भारत में तालाब संस्कृति से टलेगा जल संकट

  • 2016-04-30 09:30:13.0
  • उगता भारत ब्यूरो

तालाब संस्कृति

एक समय था जब देश में शिक्षा का इतना प्रसार नहीं था, तब भी लोग जल संस्कृति के प्रति सजग थे। वे तालाब संस्कृति को पुष्पित-पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे। अब जब कम्प्यूटर, इंटरनेट का जमाना आया है, तो हम तालाब संस्कृति से अनभिज्ञ बन गए हैं। यह शिक्षा का कैसा विस्तार है।

हर तरफ से सूखे की खबरें। पानी के लिए हाहाकार। सरकारों की हालत ऐसी कि प्यास लगे तो कुआं खोदो। बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग से पर्यावरणविद चिंतित। ग्लेशियर पिघलने लगे हैं। उनका आकार घटने लगा है। प्राकृतिक स्रोत सूखने लगे। आधुनिकता के मकडज़ाल में फंसकर हम पारंपरिक जल स्रोतों की उपेक्षा कर चुके हैं। नल संस्कृति पुराने प्राकृतिक स्रोतों पर हावी है। आज के परिवेश में आदमी अपने को बहुत आगे निकल गया समझता है, लेकिन जल कैसे बचेगा? इससे अनजान बना हुआ है। सब कुछ जानकर भी अनजान है। यदि अब भी समाज चेत जाए, सरकारें जाग जाएं तो भविष्य में जल संकट से बचा जा सकता है। इसके लिए इतना ही करना होगा कि हमें परंपरागत तालाब संस्कृति को एक बार फिर से अपनाना होगा। वर्षा का जल, जो बहकर व्यर्थ चला जाता है, उसे इन तालाबों में सुरक्षित जमा करना होगा, ताकि समीप के प्राकृतिक जल स्रोत रिचार्ज हो सकें।  यह सब हकीकत में करने की जरूरत है।

कागजों में तो वन भी बहुत लगे हैं। तालाब भी खुदे हैं। काफी धन इन सब पर खर्च हुआ है। आगे भी खर्च होता रहेगा, लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ नहीं हुआ है। हमारे यहां काफी जमीन सरकारी व गैर सरकारी क्षेत्र में खाली पड़ी है। सरकारी जमीन पर कई रसूखदार लोग नौकरशाही व राजनेताओं के आशीर्वाद से अवैध कब्जे करके वहां अवैध भवन बनाकर आगे किराए पर चढ़ा कर चांदी कूट रहे हैं। यह शहरी क्षेत्रों का हाल है, लेकिन ऐसे लोग सरकारी भूमि तो कब्जा लेते हैं, पर वहां जनहित में पौधारोपण नहीं करते हैं। कंकरीट के जंगल खड़े हुए हैं। हरे-भरे जंगलों का वजूद समाप्त हो रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी सरकारी भूमि लोग अपने फायदे के लिए कब्जाने के आदी हो गए हैं। इस मनोवृत्ति को राष्ट्रहित में बदलना ही समस्या का हल हो सकता है। आखिर तालाब संस्कृति क्यों नहीं पनपे? मनरेगा के पैसों से जगह-जगह तालाब बनाए जाएं। गरीब लोगों को रोजगार भी मिलेगा और उन तालाबों में वर्षा का जल भी इक_ा होता रहेगा।

वन क्षेत्र में भी यह सब होना चाहिए। तालाबों के आसपास बयूंस आदि पेड़ लगने चाहिएं, जो जल मित्र हैं। सफेदे आदि के पेड़ों से जल संरक्षण में नुकसान होता है। इसके रोपण से बचा जाए। देखने में आया है कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में दौड़ते हुए हम सब कुछ लुटाते चले जा रहे हैं। कई जगह पुराने तालाबों को नष्ट किया गया है। उन पर भी अवैध कब्जाधारियों की गिद्ध दृष्टि पड़ चुकी है। पहले जगह-जगह गांव-गांव में तालाब होते थे। वहां पशु पानी पीते थे। तालाब का पानी लोग दूसरे कामों में प्रयोग कर लेते थे। अब आधुनिक बनने के चक्कर में हम प्रगति तो कर रहे हैं, घरों में शौचालय बन रहे हैं, पानी का खर्च बढ़ रहा है, लेकिन पानी का संरक्षण नहीं हो रहा है। भूमि के नीचे का जल और गहरा होता जा रहा है यानी जल लुप्त हो रहा है और जल संकट बढ़ रहा है। ऐसे में इस समस्या के प्रति सजग होना जरूरी है।

तालाब खोद कर, तालाब संस्कृति को बढ़ावा देने की जरूरत है। भारतीय संस्कृति में तो तालाब संस्कृति को शुरू से ही महत्त्व दिया गया है। जंगलों में पुराने बुजुर्ग लोग छोटी-छोटी तलाइयां खोदा करते थे। वह वर्षा के जल से अपनी प्यास बुझाते थे। इसे पुण्य का कार्य समझा जाता था। बावडिय़ों आदि की साफ-सफाई रखी जाती थी। जूते, चप्पल पहन कर कोई भी किसी बावड़ी से न तो पानी भर सकता था और न ही पानी पी सकता था। स्वच्छता का पूरा ध्यान रखा जाता था। आज जल को गंदा कर दिया जाता है, जिससे पीलिया जैसी जानलेवा बीमारियों का फैलना स्वाभाविक है। इस देश में जब शिक्षा का इतना प्रसार नहीं था, तब भी लोग जल संस्कृति के प्रति सजग थे। वे तालाब संस्कृति को पुष्पित-पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे। अब जब कम्प्यूटर, इंटरनेट का जमाना आया है तो हम तालाब संस्कृति से अनभिज्ञ बन गए हैं। यह शिक्षा का कैसा विस्तार है? क्यों हमारी नदियां गंदी हो रही हैं। प्राकृतिक स्रोतों के प्रति हम इतने लापरवाह क्यों होते जा रहे हैं?
जल ही जीवन है जैसे नारे लगा देना ही काफी नहीं है। बच्चों में शुरू से ही जल संरक्षण के बारे में रुचि पैदा करने की जरूरत है। पाठ्यक्रम में इस विषय पर रुचिपूर्ण सामग्री दी जाए। ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में तालाब संस्कृति की झलक देखने को मिले। बच्चों के माध्यम से कोई भी काम सही ढंग से किया जा सकता है। अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है। घर-घर तक पहुंचाया जा सकता है। इसलिए तालाब संस्कृति को विकसित करना व बढ़ावा देना वक्त की जरूरत है।  सीमेंट कारखानों ने पहाड़ों को काट-छांट कर उनका अस्तित्व ही मिटाने को आतुर हैं। सरकारों को चाहिए कि प्राकृतिक संपदा का बेरहमी से दोहन करने वाले सीमेंट घरानों पर अपने कारखानों के आसपास तालाब बनाने का जोर डाला जाए। खनन क्षेत्र  में तालाब बनें, ताकि जल संरक्षण हो सके।
-कुलदीप चंदेल