ऋण लेकर घी पीने की घातक नीति

  • 2016-11-25 08:00:24.0
  • उगता भारत ब्यूरो
ऋण लेकर घी पीने की घातक नीति

अनुज ठाकुर
किसी देश या राज्य की अर्थव्यवस्था में आर्थिक और सामाजिक आधारभूत सुविधाओं को बनाने और बढ़ाने के लिए धन की जरूरत होती है। धन की यह कमी या तो सरकारें अपने करों से अर्जित आय से पूरा करती हैं या तो ऋण लेकर। इन दोनों में सबसे सरल उपाय किसी भी सरकार के लिए है ऋण लेकर इस कमी को पूरा किया जाए, ताकि अर्थव्यवस्था सुचारू रूप से चल सके। इसके बावजूद ऋण द्वारा धन की भरपाई एक विशेष स्तर के बाद राज्य के कोष पर विपरीत असर डालती है और यहीं से अर्थव्यवस्था के चरमराने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। सरल भाषा में अगर कहा जाए, तो ऋण एक विशेष स्तर के बाद राज्य के कोष पर बोझ साबित होने लगता है। इसलिए उधार निधि का आर्थिक और सामाजिक आधारभूत सुविधाओं को बनाने और बढ़ाने में इस्तेमाल किया जाने चाहिए, ताकि इस धन से  निर्मित संपत्तियों द्वारा राज्य के लिए एक नियमित आय का स्रोत बन सके।

यह धन विशेष रूप से पूंजीगत संपत्तियों को बनाने में इस्तेमाल किया जाना चाहिए और राजस्व प्राप्तियों का इस्तेमाल केवल ऋण और ब्याज की अदायगी के लिए किया जाना चाहिए। हैरानी यह कि हिमाचल सरकार के वित्तीय प्रबंधन में ऐसा कुछ भी नहीं देखने को मिल रहा। ऋण के रूप में अर्जित धन या तो वेतन-भत्तों की अदायगी के लिए इस्तेमाल हो रहा है या फिर पिछले ऋण को चुकाने के लिए। यह भी कह सकते हैं कि पिछले कर्ज चुकाने के लिए सरकार द्वारा नया कर्ज लिया जा रहा है और यह स्थिति पिछले तीन-चार वर्षों से और भी बदतर होती जा रही है। इसके कारण मौजूदा प्रदेश सरकार ऋण के जाल में फंसती जा रही है। अगर वर्ष 2014-2015 के हिमाचल सरकार के खातों के आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं, तो सरकार द्वारा 31 मार्च, 2015 तक  25 हजार 729 करोड़ रुपए का कुल ऋण लिया गया। इसमें से मात्र एक चौथाई हिस्सा ही पूंजीगत संपत्तियां बनाने के लिए खर्च हुआ और तीन चौथाई हिस्सा पहले के लिए हुए ऋण की मुख्य राशि और ब्याज की अदायगी के लिए इस्तेमाल किया गया।

वर्ष 2014-2015 में ब्याज की अदायगी कुल खर्च का 14 प्रतिशत थी। सरकार की कुल आय का एक चौथाई हिस्सा कर से अर्जित आय से एकत्रित होता है और एक बहुत बड़ा हिस्सा (कुल आय का लगभग 34 प्रतिशत हिस्सा) ऋण से आया। इसमें सरकार द्वारा दिए गए ऋण और अग्रिम की वसूली न के बराबर है। इस कुल अर्जित आय का एक चौथाई हिस्सा कर्मचारियों के वेतन-भत्तों की अदायगी में इस्तेमाल किया गया और एक चौथाई हिस्सा ऋण और ब्याज की अदायगी के लिए किया गया। सीधे तौर पर यह भी कह सकते हैं कि अर्जित आय का लगभग आधा हिस्सा ही विकास कार्यों पर खर्च किया गया है। 2667 करोड़ का ओवर ड्राफ्ट भारतीय रिजर्व बैंक में भी किया गया है।

माना कि ये हालात पिछली सरकारों के समय से चलते आ रहे हैं, परंतु मौजूदा हालात पिछली सरकारों के मुकाबले इस सरकार के समय  प्रदेश को ऋण के गर्त में धकेलते नजर आ रहे हैं, क्योंकि ऋण लेने का सिलसिला मौजूदा सरकार के समय सामान्य लेन-देन की प्रक्रिया का हिस्सा बन गया है। हाल ही में समाचार-पत्र से ज्ञात हुआ कि सरकार द्वारा विकास कार्यों के लिए भारतीय रिजर्व बैंक में एक माह के भीतर एक हजार करोड़ रुपए के ऋण लिए आवेदन किया गया है और ऋण लेने की वजह कर्मचारियों के वेतन-भत्ते हैं। अब तक सरकार 36000 करोड़ रुपए का कर्ज ले चुकी है। इसके लिए 3500 करोड़ रुपए ब्याज के तौर पर इस वर्ष चुकाए जा रहे हैं। यूं तो वर्ष 2014-15 में ब्याज की अदायगी का खर्च कुल खर्च का नौ प्रतिशत था।

यदि हिमाचल सरकार इसी तरह से विकास कार्यों के नाम पर कर्ज लेती रही और धन का इस्तेमाल पूंजीगत संपत्तियों के निर्माण के बजाय इसी तरह से वेतन-भत्तों की अदायगी के लिए किया जाता रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब वित्तीय घाटे को पूरा करने के लिए सरकार ऋण के जाल में बुरी तरह फंस जाएगी। इस तरह की विरोधाभासी स्थिति में हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था मात्र आंकड़ों में दौड़ती नजर आएगी, जबकि धरातल पर इसकी स्थिति दुर्गम क्षेत्र की उबड़-खाबड़ सडक़ों के समान होगी। उपर्युक्त आंकड़ों से यही पता चलता है कि सरकार का मौजूदा वित्तीय प्रबंधन कैसा है और वित्तीय तौर पर सरकार का खजाना किस हालात से गुजर रहा है। मौजूदा सरकार आने वाली सरकार को ऋण जाल और कर्ज का पिटारा तोहफे में देकर जाएगी। यूं तो मौजूदा हालात यही बयां कर रहे हैं कि आने वाली सरकार के लिए अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना, राज्य के खजाने को भरना, कर्ज लेने के इस सिलसिले को कम करना और इस ऋण जाल से बाहर निकलना एक चुनौतीपूर्ण कार्य होगा।