान का जुगाड़ करें, अन्यथा कोई बड़ी बात नहीं कि जनता उन्हें विपक्ष में बैठा दे।