लंदन का एक गुरूकुल जहां संस्कृत पढ़ाना अनिवार्य है

  • 2016-10-18 12:30:29.0
  • आचार्य दिवाकर
लंदन का एक गुरूकुल जहां संस्कृत पढ़ाना अनिवार्य है

संस्कृत भाषा की आज भारतवर्ष में ही करूण स्थिति है, पाठशालाओं में तथा महाविद्यालयों में भार स्वरूप मानी जाने वाली संस्कृति भाषा अब ऐच्छिक होते होते मृत प्राय: होती जा रही है, लेकिन लंदन में एक ऐसा विद्यालय है जहां संस्कृत अनिवार्य है।
आठ माह पूर्व (जनवरी 1981) में पंडित विष्णु नारायण जी को जब यह ज्ञात हुआ तो उस विद्यालय को देखने की लालसा जाग्रत हो गयी। मुख्याध्यापक श्री निकोलस डेबनहेम से दूरभाष पर संपर्क स्थापित करके मिलने का समय निश्चित कर लिया।

कोन्सिगठन क्षेत्र में 91 कींस गेट पर सेंट जेम्स इंडिपेंडेंट स्कूल फार बॉयज एण्ड गल्र्स के प्रवेश द्वार पर पहुंचे। यह भाग लंदन के हृदय जैसा ही है। श्री डेबन हेम ने विद्यालय के संबंध में विस्तार सहित बतलाते हुए कहा-
लगभग तीस वर्ष से इस क्षेत्र में स्कूल आफ फिलास्फी नामक मंडल की रात्रि कक्षाएं नियमित रूप से चल रही हैं जिनमें बुद्घिजीवी वर्ग तत्वज्ञान के विषय में विचार विमर्श करते हैं। विभिन्न धर्मों के तत्वज्ञान का अध्ययन करते करते हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि विश्व की सबसे श्रेष्ठ संस्कृति वैदिक संस्कृति है और इसका मूल संस्कृत भाषा है। अत: सर्वप्रथम संस्कृत भाषा का अध्ययन अनिवार्य है। संयोगवश भारत से आए संस्कृत के विद्वान श्री जायसवाल का हमें मार्गदर्शन प्राप्त हो गया। हमारे मंडल में प्रोफेसर मेक्लोरी संस्कृत के अच्छे विद्वान हैं वे ही सबको पढ़ाने लगे।

हमारे यहां सेंट जेम्स स्कूल है। हमें ऐसा अनुभव हुआ कि यदि उसके विद्यार्थियों को आरंभ से ही संस्कृत पढ़ाई जाए तो आगे चलकर वैदिक संस्कृति के अनुसार जीवन व्यतीत करने वाला एक विशिष्ट समाज उत्पन्न हो जाएगा। परिणामस्वरूप इस विद्यालय में गत दस वर्षों से संस्कृत विषय अनिवार्य कर दिया गया है। प्रोफेसर मेक्लोरी ने संस्कृत के शिक्षकों को तैयार किया।

अंग्रेज छात्रों की भीड़-इस समय इस विद्यालय में 900 विद्यार्थी हैं। उनमें 99 प्रतिशत अंग्रेज विद्यार्थी हैं। इनसे आधी संख्या बालिकाओं की है और उनके लिए पृथक कक्षाएं लगती हैं। वार्षिक शुल्क 1600 पौण्ड है इस पर भी छात्र की भीड़ बहुत है। विद्यालय में समुचित स्थान न होने के कारण हेम्सटेड हीथ के निकट सेंट वेडास्ट नाम से दूसरी शाखा प्रारंभ की हुई है।
उसमें भी विद्यार्थी समा नही पा रहे हैं, अत: अब कोई बड़ा स्थान खोजा जा रहा है। विद्यालय में संभ्रांत वर्ग के बच्चे ही पढऩे आते हैं। यहां ए स्तर तक की शिक्षा दी जाती है। पाठ्यक्रम में संस्कृत, लैटिन तथा ग्रीक भाषाएं अनिवार्य हैं, लेकिन संस्कृत भाषा पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

विद्यालय की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यहां विज्ञान, गणित, इतिहास, समाजशास्त्र अथवा कोई अन्य विषय पढाऩे वाले शिक्षक को संस्कृत भाषा का ज्ञान होना अनिवार्य है। इसके बावजूद सभी शिक्षक अंग्रेज ही हैं। विद्यालय में प्रारंभ में ही महर्षि पाणिनि विरचित व्याकरण लघु सिद्घांत कीमुदी के माध्यम से संस्कृत का गहन अभ्यास करवाया जाता है, जिससे कि उनकी शिक्षा की आधारशिला दृढ़ हो सके। प्रत्येक विद्यार्थी 18 वर्ष की आयु तक अनिवार्य रूप से संस्कृत पढ़ता है।

मैंने पूछा-''लघु सिद्घांत कौमुदी'' संस्कृत भाषा में अत: छोटे छोटे बच्चों के लिए तो यह  अति कठिन होती होगी? श्री डेबन हेम ने मेरी शंका का समाधान करते हुए कहा-
लघु सिद्घांत कौमुदी-'सरीखा सुव्यस्थित और सरल व्याकरण तो विश्व की किसी भी अन्य भाषा का नही है। संस्कृत पढ़ाने की आधुनिक पद्घतियों में गहरापन नही होता, इससे विद्यार्थी उकता जाते हैं, इसीलिए हम लोगों ने यह प्राचीन प्रणाली अपनाई है।'

जीवन से जुड़ी शिक्षा 
उन्होंने यह भी बताया कि बालिकाओं को हम भारतीय नृत्य भी सिखाते हैं। परिणामस्वरूप उनमें लज्जायुक्त शील की वृद्घि होती है। विद्यार्थियों को केवल शाकाहारी भोजन दिया जाता है। उसमें भी तला हुआ, छोंका हुआ, अधिक चटपटा भोजन न होकर पौष्टिक एवं सात्विक आहार ही दिया जाता है, जिसे विद्यार्थियों का मन निर्मल रहे। विद्यार्थियों  के घर पर तो मांसाहार चलता है। इस प्रकार हमारे विद्यार्थी दो संस्कृतियों के संघर्ष में रहते हैं, किंतु हमें पूरा भरोसा है कि हमारे  यहां शिक्षा पाए हुए विद्यार्थी अपने भावी जीवन में पूर्ण शाकाहारी रहकर वैदिक संस्कृति के अनुसार अपना जीवन यापन करेंगे। 

विद्यार्थियों  से मिलने के लिए  हम दूसरे माले पर पहुंच एक कक्षा में गये विद्यार्थियों  ने हाथ जोडक़र हमारा स्वागत किया। कक्षा आरंभ होने से पूर्व सभी विद्यार्थियों  ने करबद्घ हो नेत्र मूंदकर श्री डेबन हेम के साथ 'ओम परमात्मने नम:' मंगल मंत्र का उच्चारण किया। तत्पश्चात वैदिक प्रार्थना-शन्नोमित्र: शंवरूण: शन्नो भवत्वर्यमा।
शन्न इन्द्रोवृहस्पति: शन्नोविष्णुरूरूक्रम:।
ओ३म् नमो ब्रह्मणे नमस्ते वायो त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि ऋतं वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि तन्मामवतु तद्वक्तारमवतु। अवतु मामवतु वक्तारम्।
ओ३म् शांति: शांति: शांति:।

का सुस्पष्ट उच्चारण के साथ मधुर कण्ठ से पाठ किया। भारतवर्ष में प्राय: उच्चारण में प्रादेशिक प्रभाव दिखाई देता है, परंतु यहां तो शुद्घ संस्कृत उच्चारण सुनने को मिला। हमको ऐसा लगा कि हम लंदन में हैं या किसी प्राचीन भारत के गुरूकुल में। 

भारत में त्रिभाषा सूत्र का प्रबल विरोध होता है। एक शहर में तो संस्कृत भाषा के विरोध में प्रदर्शन भी किये गये, लेकिन लंदन में ग्रीक और लैटिन के साथ-साथ संस्कृत भाषा के लिए भी छात्रों का अनुराग देखकर हमें सुखद आश्चर्य ही हुआ। एक विद्यार्थी ने मुझसे कहा-आप संस्कृत भाषा में बात कीजिए, मेरे मित्र के अच्छी प्रकार से संस्कृत भाषा नहीं जानने के कारण यह संभव नहीं हो पाया तो उन विद्यार्थियों को बड़ा ही आश्चर्य हुआ। वे तो समझते थे कि सभी भारतवासी संस्कृति ही बोलते होंगे। वैदिक संस्कृति की प्राप्ति संस्कृत के बिना अंग्रेजी माध्यम से किस प्रकार हो सकती है? इस प्रकार का आश्चर्य भी उनके मुख मंडल पर झलक रहा था।

दक्षिण अफ्रीका में संस्कृत भाषानुराग के दो प्रसंग अनुभव में आए-
हम जोहंसवर्ग में उच्च रिफार्म चर्च के पादरी 55 वर्षीय डा. लरा से मिले। उन्होंने श्रीराम कृष्ण मिशन की सामाजिक प्रवृत्ति पर निबंध लिखा है उन्होंने पूर्व पश्चिम के तत्व ज्ञान का गहन अध्ययन किया है, उनका दृढ़ विश्वास है कि संस्कृत भाषा के अध्ययन के बिना भारतीय तत्व ज्ञान का सांगोपांग अध्ययन हो ही नही सकता, एवं उसके बिना जीवन में शांति प्राप्त नही हो सकती। इसीलिए वह एक बार भारत जाकर संस्कृत का अध्ययन करने की तीव्र अभिलाषा रखते हैं। 
डरबन में हम लोग वैस्ट वील  विश्वविद्यालय गये थे। वहां के उपकुलपति प्रो. ओलीलियर से भेंट की। 

वहां के भारतीयों के लिए ही यह विश्वविद्यालय है तो भी अनेक श्वेतवर्ण विद्यार्थी भी वहां शिक्षा ग्रहण करते हैं। इस विश्वविद्यालय का प्रतीक भारतीय राष्ट्रीय प्रतीक जैसा है। विश्वविद्यालय का मूल सूत्र 'सत्यमेव जयते' है। श्री ओलीवियर ने कहा विश्व की प्राचीनतम भाषा संस्कृत ही है, ऐसी हमारी श्रद्घा है। राजनीतिक परिस्थितियों के कारण भारत से हमको संस्कृत के पंडित नही मिलते। अत: हमने जर्मन के संस्कृत विद्वान प्रो. को यहां नियुक्त किया है। 

हमारी ऐसी इच्छा रहती है कि इस विश्वविद्यालय में ऐसे प्रो. हों जो संस्कृत भाषा अच्छी तरह पढ़ा सकने के अतिरिक्त वैदिक कर्मकाण्ड को भी अच्छी प्रकार करा सकें। उनका अपना जीवन भी निर्मल और पवित्र होना चाहिए। यदि हमें ऐसे प्रवक्ता प्राप्त हो सकें तो हम ऊंचे से ऊंचे वेतन पर भी नियुक्त करने को सहर्ष तैयार हैं। इस प्रकार वैदिक संस्कृति के ग्रहण के लिए संस्कृत भाषा के अध्ययन, पठन व धारण से आज विदेशी भी अपने राष्ट्र में (परिवार, समाज व राष्ट्र में)  स्वर्गिक वातावरण उतारना चाह रहे हैं। जबकि हम आर्यवंशीय अपनी उस परम पावनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं जिसके प्रचार  व प्रसार से इस युग के लिए धर्म व संस्कृति के उद्घारक देवर्षि दयानंद सारे भूमंडल पर स्वर्ग उतारने की परिकल्पना की थी और अपना सारा जीवन इसी साधना में लगा दिया था, क्योंकि यही यज्ञमयी संस्कृति अर्थात जीवनधारा विश्ववारा अर्थात संपूर्ण विश्व के लिए वरणीय है।

हम राष्ट्र भाषा हिंदी को माध्यम बनाकर सभी विषयों को पढ़ायें और राष्ट्रभाषा के पद पर सही मायनों में उसे स्थापित करें और संस्कृत भाषा की ओर कदम बढ़ायें तो भारतवर्ष पुन: राम, कृष्ण का देश बन सकता है। 
(साभार) 'दैनिक हिन्दुस्तान'
दिनांक 13 सितंबर 1981
प्रस्तुति : डा. दिवाकर आचार्य