शिक्षा के टूटे पुल जोडऩे की क्षमता रखती है संस्कृत

  • 2016-09-05 09:30:27.0
  • डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री
शिक्षा के टूटे पुल जोडऩे की क्षमता रखती है संस्कृत

संस्कृत का सबसे बड़ा लाभ तो यही है कि यदि उसको जानने वाले और व्यवहार में लाने वाले लोग तैयार होते हैं, तो उन लाखों पांडुलिपियों को पढ़ा जा सकता है जो अभिलेखागारों में दीमक का शिकार हो रही हैं। भारत के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के बीच का जो पुल टूट चुका है, उसका पुनर्निर्माण किया जाना भारत के हित में ही नहीं, बल्कि शेष विश्व के लिए भी लाभकारी है। यह तभी संभव है, यदि नई शिक्षा पद्धति में सभी विषयों को संस्कृत भाषा में भी पढ़ाए जाने की व्यवस्था की जाए.

भारतवर्ष में एक लंबे अरसे तक संस्कृत देश की शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ रज्जु रही है। प्राचीन काल की समस्त ज्ञान-विज्ञान संपदा संस्कृत की हस्तलिखित पांडुलिपियों में ही सुरक्षित है। यदि थोड़ा नकारात्मक भाषा में कहना हो तो 'कैद है', भी कहा जा सकता है। इन पांडुलिपियों में साहित्य से ताल्लुक रखने वाले ग्रंथ तो हैं हीं, लेकिन बहुत से ग्रंथ सामाजिक विज्ञान से लेकर जीव विज्ञान तक और फिजिकल साइंसेज से लेकर आभियांत्रिकी तक से ताल्लुकरखते हैं। लेकिन ये ग्रंथ अब धीरे-धीरे काल के गाल में समाने की प्रतीक्षा में हैं। रखरखाव और सार संभाल की समस्या तो है ही, उनको प्रकाशित करवाने की समस्या भी है। ऐसा इसलिए क्योंकि ये संस्कृत ग्रंथ भोज पत्रों पर हैं या फिर पुराने कागजों पर, अत वे भला कितनी देर तक रंग बदलते काल की मार को सह सकते हैं। दीमक तो है ही। उससे बड़ा शत्रु भला कहां मिल सकता है? लेकिन यह सहस्रावधियों से चला आ रहा भारतीय ज्ञान-विज्ञान है, जिसे इस प्रकार नष्ट नहीं होने दिया जा सकता।  पुरखों ने इसे श्रुति परंपरा के माध्यम से सुरक्षित रखने का तरीका खोज निकाला। उसके बाद भोज पत्रों व हाथ से बनाए कागजों का सहारा लेकर इसे लिपिबद्ध किया। 

इस लिखे को बचाए रखने के हजारों तरीके खोज निकाले। केवल मौसम की मार से ही बचाए रखने का प्रश्न नहीं था। इसे ऐसे आक्रमणकारियों से भी सुरक्षित रखना था, जिन्हें सबसे ज्यादा चिढ़ ज्ञान और पुस्तक से ही थी। इन्हीं विदेशी आक्रमणकारियों ने नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों को महीनों तक जलाए रखा था। भारत के पुरखों को दाद देनी होगी कि उन्होंने इन जलते विश्वविद्यालयों में से भी पांडुलिपियों को निकाल कर उन्हें चीन, मंगोलिया, तिब्बत पहुंचाने की व्यवस्था कर ली।

सारी व्यवस्था इनको बचाने के प्रयासों में ही जुटी रही, ऐसा नहीं है। बल्कि इस अंतराल में इस ज्ञान संपदा में कुछ और ग्रंथ भी जुड़ते रहे और इस भारतीय ज्ञान की निरंतर श्री वृद्धि होती रही। अरबों से लेकर मुगलों तक के कार्यकाल में संस्कृत भाषा का प्रयोग कम हुआ। सरकारी स्तर पर उसे अप्रासंगिक बनाने के प्रयास भी शुरू हुए। मुगल सत्ता के अंतिम चरण में अंग्रेजों की सत्ता स्थापित हुई। उन्होंने दिखावे के लिए तो संस्कृत का नाम बचाए रखा, लेकिन क्रियात्मक रूप से उसे मृत भाषा घोषित कर दिया। दुनिया भर में अनेक भाषाएं मृत भाषाओं की सूची में आती हैं, जिनका उपयोग व्यवहार में नहीं होता, लेकिन शोध कार्य के लिए उनका उपयोग होता है। 
अंग्रेजों ने भी संस्कृत को मारने के लिए इसी नीति का उपयोग किया। संस्कृत ग्रंथों को संदर्भों के लिए प्रयोग होता देख हमारे विद्वान यह समझते रहे कि अंग्रेज सरकार इस भाषा के विकास के लिए कृतसंकल्प है, जबकि संस्कृत का यह उपयोग उसे मारने की दिशा में उठाया गया शातिराना कदम था। 1857 के बाद अंग्रेजों ने इस देश में महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के माध्यम से अपनी नई शिक्षा पद्धति लागू की। विश्वविद्यालयों में संस्कृत विभाग तो खोले गए, लेकिन उसका माध्यम अंग्रेजी भाषा अनिवार्य कर दिया गया। उद्देश्य स्पष्ट था कि संस्कृत विभागों से जो छात्र पढ़ कर निकलें, वे न तो संस्कृत बोल पाएं और न ही संस्कृत लिख पाएं। वे केवल संस्कृत की पुरानी पोथियों का अर्थ समझ सकें और उसे शोध कार्य के लिए प्रयोग कर सकें।

अंग्रेजों के चले जाने के बाद, उनकी दी गई शिक्षा पद्धति को प्रयास पूर्वक पकड़े रखने में माहिर सरकारों ने केवल इतना किया कि संस्कृत विभागों में माध्यम अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी या क्षेत्रीय भाषाओं में भी कर दिया गया। लेकिन अंग्रेजी शासन की एक दिक्कत भी थी। 1857 में ब्रिटिश पद्धति की नकल पर विश्वविद्यालय खोलने से पूर्व इस देश में संस्कृत माध्यम से उच्च शिक्षा की सुदृढ़ परंपरा विद्यमान थी। ब्रिटिश शासकों ने उन शिक्षा संस्थानों को नई शिक्षा की मुख्यधारा से बिलकुल अलग कर दिया। उनके विद्यालय / महाविद्यालय अलग प्रकार से चिन्हित कर दिए गए। उनके छात्रों को विश्वविद्यालय की अन्य तमाम गतिविधियों से वंचित कर दिया गया। वे बीसवीं शताब्दी के नए अछूत कहलाए। संस्कृत माध्यम से इन विद्यालयों में पढऩे वाले छात्रों के लिए नई व्यवस्था में नौकरी के अवसर लगभग समाप्त कर दिए गए। इन संस्कृत शिक्षा संस्थानों को भी केवल संस्कृत साहित्य के अध्ययन तक सीमित कर दिया गया।

गणित, विज्ञान, इतिहास, राजनीति विज्ञान, अर्थशास्त्र इत्यादि तमाम विषय इन संस्थानों के लिए निषेधित कर दिए गए। इसका परिणाम यह निकला कि परंपरागत शिक्षा संस्थानों से पढ़ कर निकले छात्र या तो संस्कृत अध्यापक बनने तक सीमित हो गए या फिर पुरोहिताई में ही निपट गए। जो छात्र आधुनिक विश्वविद्यालयों से संस्कृत की डिग्रियां लेकर निकले, वे संस्कृत को छोड़ कर अन्य सब कामों में पारंगत हो गए, क्योंकि उन्होंने संस्कृत हिंदी, अंग्रेजी या तमिल के माध्यम से पढ़ी थी। संस्कृत दोनों ओर से पिट रही थी, लेकिन फिर भी यह देख कर संतोष किया जा सकता था कि चाहे फटेहाल में ही सही, स्कूलों में संस्कृत पढ़ाई तो जा रही थी। भारत सरकार के त्रिभाषा फार्मूले ने संस्कृत की इस फटेहाल हालत पर भी मारक प्रहार किया। इसके तहत स्कूलों में तीन भाषाएं पढ़ाना अनिवार्य किया गया। अंग्रेजी, हिंदी और मातृभाषा। अहिंदी भाषी राज्यों में तो इस फार्मूले के कारण स्कूलों से संस्कृत को बनवास मिल गया। हिंदी, अंग्रेजी और बांगला। बांगला न सही तो तमिल। या फिर जो जिसकी मातृभाषा हो। हिंदी भाषी राज्यों ने तीसरी भाषा संस्कृत रख ली। जो राज्य कुछ ज्यादा ही प्रगतिशील थे, उन्होंने यह स्थान उर्दू को दिया। हिंदी भाषी राज्यों में भी जनजातीय क्षेत्रों में यह स्थान जनजाति की भाषा को मिला। संस्कृत के लिए स्थान सिकुड़ता गया। एक बार फिर चर्चा चल पड़ी कि संस्कृत की क्या जरूरत है? वह तो मृत भाषा है। जो इतनी दूर तक जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते, उन्होंने कहा शोध की भाषा है, जबकि संस्कृत अभी भी व्यवहार की भाषा है। उसका अनेक रूपों में दैनदिन कार्य में उपयोग होता है। उसमें साहित्य रचा जा रहा है। पत्र पत्रिकाएं प्रकाशित होती हैं।

संस्कृत का सबसे बड़ा लाभ तो यही है कि यदि उसको जानने वाले और व्यवहार में लाने वाले लोग तैयार होते हैं, तो उन लाखों पांडुलिपियों को पढ़ा जा सकता है जो अभिलेखागारों में दीमक का शिकार हो रही हैं। भारत के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के बीच का जो पुल टूट चुका है, उसका पुनर्निर्माण किया जाना भारत के हित में ही नहीं, बल्कि शेष विश्व के लिए भी लाभकारी है।

 यह तभी संभव है, यदि नई शिक्षा पद्धति में सभी विषयों को संस्कृत भाषा में भी पढ़ाए जाने की व्यवस्था की जाए। देश में अनेक संस्कृत विश्वविद्यालय हैं। यदि इनमें से किसी विश्वविद्यालय के जिम्मे यह काम लगा दिया जाए कि वह परंपरागत शास्त्री और आचार्य का शिक्षण करने के स्थान पर बीए, एमए इत्यादि की पढ़ाई संस्कृत माध्यम से करवाने का काम शुरू कर दें, तो कुछ सालों में ही इस टूटे हुए पुल का पुनर्निर्माण शुरू हो सकता है।