भव्य राम मन्दिर के निर्माण की बनती अधूरी आस

  • 2015-11-25 04:00:47.0
  • राजीव गुप्ता

हिन्दुत्व पुरोधा अशोक सिंघल का नाम सुनते ही एक हिन्दूवादी छवि के नेता का चित्र मानस में उभरता है । ऐसा व्यक्तित्व जिसके जीवन का एक मात्र उद्देश्य था अयोध्या में भगवान राम का भव्य मन्दिर निर्माण करवाना । अपने उद्देश्य की पूर्ति हेतु इस व्यक्तित्व ने अजीवन संघर्ष किया । इसी वर्ष के 30 सितम्बर को भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता डा. सुब्रह्मण्यम स्वामी के साथ मिलकर अशोक सिंघल ने अपने जीवन की अंतिम प्रेसवार्ता को संबोधित करते हुए वर्तमान केन्द्रीय सरकार को अयोध्या में भगवान राम के भव्य मन्दिर निर्माण करने की तरफ अग्रेसित होने के लिए कहा । अशोक सिंघल को भारतीय तिथि के अनुसार पिछले मास 1 अक्टूबर को अपना 90 जन्मदिन मनायें हुए अभी चंद दिन ही बीते थे और दिल्ली के सिविक सेंटर में आयोजित उस कार्यक्रम में जो भी गया होगा उसने कभी यह कल्पना भी नही की होगी कि मात्र चंद दिनों बाद ही अशोक सिंघल हमारे बीच में नहीं होगें । अपने जन्मदिन के उस कार्यक्रम में अशोक सिंघल ने अपनी बुलन्द आवाज एक गीत ‘यह मातृभूमि मेरी, यह पितृभूमि मेरी..’ गाकर सबको आश्चर्यचकित कर दिया था । अपने सपने को अपनी मौत की आहट सुनकर भी कैसे जिन्दा रखा जाय, यदि यह जानना हो तो आपका अधिक पीछे जाने की जरूरत नही । गत मास हुए सिविक सेंटर में हुए उस कार्यक्रम को ध्यान कीजिए, जब विष्णु हरि डालमिया ने संघ परिवार की शीर्ष नेतृत्व मोहनराव भागवत तथा देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह की उपस्थिति में कह दिया अयोध्या में भगवान राम का भव्य मन्दिर बनवाकर अशोक सिंघल जी को जन्मदिन का तोहफा दे दीजिए । स्वतंत्र भारत के इतिहास में अशोक सिंघल एक ऐसा नाम बनकर उभरा जिससे वैचारिक मतभेद होने के बावजूद भारतवर्ष का शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो उनके व्यक्तित्व से परिचित न हो । अशोक सिंघल के कारण ही देश की राजनीति को भी राममन्दिर का ककरहा पढकर ही राजनीति करना पडा । उन्होंने देश के नेताओं को यह सिद्ध करके दिखा दिया कि धर्म से बढकर कोई राजनीति नही होती है । उनके राममन्दिर आन्दोलन ने ही लालकृष्ण आडवाणी को नायक और अटल बिहारी वाजपेयी को देश का प्रधानमंत्री बनाया । दूसरे शब्दों में, जिसने रामनाम से राजनीति शुरू किया वह राजनीति की वैतरिणी में पार हुआ ।

दो ध्रुवों की तरह आस्था और विज्ञान को साधने वाले अशोक सिंघल ने बीटेक की अपनी पढाई बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से किया था । लेकिन अशोक सिंघल ने नौकरी करने की जगह हिन्दुत्व की राह पकड़ा और पहुंच गए गोरखपुर के गोरक्षनाथ मन्दिर । उन दिनों हिन्दुत्व की सबसे बडी प्रयोगशाला गोरखपुर का गोरक्षनाथ मन्दिर ही था । वहाँ पहुँचकर अशोक सिंघल ने गीताप्रेस और गीतावाटिका में वेदों और उपनिषदों का अध्ययन शुरू किया । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघाचालक प्रो. राजेन्द्र सिंह उर्फ रज्जू भैया के माध्यम से अशोक सिंघल का संघ के साथ संबंध आया और वर्ष 1942 से स्थानीय ‘भारद्वाज शाखा’ जाने लगे । प्रो. राजेन्द्र सिंह के निर्देश पर वें श्री गुरू जी से मिलने नागपुर चले गए । गुरू जी से मिलने के बाद तो उन्होंने पीछे मुडकर ही नही देखा । रज्जू भैया और अशोक सिंघल, दोनों के पिता प्रशासनिक अधिकारी थे और इलाहाबाद में अगल - बगल में दोनों का घर होने के कारण पारिवारिक संबंध बहुत प्रगाढ था । 1949 में संघ पर प्रतिबन्ध लगने के कारण वें जेल भी गए । भानुप्रताप शुक्ल के पूछने पर संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरू जी ने एक बार कहा था कि संघ के कार्य को बढाने वाले नई पीढी में बहुत लोग हैं, उन लोगों में से नई पीढी में कानपुर के अशोक सिंघल भी हैं । कालांतर में अशोक सिंघल संघ के प्रचारक बने और लगभग 25 वर्ष तक उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में प्रचारक के नाते संघ का कार्य किया । बाद में वें देहरादून, हरिद्वार और उत्तरकाशी में भी प्रचारक रहे । दूसरे शब्दों में, पहले उन्हें साधु - संतों का सान्निध्य प्राप्त करने का सौभाग्य मिला और 70 के दशक में अशोक सिंघल ने जेपी आंदोलन में हिस्सा लिया ।

1975 में देश में आपातकाल लगाया गया और 1977 में जब आपातकाल देश पर से हटा तो अशोक सिंघल को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, दिल्ली प्रांत का प्रांत प्रचारक बनाया गया । दिल्ली प्रांत प्रचारक होने के कारण 1977 में जनता पार्टी के गठन में पर्दे के पीछे उनकी बडी भूमिका थी । इमरजेंसी के दौरान वें भूमिगत हो गए थे । इमेरजेंसी खत्म होने के बाद संघ की योजना से वें विश्व हिन्दू परिषद भेजे गए । कालांतर में अशोक सिंघल वर्ष 1981 में 5 - 6 लाख की संख्या वाले विराट हिन्दू समाज के कार्यक्रम के संचालक के रूप में सार्वजनिक मंच पर वे पहली बार सामने आये । सन 1982 में वें विश्व हिन्दू परिषद के संयुक्त महामंत्री का दायित्व उन्होनें संभाला । वर्ष 1986 में विहिप के महामंत्री का दायित्व संभाला । तत्पश्चात विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष बने और लंबे समय तक वें अध्यक्ष बने रहे । स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण उन्होंने विश्व हिन्दू परिषद का अध्यक्ष पद छोड दिया और विश्व हिन्दू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय संरक्षक के रूप में अजीवन मार्गदर्शन करते रहे ।

अशोक सिंघल के कारण देश में ‘रामजन्मभूमि’ एक ऐसा विषय बन गया जिसने केन्द्र सरकार तक को प्रभावित किया । विश्व हिन्दू परिषद द्वारा चलाये जा रहे हिन्दू समाज के जागरण का अभियान 25 सितम्बर, 1990 को और तीव्र हो गया क्योंकि इस दिन भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा लेकर निकले और जनता को श्रीराम मन्दिर जीर्णोद्धार का महत्व तथा छद्म पंथनिरपेक्षता का अर्थ समझाने लगे । जिसके कारण आडवाणी की रथयात्रा से कांग्रेस के वोट का गणित बुरी तरह बिगड गया । कालांतर में अयोध्या में घटित 30 अक्टूबर से 2 नवम्बर, 1990 की घटना का साक्षी रहे भानुप्रताप शुक्ल ने लिखा था कि इतिहास और हम साथ - साथ चल रहे थे । हम मौन थे किंतु इतिहास मुखर था । विश्व हिन्दू परिषद द्वारा घोषित कारसेवा को मुलायम सिंह यादव द्वारा नही करने देने की घोषणा से दुनिया भर के लोगों की निगाहें अयोध्या पर आ टिकी थी । 29 अक्टूबर की देर रात्रि तक अयोध्या में कोई हलचल नही थी । चारों तरफ मुलायम सिंह यादव की चौकसी की वाहवाही हो रही थी । 30 अक्टूबर की प्रात: 9 बजकर 10 मिनट पर मणिराम छवनी का सिंहद्वार खुला । अशोक सिंघल मात्र तीन - चार लोगों के साथ प्रसन्न मुद्रा में निकले । चारों तरफ सन्नाटा था । समय ने सांस रोक लिया और मानों कहने लगा कि हे राम ! क्या अकेले अशोक सिंघल ही कारसेवा करेगें कि अचानक एक साथ लाखों कारसेवक अयोध्या के घरों से निकल कर एक साथ प्रकट हो गए और रामजन्मभूमि की तरफ निकल पडे ।