भगवती दुर्गा द्वारा महिषासुर का वध (महिषासुर का इतिहास)

  • 2016-04-09 06:30:56.0
  • प्रो. राजेन्द्र सिंह

महिषासुर

छठे और सातवें मन्वन्तर के सन्धिकाल में प्रजापति दक्ष ने अपनी धर्मपत्नी असिक्नी के गर्भ से साठ कन्याएं उत्पन्न कीं । समय पाकर उन्होंने इनमें से दस कन्याएं धर्म को, तेरह कश्यप को, सत्ताईस चन्द्रमा को, दो भूत को, दो अंगिरा को, दो कृशाश्व को और शेष चार तार्क्ष्य को ब्याह दीं(भाग-वत पुराण ६/६/२)।
ब्रह्मा के सात मानस पुत्रों में से एक मरीचि के पुत्र कश्यप की तेरह धर्मपत्नियों के नाम हैं : दिति, अदिति, दनु, दनायु, काला, सिंहिका, क्रोधा, प्राधा, विश्वा, विनता, कपिला, मुनि और कद्रू (महाभारत, आदिपर्व ६५/१२-१३)।
महर्षि कश्यप और उनकी ज्येष्ठ पत्नी दिति से हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु नामक दो जुड़वां पुत्र हुए। भागवत पुराण ३/१७/१८ के अनुसार हिरण्य-कशिपु यद्यपि दिति के गर्भ में पहले स्थापित हुआ था तथापि प्रसूति के समय हिरण्याक्ष पहले जन्मा था। दिति की सन्तान होने से दोनों दैत्य कहलाए।
कश्यप और अदिति के १२ पुत्र हुए। इनके नाम थे : धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, अंश, भग, इन्द्र, विवस्वान्, पूषा, पर्जन्य, त्वष्टा और विष्णु। विष्णु छोटे होते हुए भी गुणों में सब भाइयों से श्रेष्ठ थे। अदिति की सन्तान होने से ये सभी आदित्य कहलाए (ब्रह्माण्डपुराण ३/४८/११-१२, महाभारत, अनुशासनपर्व १५०/१४-१५, हरिवंशपुराण ३/४८/११-१२ और विष्णुपुराण१/१५/१३०-१३१)।
महर्षि कश्यप का पौत्र था महिषासुर

कश्यप और दनु के ३४ पुत्र हुए (महाभारत, आदिपर्व ६५/२१-२६)। दनु की सन्तान होने से ये सभी दानव कहलाए। इनमें से रम्भ और करम्भ नामक दानव उल्लेखनीय हैं। देवीभागवतपुराण ५/२/४८-४९ के अनुसार रम्भ और महिषी से रक्त-बीज और महिषासुर उत्पन्न हुए। इस प्रकार यह बात बिल्कुल सपष्ट हो जाती है कि दानव महिष महर्षि कश्यप का पौत्र ही था, किसी अन्य जाति या कुल का व्यक्ति नहीं।

अतः ईसाई मिशनरियों की शरारतपूर्ण प्रेरणा पाकर कुछ लोगों द्वारा विगत कई वर्षों से महिषासुर का महिमामण्डन करते हुए उसे जो अलग जाति, कुल अथवा वंश का व्यक्ति बताया जा रहा है उस बात में कोई दम नहीं है। इसी प्रकार भगवती दुर्गा के सन्दर्भ में भी इन्हीं कुतत्त्वों द्वारा आए दिन जो प्रलाप किया जा रहा है उसमें भी कोई सत्य नहीं।
महिषासुर द्वारा देवों का राज्य हड़पना

देवीभागवतपुराण के अनुसार ब्रह्मा से देवों-दानवों-मनुष्यों द्वारा अवध्य होने का वरदान पाने के कारण अभिमानी हो चुके महिषासुर ने राज्य पा लेने के बाद सारे जगत् को अपने वश में कर लिया। महर्षि व्यासदेव बताते हैं कि "जो पुरातन भूपाल थे वे सभी अब महिषासुर को कर देने लगे। उनमें जो स्वाभिमानी और क्षात्र धर्म के अनुसार लोहा लेने वाले थे वे मार डाले गए। ब्राह्मण भी महिषासुर के अधीन होकर उसे यज्ञ-भाग देने लगे। इस प्रकार एकछत्र राज्य स्थापित करके वरदान से गर्वित महिषासुर स्वर्ग को जीत लेने की अभिलाषा करने लगा। फिर उसने दूत के द्वारा देवों के राजा इन्द्र को यह सन्देश भिजवाया : हे सहस्राक्ष ! तुम स्वर्ग छोड़ दो और अपनी इच्छा से जहां चाहो यथाशीघ्र चले जाओ अथवा हे देवेश मुझ महिष की सेवा करो। यदि तुम मुझ राजा के शरणागत हो जाओ तो तुम्हारी रक्षा की जाएगी। अतः शचीपते ! तुम महिष की शरण में चले आओ। अन्यथा युद्ध के लिए तैयार हो जाओ (देवीभागवतपुराण ५/३/१-१३)।
देवराज इन्द्र द्वारा टका-सा उत्तर मिलने से
बौखलाए महिषासुर ने देवलोक पर आक्रमण करके अन्ततः उसे अपने अधीन कर लिया।
राज्य से वञ्चित देवों का एकजुट होना

अपने राज्य से वंचित कर दिए देवों ने समय पाकर परस्पर यह विचार किया : अब यदि सारे सुर मिलकर अपने तेज से कोई रूपसम्पदा वरारोहा उत्पन्न करें तो वही रणभूमि में अपने पराक्रम से उस दानव को मार सकेगी। तदन्तर सभी देवों के एकजुट हुए प्रयास से एक तेजोराशि प्रकट हुई।
व्यासदेव बताते हैं : "तब वहां सभी देवताओं के देखते-देखते उस तेजःपुंज से अतिवरा, सुन्दर तथा विस्मयकारी नारी प्रकट हो गई। सर्व देवों के शरीर से आविर्भूत वह नारी त्रिगुणात्मिका, रम्या, त्रिवर्णा तथा अष्टादश भुजाओं वाली विश्वमोहिनी महालक्ष्मी थी। देवताओं के यहां तेजोराशि से प्रकट १८ भुजाओं वाली वह देवी असुरों के विनाश हेतु सहस्र भुजाओं से सुशोभित हो उठीं" (देवीभागवतपुराण ५/८/४३-४६)।

यहां पर इस कथाप्रसंग से यह महत्त्वपूर्ण संदेश प्राप्त होता है कि घोर संकट की घड़ी आ जाने पर उससे पार पाने के लिए यदि समाज के सभी सात्त्विक वर्ग अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुरूप एकजुट हो जाएं तो आसुरी शक्तियां अवश्य ही पराजित की जा सकती हैं।
महिष द्वारा देवी का पता लगवाना

देवताओं द्वारा दिए अनेक शस्त्रास्त्रों को प्राप्त करने के बाद देवी जब अट्टहास लगाते हुए महा घोर गर्जन करने लगी तो उसे सुनकर महिषासुर ने अपने दूत पता लगाने हेतु भेजे। व्यासदेव बताते हैं कि तब वे दूत सर्वांगसुन्दरी, १८ भुजाओं वाली दिव्या, सारे शुभलक्षणसम्पन्ना, उत्तम आयुध-धारिणी और हाथ में मधुपात्र लेकर मधु पीती देवी के पास पहुंच गए। किन्तु उसे देखकर भयभीत हो उठे और फिर व्याकुल तथा आशंकित होकर वहां से भाग निकले। महिषासुर के पास आकर वे दूत बताने लगे : हे दैत्येश्वर ! वह कोई प्रौढा स्त्री देवी जैसी दिखाई देती है। वह सर्वांगभूषणा और सर्वरत्नों से शोभित नारी है। वह दिव्यरूपा मनोहरा न मानुषी है और न ही आसुरी। वह श्रेष्ठा नाना आयुध धारण करके सिंह पर विराजमान है। वही नारी नाद करती हुई मदगर्विता दीख रही है। हमें तो वह सुरापानरता नारी सभर्तृका = विवाहिता नहीं जान पड़ती है (देवीभागवतपुराण ५/९/४५-५१)।

यहां यह उल्लेखनीय है कि व्यासदेव तो देवी को मधुपान करती हुई बताते हैं जबकि महिषासुर के दूत उन्हें सुरापानरता बताते हैं। क्या यह आजकल के शरारती वामपन्थियों जैसी ग़लत रिपोर्टिंग नहीं है ?

दूत लोग आगे बताते हैं : उस स्त्री के तेज से चुंधयाए हम लोग उसे देखने में समर्थ न हो सके। वह नारी श्रृंगार, वीर, हास्य, रौद्र और अद्भुत रसों से समन्वित थी। ऐसी अद्भुत-स्वरूपा नारी को बिना कुछ कहे ही हम आपके पास लौट आए हैं। राजन् ! अब हमें क्या आदेश है।
तब महिषासुर ने अपने मन्त्री को सेना के साथ भेजने का आदेश देते हुए कहा : "यदि वह नारी साम, दान और भेद इन तीन उपायों से यहां न आए तो उस वरारोहा को बिना मारे ही पकड़ कर मेरे पास ले आओ। यदि वह मृगलोचना प्रीतिपूर्वक आ जाएगी तो मैं उसे अपनी पट्टमहिषी बना लूंगा। मैं तो उसकी रूपसम्पदा की बात सुनकर मोहित हो गया हूं" (देवीभागवतपुराण ५/९/५५-५८)।
देवी का पौरुष रूप

महिषासुर के आदेशानुसार जब उसके प्रधान सचिव ने देवी के पास आकर उन्हें स्त्री-स्वभाव वाली होने के नाते दानवराज की पट्टरानी बन जाने की बात कही तो भगवती दुर्गा ने उसे पशुबुद्धि-स्वभाव वाला बताकर अपने पौरुष का परिचय देते हुए कहा : "मुझे स्त्री-स्वभाव वाली बतानेवाले मूढ़ ! यह तो विचार करो कि क्या मैं पुरुष नहीं हूं ? वस्तुतः उसी के स्वभाव वाली मैं स्त्रीवेशधारिणी हो गई हूं। तुम्हारे प्रभु महिषासुर ने पूर्वकाल में स्त्री से मारे जाने का वरदान मांगा था, उसी से मैं समझती हूं कि वह अतिमूर्ख है। वह तो वीररस का थोड़ा-सा भी जानकार नहीं है। कामिनी द्वारा मारा जाना किसी क्लीब के लिए भले ही सुखकर हो, किन्तु शूर के लिए तो दुःखद ही होता है। (स्त्री को तुच्छ समझने वाले) तुम्हारे प्रभु महिषासुर ने अपनी बुद्धि = तुच्छबुद्धि के अनुरूप वैसा वरदान मांगा था। इसीलिए मैं स्त्री रूप धारण करके अपना कार्य सिद्ध करने यहां आई हूं। मैं तुम्हारे धर्मशास्त्रविरोधी वाक्यों से क्यों भयभीत होऊं" (देवीभागवतपुराण ५/१०/३२-३५)।
अपने अदम्य पौरुष का परिचय देने के बाद भगवती दुर्गा ने तात्त्विक बात समझाते हुए कहा : ब्रह्मा आदि का भी यथाकाल उत्पत्ति-नाश हुआ करता है। उन ब्रह्मा आदि मरणधर्मा के वरदान से गर्वित होकर जो यह मानते हैं कि "हम नहीं मरेंगे" वे मूढ़ तथा मन्दचेतस हैं (दे•भा•पु• ५/१०/४०-४१)।

यहां पर आज के सन्दर्भ में यह महत्त्वपूर्ण बात समझ लेने की बहुत आवश्यकता है कि जो अल्पचेतस लोग नारी को अबला, असहाय, तुच्छ और इससे भी बढ़कर केवल भोग की वस्तु समझने की महती भूल करते देखे जाते हैं उनकी बुद्धि ठिकाने लगाने हेतु भगवती दुर्गा के उपरोक्त वचन पर्याप्त हैं और सदा मनन करने योग्य हैं।

निराश वापस लौटा प्रधानसचिव अब महिषासुर को बताता है : "हे राजन् ! वह वरारोहा सिंह पर आरूढ़ है और अष्टादश भुजा वाली उस रम्या देवी ने उत्तम कोटि के आयुध धारण कर रक्खे हैं। वह कहती है कि मैं महिषी के गर्भ से सम्भूत उस अधम पशु=महिष को सुरगणों का हित साधने के लिए देवी के लिए बलि चढ़ा दूंगी। हे मन्दबुद्धे ! भला कौन मूढ़ा कामिनी इस लोक में होगी जो महिष को पतिरूप में स्वीकार लेगी। मेरे जैसी नारी पशुभाव को प्राप्त महिष को कैसे चाह सकती है ! मैं तो सुरों के शत्रु तुझ महिषासुर को युद्ध में मार डालूंगी। हे दुष्ट ! यदि जीवित रहने की तेरी इच्छा हो तो अभी पाताललोक चले जाओ। हे नृप ! उस मत्त नारी ने ऐसे कठोर वाक्य मुझसे कहे। उन्हें सुन कर पुनः पुनः चिन्तन करते हुए मैं यहां लौट आया हूं" (दे•भा•पु• ५/११/५४,५९-६०,६२-६३)।
देवी को भरमाने का प्रयास

यह सब सुनकर महिषासुर ने अपने विरूपाक्ष, दुर्धर और ताम्र नामक व्योवृद्ध मन्त्रियों को मन्त्रणा हेतु बुलाया। सबके विचार जानने के बाद उसने ताम्र को सेना लेकर देवी दुर्गा के समीप जा पहुंचने का आदेश दिया। राजाज्ञा के अनुसार ताम्र वहां पहुंच कर देवी को युद्ध न करके महिषासुर से विवाह कर लेने की बात समझाते हुए कहने लगा : "संसार में युद्ध दुःखद होता है, ज्ञानीजन को ऐसा नहीं करना चाहिए। लोभासक्त लोग ही परस्पर संग्राम किया करते हैं। पुष्पों से भी युद्ध नहीं करना चाहिए, फिर तीक्ष्ण बाणों से युद्ध की बात ही क्या। निज अंगों का भेदन किसे भाता है !! इसलिए आप कृपा करके देव-दानवों द्वारा पूजित मेरे नाथ महिष को भर्ता=पति के रूप में स्वीकार कर लें। वे आपके सभी वाञ्छित मनोरथ पूरे कर देंगे और इसमें संशय नहीं कि आप राजा की पट्टमहिषी बन जाएंगी। हे देवि ! मेरी बात मान लें, इससे आपको उत्तम सुख प्राप्त होगा। इसमें संशय नहीं कि कष्ट पाकर भी संग्राम में जय का सन्देह बना रहता है। हे सुन्दरि ! आप राजनीति यथावत् जानती हैं। अतः अयुत-अयुत वर्षों तक राज्यसुख का भोग करें। आपको तेजस्वी पुत्र प्राप्त होगा और वह भी राजा बनेगा। इस प्रकार आप यौवन में क्रीड़ासुख भोगकर वृद्धावस्था में आनन्द प्राप्त करेंगी"(दे•भा•पु• ५/११/६१-६७)।
भगवती का दो-टूक उत्तर

ताम्र की चिकनी-चुपड़ी बातों का टका-सा उत्तर देते हुए भगवती जगदम्बिका मेघ जैसी गम्भीर वाणी में उससे बोलीं : मैं न तो देवराज इन्द्र, विष्णु, शंकर, धनद कुबेर, वरुण, ब्रह्मा की और न ही अग्निदेव की कामना करती हूं। जब मैं इन देव गणों की कामना नहीं करती तो भला एक पशु का उसके किस गुण से प्रसन्न होकर वरण करूंगी और लोक में निन्दा का पात्र बनूंगी ? मैं किसी पति का वरण करने वाली नारी नहीं हूं। मेरे पति तो सर्वकर्ता, सर्वसाक्षी, कुछ भी न करने वाले, निःस्पृह और सदा रहने वाले प्रभु हैं। वे निर्गुण, मोहरहित, अनन्त, निरालम्ब, निराश्रय, सर्वज्ञ, सर्व-व्यापी, सबके साक्षी, पूर्ण, पूर्ण आशय वाले, सदा शिव, सबको आश्रय देने में समर्थ, शान्त, सब पर दृष्टि रखने वाले और सर्वभावन हैं। उन प्रभु को त्याग कर मैं मन्दमति महिष को अपना पति क्यों बनाना चाहूंगी ? (दे•भा•पु• ५/१२/४-८)।

ऐसा कहकर जब देवी ने अद्भुत गर्जन किया तो ताम्र भयभीत होकर वहां से पलायन कर महिष के पास जा पहुंचा। वस्तुतः भगवती दुर्गा पर किसी भी प्रकार के प्रलोभन का कोई प्रभाव न पड़ता देखकर अन्ततः महिषासुर ने युद्ध करने का निर्णय कर ही लिया। दानवराज द्वारा समय-समय पर भेजे गए योद्धाओं को भगवती दुर्गा ने अपने अदम्य पौरुष और शौर्य का परिचय देते हुए परलोक पहुंचा दिया।
महिषासुर का रणभूमि में आना

अब महिषासुर को स्वयं रणभूमि पर आने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं बचा था। वस्तुतः वह पहली और अन्तिम बार भगवती दुर्गा से सामना करने जा रहा था।
अपने मन्त्रियों की भांति महिषासुर ने भी समरभूमि में आकर भगवती दुर्गा को अनेक सांसारिक प्रलोभनों का वास्ता देते हुए कहा : अत्युत्तम संयोग तो संसार में सदा सुखद होता है। हे कान्ते ! समानवय वाले नारी-पुरुष का जो नित्य संयोग है वही उत्तम कहलाता है। अत्युत्तम सुख प्रदान के कारण ही उसे वैसा कहा जाता है। चातुर्य, रूप, वेष, कुल, शील और गुण इत्यादि की समानता रहने पर पारस्परिक सुख की अभिवृद्धि कही जाती है। यदि तुम मुझ वीर के साथ संयोग करोगी तो इसमें संशय नहीं कि तुम्हें अत्युत्तम सुख की प्राप्ति होगी। हे प्रिये ! मैं स्वेच्छा से नाना रूप धारण कर लेता हूं। मैंने इन्द्रादि सारे सुरों को संग्राम में जीत लिया है। मेरे भवन में जो भी अधुना दिव्य रत्न हैं उन सबका तुम उपभोग करो अथवा उनका यथेष्ट दान करो। अब तुम मेरी पट्टरानी बन जाओ। हे सुन्दरि ! मैं तुम्हारा दास हूं (दे•भा•पु• ५/१६/२०-२६)।
भगवती दुर्गा को भरमाते हुए अब महिषासुर आगे कहने लगा : हे विशालाक्षि ! मैं कामबाणों से सन्तप्त हो रहा हूं। अतः तुम मुझ पर दया करो। सुन्दरि ! जन्म से लेकर अब तक मैंने ब्रह्मा आदि समर्थ लोगों के सामने कभी दीनता नहीं दिखाई, किन्तु आज उसे तुम्हारे समक्ष प्रकट कर रहा हूं। ब्रह्मा आदि सुरगण मेरे चरित्र को जानते हैं। हे भामिनि ! वही मैं आज तुम्हारा दास हूं, मेरी ओर तो देखो (दे•भा•पु• ५/१६/३२-३४)।
देवी की लक्ष्यपूर्ण तात्त्विक बात

इस पर भगवती दुर्गा ने हंसकर उस दैत्य से यह तात्त्विक बात कही : मैं परमपुरुष के बिना अन्य किसी पुरुष को नहीं चाहती। हे दैत्य ! मैं उनकी इच्छाशक्ति हूं। मैं ही सकल जगत् का सृजन करती हूं। वे विश्वात्मा मुझे देख रहे हैं, मैं उनकी शिवा=कल्याणी प्रकृति हूं। निरन्तर उनके सान्निध्य में रहने के कारण ही मुझमें शाश्वत चैतन्य है। वैसे तो मैं जड़ हूं, किन्तु उन्हीं के संयोग से चेतनायुक्त हो जाती हूं जैसे चुम्बक के संयोग से लोहे में भी चेतना आ जाती है। मेरे मन में कभी भी ग्राम्यसुख की इच्छा नहीं होती। अतः हे मन्दात्मन् ! तुम बड़े मूर्ख हो जो कि स्त्रीसंग करना चाहते हो। नर को बांधने के लिए स्त्री शृंखला = ज़ंजीर कही गई है। लोहे से बंधा मनुष्य भी मुक्त हो जाता है, किन्तु स्त्री-बद्ध व्यक्ति कभी नहीं छूटता।•••अतः सुख के लिए मन में शान्ति धारण करो, शान्ति से ही तुम सुख प्राप्त कर सकोगे। नारीसंग से बहुत दु:ख मिलता है, यह जानते हुए भी तुम क्यों विमोहित हो रहे हो (दे•भा•पु• ५/१६/३५-३९,४१)।
इसके बाद भगवती दुर्गा अपने लक्ष्य की ओर ध्यान दिलाते हुए कहने लगीं : तुम सुरों के साथ वैरभाव त्याग दो और पृथ्वी पर यथेष्ट विचरो। यदि जीवित रहने की इच्छा हो तो पाताल चले जाओ अथवा मेरे साथ संग्राम करो। इस समय मैं बल-शालिनी हूं। हे दानव ! सभी सुरों ने मुझे तुम्हारा नाश करने के लिए भेजा है।•••हे वीर ! यदि मरने की इच्छा हो तो मेरे साथ यथासुख युद्ध करो। हे महाबाहो ! इसमें संशय कि मैं तुम्हें मार डालूंगी (दे•भा•पु• ५/१६/४२-४३,४५-४६)।
महिषासुर का रागानुराग

भगवती दुर्गा के उपरोक्त वचनों की ओर ध्यान न देकर महिषासुर अपना ही राग आलापते हुए फिर कहने लगा : हे कान्ते ! अब तुम यह आग्रह छोड़ दो और सुशोभन कार्य करो। विवाह हो जाने पर तुम्हें और मुझे दोनों को सुख प्राप्त होगा। विष्णु लक्ष्मी के साथ, ब्रह्मा सावित्री के साथ, शंकर पार्वती के साथ तथा इन्द्र शची के साथ रह कर ही सुशोभित होते हैं। पति के बिना कौन नारी शाश्वत सुख प्राप्त कर सकती है !! न जाने क्यों तुम मुझ-जैसे शुभ व्यक्ति को अपना पति नहीं बनाती हो !!! (दे•भा•पु• ५/१६/५७-६०)।
देवी दुर्गा पर अपनी लच्छेदार बातों का कोई प्रभाव न पड़ता देखकर अब महिषासुर अपनी असफलता के लिए कामदेव को दोषी ठहराते हुए कहने लगा : हे कान्ते ! न जाने वह मन्दधी काम देव कहां चला गया जो अपने सुकोमल और मादक पञ्चबाणों से तम्हें आहत नहीं कर रहा है। हे सुन्दरि ! मुझे तो लगता है कि कामदेव भी तुम्हारे प्रति दयावान् हो गया है कि तुम्हें अबला मानते हुए अपने बाण नहीं छोड़ रहा है। यह भी सम्भव है तिरछी चितवने कि उस कामदेव को मेरे साथ वैर हो, इसीलिए तुम पर कामबाण न छोड़ता हो। अथवा यह भी सम्भव है कि मेरे सुख का विध्वंस करने वाले मेरे अहितकारी देवों ने उसे मना कर दिया हो कि तुम्हारे ऊपर कामबाणों का प्रहार न करे। हे मृगशावकाक्षि ! मुझे परित्याग कर तुम मन्दोदरी की भांति पश्चात्ताप करोगी (दे•भा•पु ५/१६/६०-६४)।

भगवती दुर्गा को अपने प्रति आकर्षित करने का अन्तिम प्रयास करता हुआ महिषासुर सिंहलदेश के राजा चन्द्रसेन की पुत्री मन्दोदरी की संक्षिप्त कथा बताने लगा जिसने पहले-पहल तो आजीवन कुंवारी रहकर तप करने की बात कही थी, किन्तु अपनी छोटी बहन इन्दुमती के स्वयंवर के अवसर पर मद्रनरेश चारुदेष्ण जैसे धूर्त, शठ और चातुर्य-सम्पन्न व्यक्ति के प्रति कामातुर और मोहित होकर उससे विवाह करने की भूल करके बाद में उसे अन्य नारियों के प्रति विषयलोलुप जानकर पछताने लगी थी।
मन्दोदरी के पश्चात्ताप का उल्लेख करते हुए अब महिषासुर भगवती दुर्गा से अन्तिम बार कहने लगा : इसलिए हे कल्याणि ! उसी प्रकार तुम भी मुझ भूपति का अनादर करके फिर कामातुर होने पर किसी अन्य मन्दमति कापुरुष का आश्रय ले लोगी। अतः नारियों के लिए मेरे परम हितकारी और तथ्यपूर्ण वचन मान लो। इसमें संशय नहीं कि ऐसा न करके तुम बहुत शोक मनाओगी (दे•भा•पु• ५/२८/१९-२०)।
देवी द्वारा महिषासुर का वध

महिषासुर की वासनामयी चिकनी-चुपड़ी बातों की सर्वथा उपेक्षा करके अपने लक्ष्य के प्रति पूर्णतः कृतसंकल्प भगवती दुर्गा उसे निर्णायकभाव से कहने लगीं : हे मन्दात्मन् ! अब तुम पाताल भाग जाओ अथवा मेरे साथ युद्ध करो। मैं तम्हें सभी असुरों के साथ मारकर यहां से सुखपूर्वक चली जाऊंगी। जब-जब साधुजनों पर दुःख छा जाता है हे दानव ! तब-तब उनकी रक्षा हेतु मैं देह धारण करती हूं। यह तुम निश्चित समझ लो हे दैत्य कि अरूपा और अजन्मा होते हुए भी मैं सुरों के रक्षणार्थ रूप और जन्म धारण करती हूं। मैं सत्य कहती हूं कि सुरगणों ने तुम्हारे वध के लिए मुझसे प्रार्थना की थी। अब तुझे मारकर मैं सर्वथा निश्चल हो जाऊंगी। इसलिए अब तुम मेरे साथ युद्ध करो अथवा असुरों के निवासालय पाताल चले जाओ। मैं बिल्कुल सत्य कहती हूं कि अब मैं तुम्हें निश्चय ही मार डालूंगी (दे•भा•पु• ५/१८/२१-२५)।

देवी के दृढ़-निश्चय को भांप कर महिष दानव धनुष लेकर युद्ध की इच्छा से समरभूमि में डट गया। अब देवी और महिषासुर में परस्पर भयप्रद संग्राम होने लगा। पहले भगवती परमेश्वरी के तीक्ष्ण बाणों और त्रिशूल के प्रहार से दुर्धर, त्रिनेत्र और अन्धक इत्यादि दानव मार डाले गए।
इसके बाद की घटना के सन्दर्भ में व्यासदेव लिखते हैं :

पीत्वाद्य माधवीं मिष्टां शातयामि रणेअधम ।
देवानां दुःखदं पापं मुनीनां भयकारकम् ।।
इत्युक्त्वा चषकं हैमं गृहीत्वा सुरया युतम् ।
पपौ पुनः पुनः क्रोधाद्धन्तुकामा महासुरम् ।।
पीत्वा द्राक्षासवं मिष्टं शूलमादाय सत्वरा ।
दुद्राव दानवं देवी हर्षयन्देवतागणान् ।।
= देवीभागवतपुराण ५/१८/५३-५५
अरे अधम ! मैं अभी मिष्ट=मीठी माधवी पीकर देवों के लिए दुःखद और मुनियों के लिए भयकारक तुझ पापी को रण में काट डालूंगी। ऐसा कह कर भगवती उस महा-असुर को क्रोधपूर्वक मार डालने की कामना से सुरयायुत हेमचषक=द्राक्षासववाला स्वर्णपात्र हाथ में लेकर उसमें भरे पेय को बारम्बार पीने लगीं। उस मीठे द्राक्षासव को पीकर देवी बड़े वेग से अपना त्रिशूल उठाकर देवगणों को हर्षित करती हुई उस दानव पर झपटीं।

इसके बाद देवी जगदम्बिका ने सहस्र अरों और सुन्दर नाभिवाला उत्तम चक्र हाथ में लेकर रणभूमि में चला दिया जिससे दानव महिषासुर का सिर कट गया। उस समय उसके कण्ठनाल से रक्त बहने लगा और उस दैत्य का धड़ घूमता हुआ भूमि पर गिर पड़ा।•••उस महिषासुर के मारे जाने पर भूमण्डल पर जो भी देव, मुनिगण, मानव और साधुजन थे, वे परम आनन्दित हो गए। भगवती चण्डिका भी रण छोड़कर एक शुभ देश में जा विराजीं (देवीभागवतपुराण ५/१९/६४-६६,६९-७०)।

उपरोक्त सारे कथाप्रसंग के अवलोकन से यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि रज-तम गुणों वाले कतिपय अवांच्छित तत्त्वों द्वारा आए दिन भगवती दुर्गा तथा अन्य देवों पर जो मिथ्या और अनर्गल आरोप लगाए जा रहे हैं, उनमें कोई सच्चाई नहीं है। आज के सन्दर्भ में यह बड़ा आवश्यक जान पड़ता है कि मिथ्या आरोप लगाने वाले कार्यक्रमों के आयोजकों की पोल खोली जाए