योग्यता पर अयोग्यता की जीत है आरक्षण

  • 2012-09-07 15:11:39.0
  • उगता भारत ब्यूरो
योग्यता पर अयोग्यता की जीत है आरक्षण

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ही स्पष्ट किया गया है कि भारत के प्रत्येक नागरिक को सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्रदान किया जाएगा। संविधान की यह अवधारणा बहुत ही न्यायसंगत है। कोई भी व्यक्ति सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्राप्त करने से वंचित नही किया जाना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को इन तीनों प्रकार के न्यायों से वंचित किया जाता है तो यह लोकतांत्रिक समाज के मूल्यों के विरूद्घ होगा। भारतीय संविधान के निर्माताओं ने भारत में लोकतंत्र की शासन प्रणाली को लागू किया इसलिए उनके लिए यह अनिवार्य था कि भारत में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्रत्येक नागरिक के लिए सुलभ कराया जाए।
पर जब हमारा संविधान व्यवहार रूप में आया तो उसके शुद्घ लोकतांत्रिक स्वरूप को कई विसंगतियों ने विद्रूपित करना आरंभ कर दिया। इन विसंगतियों में सबसे भयंकर विसंगति थी वोटों की राजनीति। वोटों की राजनीति ने भारत के लगभग प्रत्येक राजनीतिक दल को ही पथभ्रष्टï किया। भारत में वोटों की राजनीति का शुभारंभ कांग्रेस ने ही किया था। 1952 के पहले चुनाव में ही नही अपितु उससे पूर्व के राष्ट्रीय असैबंली के जो भी चुनाव हुए उनमें कांग्रेस ने तुष्टिकरण की राजनीति के सहारे तथा मुस्लिम आरक्षण जैसी विसंगतियों का समर्थन करके वोटों की राजनीति की विसबेल का बीजारोपण किया। इसके खून में वोटों की राजनीति रही इसलिए इसने पहले दिन से ही देश में आरक्षण की राजनीति को हवा देना आरंभ किया। दूसरे शब्दों में कहें तो देश के संविधान में वर्णित सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्रदान करने के दर्शन की हवा कांग्रेस ने ही निकालनी आरंभ कर दी। आरक्षण से लगता तो ऐसा है जैसे सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय लोगों को और भी तीव्रता से मिल रहा है और इसके अच्छे परिणाम आएंगे। लेकिन वास्तव में किसी भी प्रकार के आरक्षण से सुपरिणाम प्राप्त नही होते हैं। क्योंकि आरक्षण विद्वेषभाव को बढ़ाकर विभिन्न सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक विसंगतियों को जन्म देता है। उदाहरण के रूप में आरक्षण को यदि आप प्रोन्नति में लागू करते हैं तो एक व्यक्ति को राष्ट्र के प्रति और अपने कत्र्तव्य कर्म के प्रति सदा ही निष्ठावान और ईमानदार रहा उसे जब उसका कनिष्ठ कर्मी पीछे छोड़कर आगे बढ़ता है, तो पीछे छूटे व्यक्ति को कुण्ठा घेर लेती है। उसकी निष्ठा का पुरस्कार देश की शासन प्रणाली उसे उसकी कुण्ठा के रूप में प्रदान करती है यह कहां का न्याय है? छुआछूत की सामाजिक बुराई के कारण देश में कोई जाति पहले यदि अपमान का प्रतीक थी तो आज आरक्षण के कारण जाति कुण्ठा का कारण बन गयी है। किसी के लिए अगड़ा होना कुण्ठा का कारण हो गया है। संविधान की भावना थी कि जातिगत छुआछूत और ऊंचनीच की भावना को समाज से टूट कर के सामाजिक न्याय प्रदान किया जाएगा, जबकि हमने आरक्षण के लफड़े से जातीय विद्वेष भाव को और बढ़ाकर यह सिद्घ कर दिया कि जाति एक सच्चाई के रूप में हमारे साथ खड़ी है और हम उसे बनाये रखना ही बेहतर मानते हैं।
इस देश में जातीय आरक्षण जातीय संघर्ष का रूप ले लिया है। वीपी सिंह के काल में हमने जातीय हिंसा को अपने भयंकर स्वरूप देखा था। उस समय लोगों का गुस्सा सड़क पर लाने की भांति उबल रहा था। लेकिन हमारे नेताओं ने उससे कोई शिक्षा नही ली और बाद में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कर दिया गया। हमारा मानना है कि देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं जो सड़कों के फुटपाथों पर अपना समय गुजारते हैं। सचमुच उनकी जाति उनका धर्म और उनका ईमान केवल रोटी होती है। भिक्षा होती है उसके लिए भी उन्हं कितनी दुत्कार खानी पड़ती है ये वही जानते हैं। देश का कोई नेता या कोई राजनीतिक पार्टी कभी भी रोटी को अपनी जाति और अपना धर्म ईमान मानने वाले लोगों से उनकी जाति धर्म (सम्प्रदाय) पूंछने कभी नही गयी। आरक्षण को कुछ लोगों ने ऊपरी तौर पर प्राप्त किया और बांटकर खा लिया। फुटपाथ पर सोने वाले लोग नही जानते कि आरक्षण क्या होता है और उससे तुम्हें क्या लाभ मिल सकता है? यदि आरक्षण का आधार आर्थिक होता तो देश में सभी लोगों को आर्थिक न्याय की प्राप्ति एक संवैधानिक गारंटी के रूप में होती। तब अयोग्य से योग्य बनने की प्रतिस्पद्र्घा समाज में आती ना कि योग्य को पीछे धकेल कर आरक्षण की अयोग्यता से अपने आपको आगे लाने की नकारात्मक प्रतिस्पद्र्घा जन्मती।
हमारे समाज में जातिवाद एक बुराई रहा है। इसे सभी ने बुरा माना है लेकिन जाति को स्वहित में लोगों ने वोट के लिए एक हथियार भी बनाया है और वक्त बेवक्त इसी के सहारे कितने ही लोगों ने अपनी चुनावी वैतरणी भी पार की है। अब प्रश्न ये आता है कि जो चीज अपने जन्म से ही हमारे लिए बुरी है, उसे हम बनाये रखना क्यों चाहते हैं। आरक्षणा के पैरोकार कभी भी इस प्रश्न का उत्तर नही दे पाएंगे। उनके पास इस प्रश्न का भी उत्तर नही है कि जातिवाद के जहर से भावशून्य और संवेदनाशून्य बनी राजनीति अंतत: समाज में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक न्याय क्यों नही स्थापित कर सकी? प्रोन्नति में आरक्षण की स्थिति देश के लिए उतनी ही घातक है जितनी कि आरक्षण की नीति। इस प्रकार की नीति कर्मचारियों की कार्यशैली पर बुरा प्रभाव पड़ता है। योग्यताा से अयोग्यता की प्रतिस्पद्र्घा होती है और हम देखते हैं अयोग्यता भावशून्य बनकर जब योग्यता पर शासन करती है तो योग्यता को अपनी योग्यता पर ही शर्म आती है। जहां योग्यता को अपनी योग्यता पर ही शर्म आने लगे उस देश के समाज को आप श्रेष्ठ पुरूषों का समाज नही कह सकते। वहां एक ऐसा कंपटीशन होता है जो समाज को बेतहासा अराजकता की ओर धकेल देता है वहां लोग परस्पर मिल जुलकर रहने में नही अपितु एक दूरी बनाकर रहने में ही अपना भला समझते हैं।
भारत में ऐसा ही तो हो रहा है, निश्चय ही यह स्थिति हमारे संविधान की भावना के विपरीत है हम 65 साल में ढाई कोस ही चल पाए हैं। जबकि दुनिया बहुत आगे बढ़ चुकी है। हम यह तय नही कर पाए कि व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए जाति नही आर्थिक स्थिति होगी।