भारत पर बीसवीं सदी में सबसे ज्यादा असर पंडित नेहरू का रहा

  • 2015-11-16 06:30:41.0
  • उगता भारत ब्यूरो

rp_jawaharlal-nehru-j-6188.jpgकनक तिवारी

मनुष्य के यश की आयु निधन के बाद शुरू होती है। भारत पर बीसवीं सदी में सबसे ज्यादा असर नेहरू का ही रहा है। गांधी के प्रभाव की किस्म अलग है। उन्हें स्वीकार कम, उपेक्षित ज्यादा किया गया है। नेहरू अपने जीवनकाल में उपेक्षित नहीं हुए। उन पर गांधी की उपेक्षा करने का आरोप अलबत्ता आंशिक रूप में लगता है। रवींद्रनाथ ठाकुर के शब्दों में जवाहरलाल ‘भारतीय जीवन के ऋतुराज’ थे। विनोबा ने उन्हें ‘स्थितप्रज्ञ’ कहा है। एक प्रख्यात विदेशी पत्रकार ने उनकी तुलना शेक्सपियर के असमंजस में डूबे अमर पात्र डेनमार्क के राजकुमार ‘हैमलेट’ से की है। ऑल्डस हक्सले ने उन्हें चट्टानी राजनीति की छाती पर अपना अस्तित्व जमाने वाला गुलाब का पौधा कहा है। ये अतिशयोक्तियां नहीं हैं। नेहरू के व्यक्तित्व का सूक्ष्म रूप में मूल्यांकन हैं। कभी जवाहरलाल ने खुद को अपने खिलाफ लेख लिख कर ‘तानाशाह’ कहा था। वे प्रजातांत्रिक लोकप्रिय तानाशाह भी थे।

गांधी के अतिरिक्त जवाहरलाल आजादी के सूरमाओं में अंतरराष्ट्रीय स्तर के सबसे बड़े भारतीय बुद्धिजीवी हैं। वे न तो इतिहासकार हैं, न ही ऐतिहासिक उपन्यासकार। उनका इतिहास-बोध अकादमिक गलियारों में आज भी प्रकाश-पुंज की तरह विद्वानों को समझ का रास्ता दिखाता है। वनस्पतिशास्त्र, भूगर्भशास्त्र और रसायनशास्त्र की तिकड़ी के स्नातक केम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज के छात्र जवाहरलाल ने ‘वैज्ञानिक वृत्ति’ जैसा नया शब्द नए भारत के लिए गढ़ा था। उनमें यूरोपीय ज्ञान का अभिजात्य भारतीय परिस्थितियों में छन-छन कर घनीभूत होता रहा। नेहरू का समाजवाद कार्ल माक्र्स और लेनिन के साम्यवाद की तरह नुकीला, पथरीला या धारदार नहीं था। वे ब्रिटेन के शाइस्तगीयुक्त फेबियन समाजवादियों के वार्तालाप से उपजी समझ को अपने सहयोगी कृष्ण मेनन की मदद से बूझने का जतन युद्ध की खंदकों में बैठ कर भी कर रहे थे जब उनकी तपेदिकसे तपती पत्नी स्विट्जरलैंड के अस्पताल में भरती की गई थीं।

बेटी इंदिरा के नाम लिखे नेहरू के पत्र इतिहास-अध्ययन में पत्थर की लकीर हैं। जेल में बैठ कर किताबों से अधिक अपनी स्मृति और श्रुति के सहारे जवाहरलाल ने शब्दों से भाषाई नक्काशी करते अनायास या सायास मनुष्य के अस्तित्व को देखने की अनोखी नई दूरबीन ईजाद की। वे घोषित तौर पर नास्तिक थे लेकिन उनकी आध्यात्मिक रहस्यमयता, बौद्धिक क्रियाशीलता और लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता मिल कर उन्हें ऐसा इंसान बनाती है जिसका आकर्षण सबको अपनी ओर खींचता था। इस आकर्षण की बहुरंगी छवियों से लेकर अकिंचन बच्चों तक के किस्से मुख्तसर हैं। ये अनगिनत बच्चे नेहरू के चेहरे की मुस्कराहट बने रहे। जवाहरलाल का विश्व-दृष्टिकोण उनके समकालीन किसी विश्व-नेता को इसलिए नसीब नहीं हुआ कि अमीर लोकतंत्रों अमेरिका और यूरोप के शासक तक भविष्यमूलक दृष्टि से अपनी अकादमिक हीनता के कारण वंचित रहे हैं। जिस दुनिया की कल्पना नेहरू ने की थी वह एक रोमांटिक ख्वाब होने के बावजूद अपने अस्तित्व की संभावना के लिए समूचे विश्व में लगातार खदबदाता रहता है।

नेहरू रूढ़ साम्यवादियों की तरह अवाम के प्रति अपने कटिबद्ध प्रयत्नों का ढिंढोरा नहीं पीटना चाहते थे। वे समकालीन भारतीयों के जस का तस आचरण और समझ को भारत का समानार्थी नहीं समझते थे। नेहरू अपनी पांचों ज्ञानेंद्रियों से जिस भारत को महसूस करते थे, वह पंचमुखी भारत बहुतों की समझ के बाहर था। दिखाई देने का तो सवाल ही नहीं था। वे एक साथ एचजी वेल्स की ‘टाइम मशीन’ जैसे किसी उपग्रह में बैठ कर वेदों के काल से अशोक, अकबर, कबीर, भामाशाह और पुर्तगाल तथा अंगरेजी साम्राज्यावाद तक अपने तर्क और विचार के डैने आसानी से पसार लेते थे। ‘विश्व इतिहास की झलक’ जैसे उर्वर गल्प-ग्रंथ का कोई समांतर विश्व-वांग्मय में नहीं है। उनकी ‘आत्मकथा’ के शीशे की पारदर्शिता में कोई भी अपना चेहरा पहचान सकता है। उसके पीछे लेकिन लगा पारद मिश्रण जैसा घनीभूत अनुभव भी होना चाहिए। उनकी आत्मकथा उनके जीवन-संघर्ष के साथ ही भारत के प्रति उनके नजरिए पर भी रोशनी डालती है। जब राजनीतिक स्वाधीनता का लक्ष्य तो स्पष्ट था, पर यह लक्ष्य हासिल होने के बाद भारत की दिशा स्पष्ट नहीं थी, नेहरू बराबर भावी भारत की तस्वीर के बारे में सोचते रहते थे। भारत को आधुनिक, प्रगतिशील, सेक्युलर, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने में सबसे विशिष्ट योगदान नेहरू का ही था। विचित्र है कि आज उनकी इसी देन पर हमला हो रहा है।

नेहरू ने अपनी प्रजातांत्रिक समझ के चलते जम्मू-कश्मीर के विलय के मामले में ‘हैमलेट’ का अभिनय किया। उन्होंने वामपंथी साथियों की सलाह पर भरोसा करते हुए चीन पर पूरा यकीन किया। नेहरू ने कुछ और छोटी-मोटी मनुष्योचित गलतियां की होंगी। हिंदुओं की पारंपरिक प्रथाओं को अधुनातन बनाने का उनका आग्रह लोकसभा में कई अधिनियम पास कराने को लेकर साकार हुआ। नेहरू की वैज्ञानिक समझ को संविधान सभा के अप्रतिम प्रारूप-लेखक डॉ आंबेडकर का सहयोग अमूमन मिलता रहा। लेकिन ये बड़े नेता क्यों नहीं समझ पाए कि राजनीति के जरिए देश का चेहरा तराशने के जो उपकरण तैयार कर रहे हैं उन्हें इतिहास अंतत: ‘बंदर के हाथ में उस्तरा’ जैसा मुहावरा बना देगा। नेहरू की स्त्रियोचित किस्म की सार्वजनिक जिद भी मनुष्य होते रहने की रोमांचकारी कहानियों में तब्दील होती रही है। उन्हें सरदार वल्लभभाई पटेल जैसा सहयोगी, आलोचक और सलाहकार उपलब्ध था। इसलिए नेहरू ने कई बार किसी बड़े मैच को खेलने के पहले नेट प्रैक्टिस करते हुए संभावित गलतियों को लेकर पटेल की श्रेष्ठता को तरजीह भी दी। उनमें आत्मविश्वास या आत्ममोह से बढ़ कर आत्म-प्रताडऩा का स्पर्श भी घटनाओं के संदर्भ में देखने को मिलता है। डॉ राधाकृष्णन ने उनकी कृतियों में नैतिक अहम्मन्यता के संस्पर्श को उकेरने की बौद्धिक चेष्टा की है।

अपनी इकलौती बेटी इंदिरा प्रियदर्शिनी को कुलदीपक की तरह बाले रख कर राजनीति में कथित वंशवाद का बिरवा नेहरू रोपित नहीं कर रहे थे। इसकी फूहड़ आलोचना कुछ मंदबुद्धि के लोग घृणा के कारण फिर भी करते हैं। राजनीति के बियाबान में नेहरू की अप्रत्याशित मृत्यु के बावजूद इंदिरा गांधी ने निहित संस्कारों के दम पर खुद को देश का नेता बनाया। उसका अंकुरण उनके जेहन में पिता की चि_ियों ने किया होगा। नेहरू का सबसे बड़ा योगदान उनकी भविष्य-दृष्टि है। वेस्टमिन्स्टर प्रणाली का प्रशासन, यूरो-अमेरिकी ढांचे की न्यायपालिका, वित्त और योजना आयोग, बड़े बांध और सार्वजनिक क्षेत्र के कारखाने, शिक्षा के उच्चतर संस्थान, संविधान की कई ढंकी-मुंदी दिखतीं लेकिन समयानुकूल वाचालता से लकदकउपपत्तियां जैसे सैकड़ों उपक्रम हैं जिन्हें बूझने में जवाहरलाल की महारत का लोहा मानना पड़ता है।

तीसरी दुनिया का रचा गया सपना, अमेरिकी हेकड़बाजी के मुकाबले सोवियत मैत्री, ईसाई और इस्लामी मुल्कों के प्रगतिशील नेतृत्व से साझा और पंचशील सहित अहिंसा तथा सहयोग की अभिनव शैली की इबारतें जवाहरलाल का गोदनामा हैं। उनके नायाब प्रस्फुटित चरित्र में कवियों को लजा देने वाली शख्सियत उनके गोपनीय उदास क्षणों में संगीतमय होती। उन्होंने भारतीय अस्तित्व की भूमध्यरेखा रही गंगा को आधार बना कर इतिहास को बहती हुई नदी में तब्दील कर अपनी वसीयत लिखी। भारत की धरती के एक वैध कण के रूप में जवाहरलाल ने अपने अस्तित्व को धरती की भाषा का ककहरा बना दिया। ऐसा चमत्कार दुनिया की किसी वसीयत में आज तक किसी ने लिखने का सोचा नहीं। क्रांतिकारी नायक भगतसिंह ने वस्तुपरक तटस्थ मूल्यांकन में गांधी, लाला लाजपतराय और सुभाष बोस जैसे नेताओं को दरकिनार करते हुए नेहरू को नए भारत का धु्रुवतारा बताया। उन्होंने नौजवानों से अपील की कि फकत नेहरू देश की समस्याओं को हल कर सकते हैं। ऐसा प्रमाणपत्र भगतसिंह ने अन्य किसी नेता को नहीं दिया। उनकी मौत के बाद तकिए के पास शंकर-दर्शन की पुस्तक, कमला नेहरू की भस्म और अमेरिकी कवि रॉबर्ट फ्रॉस्ट की कविता की पंक्तियां मिली थीं, जिनमें भविष्य के लिए कुछ करने का जज्बा था। आज जतन हो रहा है कि देश में जो कुछ भी बुरा हुआ है उसकी कालिख जवाहरलाल नेहरू के जीवंत खुशनुमा चेहरे पर पोत दी जाए।

दमित महत्त्वाकांक्षाओं के कुछ नेता नेहरू का नाम धरते या उपेक्षित करते यह समझ नहीं पाते कि गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांतों के चलते आसमान की ओर देख कर नहीं थूकना चाहिए। उन्हें यह भी समझ नहीं आता कि किसी की ओर निंदा की एक उंगली उठाने से खुद की ओर तीन उंगलियां उठ जाती हैं। इतिहास को यह बात मालूम है कि लगभग 1928 से नेहरू गांधी का शिष्यत्व स्वीकार करने के बावजूद उनसे मैदानी राजनीति के अंधड़ों से देश को बचाने के प्रयत्न में छिटक रहे थे। 1942 के बाद विशेषकर 1945 के आसपास जवाहरलाल ने कई चि_ियां गांधी को लिखी हैं। वे नेहरू के चरित्र की नमनीयता के अनुकूल नहीं हैं। गांधी ने अलबत्ता कहा था कि भविष्य में जवाहर उनकी भाषा बोलेगा। गांधी की गांव की समझ को तिरस्कृत कर नेहरू ने नगर आधारित भारत का जो ढांचा खड़ा किया उसकी चूलें हिलने लगी हैं। स्मार्ट सिटी, बुलेट ट्रेन, डिजिटल इंडिया, गूगल, मेक इन इंडिया, एफडीआई वगैरह नए अमेरिकी शोशे नेहरू द्वारा रखी गई नागर संस्कृति पर उठने वाली इमारतें तो हैं लेकिन दोनों में संवेदना का कोई आपसी रिश्ता नहीं है। काश! जवाहरलाल ने गांधी को इतना ज्यादा खारिज नहीं किया होता।