ब्रिक्स बैंक की कठिन राह

  • 2015-10-29 10:30:35.0
  • डा. भरत झुनझुनवाला

कामत के सामने कठिन चुनौती है कि ब्रेटन वुड्स संस्थाओं का अंधानुकरण करने के स्थान पर नई दिशा बनाएं। ऐसी विश्व रचना की ओर बढ़ें, जिसमें ब्रिक्स देशों में रहने वाले 42 प्रतिशत लोगों द्वारा विश्व के 42 प्रतिशत प्राकृतिक संसाधनों की खपत की जा सके। इस उद्देश्य की पूर्ति तब ही हो सकेगी, जब ब्रिक्स बैंक द्वारा विश्व बैंक की नीतियों की स्पष्ट व्याख्या की जाएगी और अपने कार्यों में इनसे अलग नीतियों का पालन किया जाएगाज्‘ब्रिक्स’ देशों में ब्राजील, रूस, इंडिया, चीन तथा साउथ अफ्रीका आते हैं। इन देशों ने बीते समय में न्यू डिवेलपमेंट बैंक की स्थापना की है। इसे ब्रिक्स बैंक कहा जाता है। इस बैंक को अधिक पूंजी चीन द्वारा उपलब्ध कराई जाएगी। इस बैंक द्वारा इन पांच देशों को बुनियादी संरचना के विकास के लिए ऋण दिए जाएंगे। इस बैंक की स्थापना करने की जरूरत इसलिए पड़ी कि विश्व बैंक तथा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित को बढ़ाया जा रहा था। ब्रिक्स बैंक का लक्ष्य होना चाहिए कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को छोडक़र विकास का दूसरा मॉडल स्थापित करें।
लेकिन ब्रिक्स बैंक के उपाध्यक्ष ने हाल में मुंबई में स्पष्ट किया है कि ब्रिक्स बैंक का उद्देश्य विश्व बैंक का विरोध करना नहीं है, बल्कि वे विश्व बैंक की मदद चाहते हैं। यानी विकास के नए मॉडल को स्थापित करने के स्थान पर विश्व बैंक के मॉडल को ही लागू करना चाहते हैं।अंग्रेजों द्वारा लागू आईएएस व्यवस्था को स्वतंत्र भारत की सरकार ने अपनाया। गांधीजी द्वारा सुझाए गए गरीबोन्मुख विकास के  मॉडल को त्याग कर इन अधिकारियों ने उसी सरकारवादी व्यवस्था को लागू किया, जिसके विरोध में हमने स्वतंत्रता आंदोलन छेड़ा था। अंग्रेजी सरकार के स्थान पर भारतीय सरकार स्थापित हो गई। आम आदमी के लिए कोई अंतर नहीं पड़ा। इसी प्रकार विश्व बैंक द्वारा स्थापित बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मॉडल को ब्रिक्स बैंक लागू करना चाहता है। गरीबोन्मुख मॉडल को त्याग कर ब्रिक्स बैंक द्वारा उसी बहुराष्ट्रीय कंपनी आधारित विकास के मॉडल को प्रवर्तित किया जाएगा, जिसके विरोध में इस बैंक की स्थापना की गई है। केवल अधिकारी बदल गए हैं। विकास के मूल मॉडल में कोई बदलाव नहीं आया है।ब्रिक्स बैंक का मुख्यालय चीन की वाणिज्यिक राजधानी शंघाई में स्थापित किया गया है। बैंक के प्रथम प्रमुख भारत के जाने-माने बैंकर केवी कामथ को नियुक्त किया गया है। अब तक विश्व अर्थव्यवस्था का वित्तीय संचालन अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष तथा वल्र्ड बैंक द्वारा किया जाता रहा है। इन दोनों संस्थाओं की स्थापना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रेटन वुड्स नामक शहर में की गई थी, इसलिए इन्हें ब्रेटन वुड्स संस्थाएं कहा जाता है। इन दोनों संस्थाओं में मुख्य शेयर धारक विकसित देश हैं और इन्हीं देशों के हितों को बढ़ाने के लिए ये संस्थाएं काम करती रही हैं। इन संस्थाओं द्वारा विकसित देशों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा दोहन के लिए खोला जाता रहा है। इनकी कार्यपद्धति का ज्वलंत उदाहरण हमारा 1991 का विदेशी मुद्रा संकट है। 1991 में भारत के सामने विदेशी मुद्रा संकट पैदा हुआ था। हमारे उद्यमी पुरानी तकनीकों के सहारे घटिया माल बना रहे थे। जैसे एंबेसेडर कार 10 से 12 किलोमीटर प्रति लीटर का एवरेज देती थी, जबकि दूसरे देशों में 15 से 18 किलोमीटर का एवरेज देने वाली करें बन रही थीं। हम इस घटिया माल का निर्यात नहीं कर पा रहे थे और हमारी विदेशी मुद्रा की आवक कम थी। फलस्वरूप विदेशी मुद्रा का संकट उत्पन्न हुआ था।ऐसे में हमारे सामने दो विकल्प थे। एक विकल्प था कि हम अपनी कंपनियों को घरेलू प्रतिस्पर्धा में धकेलते और उन्हें तकनीकी उच्चीकरण को मजबूर करते। जैसे उस समय टाटा द्वारा कार बनाने का लाइसेंस मांगा गया था जो सरकार ने नहीं दिया था। टाटा को लाइसेंस देते तो प्रतिस्पर्धा गरमाती और सभी कार निर्माताओं को 15-20 किलोमीटर एवरेज देने वाली कार का उत्पादन करना पड़ता। ये कंपनियां विदेशों से तकनीक खरीद सकती थीं। दूसरा विकल्प था कि हम विदेशी कंपनियों को आमंत्रित करते कि वे आधुनिक तकनीकों को भारत में लाएं और यहां कार का उत्पादन करें। दोनों विकल्पों के परिणाम में मौलिक अंतर है। घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देते तो भारतीय कंपनियों को उच्च तकनीक हासिल करने एवं अपनी कंपनियों में उन्हें समावेश करने में समय लगता परंतु दीर्घकालिक परिणाम सुखद होते। भारतीय कंपनियों द्वारा कमाए गए लाभ का पुनर्निवेश भारत में किया जाता। हमारे इंजीनियरों को तकनीकों की आंतरिक जानकारी मिलती और हम उन पर सुधार कर सकते थे। हमारा दुर्भाग्य रहा कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने ब्रेटन वुड्स संस्थाओं का सहारा लेते हुए विदेशी कंपनियों को आमंत्रित किया और घरेलू उद्यमियों को सुधार करने का मौका नहीं दिया गया।इन संस्थाओं का उद्देश्य है कि विकासशील देशों को गरीब बनाए रखो। उनकी आय को विकसित देशों को यथासंभव स्थानांतरित करते रहो। जिस प्रकार गरीब आदमी की परेशानी का लाभ उठाकर सूदखोर उसे जीवनपर्यंत ऋण के जाल में फंसा लेता है, उसी प्रकार ब्रेटन वुड्स संस्थाओं ने हमारे विदेशी मुद्रा के संकट का लाभ उठाकर हमें विदेशी कंपनियों के जाल में फंसा दिया। परिणाम है कि आज भी विश्व के संसाधनों की अधिकाधिक खपत विकसित देशों में हो रही है। वल्र्डवाच संस्था के अनुसार उत्तरी अमरीका और पश्चिमी यूरोप में रहने वाले 12 प्रतिशत लोगों द्वारा विश्व की 60 प्रतिशत खपत की जा रही है। दक्षिणी अफ्रीका एवं दक्षिणी एशिया में रहने वाले 33 प्रतिशत लोगों द्वारा मात्र तीन प्रतिशत खपत की जा रही है। यदि ब्रेटन वुड्स संस्थाओं की मंशा विकसित देशों की खपत बढ़ाने की होती, तो वे इस दुरूह स्थिति के निस्तारण की नीति बनाते। वे विकासशील देशों की कंपनियों द्वारा आधुनिक तकनीक की खरीद को आसान बनाने के फंड स्थापित करते। जैसे उच्च क्वालिटी की कार के पेटेंट को खरीद कर तमाम विकासशील देशों को उपलब्ध कराया जा सकता था। ऐसा करने के स्थान पर इन संस्थाओं द्वारा आधुनिक तकनीकों पर पेटेंट कानून का शिकंजा कसने की वकालत लगातार की जा रही है। इससे विकसित देशों को लाभ और विकासशील देशों को हानि है।ब्रेटन वुड्स संस्थाओं में सुधार लाना कठिन है, चूंकि पांचों ब्रिक्स देशों के पास इनके केवल 11 प्रतिशत शेयर हैं। ब्रिक्स बैंक के 100 प्रतिशत शेयर इन्हीं देशों के पास हैं, अत: ये वास्तव में विकासशील देशों के हित में काम कर सकते हैं। समस्या मानसिक दासता की है। आज अधिकतर विकासशील देश अपने को अपंग और विकसित देशों को मसीहा मानते हैं। इनमें चीन शामिल है। चीन द्वारा मूल रूप से पश्चिमी देशों का अनुसरण किया जा रहा है। चीन द्वारा बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बुलाकर फैक्टरियां लगवाई जा रही हैं। वह देश अपने पर्यावरण को नष्ट करके विकसित देशों को सस्ता माल उपलब्ध करा रहा है और उनकी खपत बढ़ा रहा है। उस देश द्वारा अपने विशाल विदेशी मुद्रा भंडार को इन्हीं देशों में निवेश किया गया है। इसी क्रम में चीन के वित्त मंत्री ने ब्रिक्स बैंक के उद्घाटन पर कहा कि बैंक की भूमिका वर्तमान ब्रेटन वुड्स संस्थाओं के पूरक की होगी। ब्रेटन वुड्स संस्थाओं के वर्चस्व को चीन ने स्वीकार कर लिया है। चीन द्वारा हाल में ही स्थापित एशिया इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक द्वारा विश्व बैंक के साथ साझा ऋण देने की बात की जा रही है। अत: चीन द्वारा इन संस्थाओं के विचार के विपरीत चलने की संभावना कम ही है।कामत के सामने कठिन चुनौती है कि ब्रेटन वुड्स संस्थाओं का अंधानुकरण करने के स्थान पर नई दिशा बनाएं। ऐसी विश्व रचना की ओर बढ़ें, जिसमें ब्रिक्स देशों में रहने वाले 42 प्रतिशत लोगों द्वारा विश्व के 42 प्रतिशत प्राकृतिक संसाधनों की खपत की जा सके। इस उद्देश्य की पूर्ति तब ही हो सकेगी, जब ब्रिक्स बैंक द्वारा विश्व बैंक की नीतियों की स्पष्ट व्याख्या की जाएगी और अपने कार्यों में इनसे अलग नीतियों का पालन किया जाएगा।