आशा-निराशा के बीच अर्थव्यवस्था

  • 2016-12-28 06:30:36.0
  • डा. भरत झुनझुनवाला

आशा-निराशा के बीच अर्थव्यवस्था

डिजिटल इकोनॉमी का स्वागत है। इससे हुई राजस्व की अतिरिक्त प्राप्ति का उपयोग ऋण घटाने के लिए करना भी उत्तम है, परंतु मंदी के समय ऋण नहीं उतारना चाहिए। घर के कर्ता को वेतन वृद्धि मिले तो ऋण उतारना चाहिए। बच्चे की पढ़ाई में कटौती कर के ऋण उतारना घातक होता है। इस समय अमरीकी ब्याज दर तथा तेल के दाम में वृद्धि से भारतीय अर्थव्यवस्था दबाव में है। यह समय ऋण लेकर निवेश बढ़ाकर अर्थव्यवस्था को गति देने का है, न कि ऋण उतारने का.
इस समय मंदी की ओर संकेत करने वाले चार कारक एक साथ उपस्थित हो गए हैं। पहला कारक अमरीकी केंद्रीय बैंक 'फेड' द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि किया जाना है। दो सप्ताह पूर्व फेड ने ब्याज दरों में 0.25 प्रतिशत की मामूली वृद्धि की थी, लेकिन साथ-साथ कहा था कि वर्ष 2017 में इनमें तीन बार और वृद्धि किए जाने की संभावना है। अमरीका में ब्याज दरों में वृद्धि से विदेशी निवेशकों में प्रवृत्ति बनेगी कि निवेश को भारत से निकाल कर अमरीका ले जाएं। बीते दिनों इन्होंने दो अरब डालर की पूंजी भारत से निकाली है। भारत के शेयर बाजार के टूटने एवं रुपए के नरम पडऩे का यह प्रमुख कारण है। विदेशी पूंजी के वापस जाने से भारतीय कंपनियों के शेयर टूटेंगे। भारतीय कंपनियों के लिए निवेश के लिए शेयर बाजार से पूंजी जुटाना कठिन हो जाएगा। इससे निवेश प्रभावित होगा और अर्थव्यवस्था मंद पड़ेगी। दूसरा कारक ईंधन तेल के वैश्विक दाम में वृद्धि है। हाल में तेल निर्यातक देशों के संगठन ओपेक ने तेल के उत्पादन में कटौती करने का निर्णय लिया है। ओपेक द्वारा उपरोक्त निर्णय लिए जाने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम 45 डालर प्रति बैरल से बढक़र 55 रुपए प्रति बैरल हो गए हैं। विश्लेषकों का मत है कि ये 70 डालर तक चढ़ सकते हैं।
हम भारी मात्रा में तेल का आयात करते हैं।  इन आयातों के लिए हमारी पूंजी विदेश जाती है। तेल के दाम बढऩे से हमारी पूंजी का पलायन अधिक होगा। हमारी अर्थव्यवस्था मंद पड़ेगी, जैसे गाड़ी के टायर से कुछ हवा निकाल दी जाए, तो गाड़ी धीमी चलती है। तीसरा कारक नोटबंदी है। सरकार के इस साहसिक कदम के कारण घरेलू व्यापारियों में वित्तीय व्यवस्था के प्रति अविश्वास बना है। लोगों को आशंका है कि 2000 रुपए के नए नोट अथवा 100 रुपए के नोट निरस्त किए जा सकते है। बैंक लॉकरों एवं बेनामी प्रापर्टी की संभावित जांच-पड़ताल से भी भय का वातावरण बना है। नब्बे के दशक में सोवियत रूस के विघटन के समय रूसी जनता की बैंकों में जमा रकम डूब गई थी। इसके बाद रूस की वित्तीय व्यवस्था पर उसका विश्वास डगमगा गया। तब से रूस के लोग अपनी पूंजी को यूरो अथवा डालर में रखते हैं। इसी प्रकार आने वाले समय में भारत के व्यापारियों द्वारा अपनी बचत को विदेशी मुद्राओं में रखे जाने की संभावना है। 
हमारी अर्थव्यवस्था मंद पड़ेगी, जैसे बेटा अपनी आय का निवेश घर के व्यापार में करने के स्थान पर शेयर बाजार में करे तो घर का व्यापार सुस्त पड़ता है। चौथा कारक जनता के हाथ में आय का हृस है। डिजिटल इकोनॉमी को अपनाने से अधिकतर खरीद पर विक्रेता को टैक्स देना होगा। पूर्व में दुकानदार नकद में माल खरीद कर नकद में बेचता था और इस पर टैक्स अदा नहीं करता था। टैक्स की इस चोरी से बाजार में माल सस्ता बिकता था। टैक्स अदा करने से माल महंगा होगा और उपभोक्ता की क्रय शक्ति घटेगी। बाजार में मांग कम होगी। वित्त मंत्री ने संकेत दिए हैं कि बढ़े हुए राजस्व का उपयोग सरकार द्वारा पूर्व में लिए गए ऋण को अदा करने के लिए किया जाएगा। अत: इस रकम का भारतीय अर्थव्यवस्था में पुनर्निवेश नहीं होगा।
डिजिटल इकोनॉमी से बाजार में मांग कम होगी। इस गहराते अंधेरे में हमें अपनी आर्थिक नीतियों में बदलाव करना चाहिए। अमरीकी फेड द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि के कारण विदेशी पूंजी को वापस जाने से हम नही रोक सकेंगे, परंतु अपनी पूंजी को घर में बने रहने को प्रोत्साहित कर सकते हैं। वर्तमान में मेक इन इंडिया जैसे नारों के सहारे सरकार का प्रयास विदेशी पूंजी को आकर्षित करने का है। इससे भारतीय पूंजी को अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराने से हमारा ध्यान हट जाता है, जैसे पड़ोसी के फ्लैट स्क्रीन टीवी को देखने के बाद अपना पुराना टीवी निस्तेज दिखता है। सरकार को चाहिए कि भारतीय पूंजीपतियों से खुली वार्ता करे और उन्हें निवेश को प्रोत्साहित करे। विशेषकर छोटे उद्यमियों से वार्ता करने की जरूरत है। अपनी घरवाली की निंदा करके पड़ोसिन के गुणगान करने से घर नहीं बनता है। अपनी पूंजी का सम्मान करना होगा। तेल के बढ़ते आयातों का सामना करने का एक उपाय है कि तेल पर टैक्स में और वृद्धि की जाए। जिस प्रकार सरकार जनता को चाबुक मार कर डिजिटल इकोनॉमी की तरफ ले जा रही है, उसी तरह कम ऊर्जा से जीवन निर्वाह करने की ओर ले जाए। बस तथा मेट्रो में निवेश बढऩा चाहिए, जिससे प्राइवेट कार का उपयोग कम हो।
विनिर्माण के स्थान पर सेवा क्षेत्र को आगे बढ़ाना चाहिएं। इसमें ऊर्जा का उपयोग कम होता है। बिजली की खपत की तीव्र प्रोग्रेसिव प्राइसिंग करनी चाहिए। अधिक खपत करने वालों से 15 रुपए प्रति यूनिट वसूल करना चाहिए। हर देश को अपने संसाधनों के अनुरूप जीवन शैली अपनानी होती है। भारत में ऊर्जा के स्रोत कम हैं। हमें कम ऊर्जा में ऊंचे जीवन स्तर को हासिल करने के कदम उठाने चाहिए। नोटबंदी से जनता में बने अविश्वास के वातावरण को दूर करना होगा। मूल रूप से व्यापारी टैक्स की चोरी नहीं करना चाहता है। वह टैक्स अदा करके चैन की नींद सोना चाहता है। लेकिन सरकारी कर्मियों के भ्रष्टाचार के कारण कुछ व्यापारी टैक्स की चोरी करते हैं।
 वे अपने माल को बाजार में सस्ता बेचते हैं। उनसे प्रतिस्पर्धा में खड़े रहने के लिए दूसरे व्यापारियों को भी भारी टैक्स की चोरी करने को मजबूर होना पड़ता है। इस समस्या की जड़ में टैक्स दरों का ऊंचा होना और सरकारी कर्मियों का भ्रष्टाचार है। सरकार को नंबर दो के इन मूल कारणों पर प्रहार करना चाहिए। निरीह व्यापारी को काले धन का दोषी बताकर भत्र्सना करने से व्यापार मंद पड़ेगा। बिना व्यापारी को विश्वास में लिए आर्थिक विकास संभव नहीं है। डिजिटल इकोनॉमी का स्वागत है।
इससे हुई राजस्व की अतिरिक्त प्राप्ति का उपयोग ऋण घटाने के लिए करना भी उत्तम है, परंतु मंदी के समय ऋण नहीं उतारना चाहिए। घर के कर्ता को वेतन वृद्धि मिले तो ऋण उतारना चाहिए। बच्चे की पढ़ाई में कटौती कर के ऋण उतारना घातक होता है। इस समय अमरीकी ब्याज दर तथा तेल के दाम में वृद्धि से भारतीय अर्थव्यवस्था दबाव में है। यह समय ऋण लेकर निवेश बढ़ाकर अर्थव्यवस्था को गति देने का है, न कि ऋण उतारने का। सरकार को चाहिए कि डिजिटल इकोनॉमी से हुई अतिरिक्त आय का उपयोग कस्बों में मुफ्त इंटरनेट, बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए मुफ्त वाउचर, अंतरिक्ष में अनुसंधान जैसे कार्यक्रमों के लिए करे। तब उपभोक्ता द्वारा अदा की गई अतिरिक्त रकम घूम कर अर्थव्यवस्था में वापस आ जाएगी जैसे बाल्टी में लीकेज हो, तो लगातार पानी भरने से जलस्तर बना रहता है। एक राजा हुए सुयोधन। उन्होंने शिखंडी नाम व्यक्ति को अपना सलाहकार बना लिया। शिखंडी ने सुयोधन को पुण्यात्मा पांडवों के विरुद्ध भडक़ा दिया। फलस्वरूप सुयोधन की मृत्यु ही नहीं हुई, उसका नाम भी दुर्योधन पड़ गया। प्रधानमंत्री को शिखंडियों से बचना चाहिए।