अशोक सिंहल जी का चले जाना

  • 2015-11-28 04:00:45.0
  • डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

Ashok singhalविश्व हिन्दू परिषद के मार्गदर्शक अशोक सिंहल जी का 17 नहम्वर 2015 को दोपहर में दिल्ली के पास गुडग़ाँव में देहान्त हो गया। उनका जन्म 27 सितम्बर 1926 को हुआ था। कुछ दिन पहले ही देश भर में उनका जन्म दिन मनाया गया था। उन्होंने जीवन के 89 वर्ष पूरे कर लिये थे और 90 में प्रवेश किया था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के स्नातक अशोक जी प्रशिक्षण से धातु विज्ञानी थे। इलाहाबाद के सम्पन्न परिवार के अशोक जी ने कुछ वर्ष पहले करोड़ों की अपनी पैतृक सम्पत्ति दान कर एक न्यास बना दिया था। महर्षि वसिष्ठ के नाम से बनाये गये इस न्यास के नाम के आगे वसिष्ठ ऋषि की अर्धांगनि का नाम जोड़ कर इसका पूरा नाम अरुन्धति वसिष्ठ अनुसन्धान पीठ रखा। पीठ का मुख्य उद्देष्य दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन पर शोध कार्य करना है । जिस प्रकार महात्मा गान्धी मानते थे कि भारत का विकास हिन्द स्वराज के आधार पर ही हो सकता है, पश्चिमी अवधारणाओं पर किया गया विकास भारत को भारत ही नहीं रहने देगा, उसी प्रकार अशोक सिंहल जी मानते थे कि विकास की सही दिशा उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन ही हो सकता है। यही दर्शन भारतीय स्वभाव और प्रकृति के अनुकूल है । गान्धी का हिन्द स्वराज और उपाध्याय का मानव दर्शन मोटे तौर पर एक ही धरातल पर अवस्थित हैं।

अशोक जी की धातु प्राद्यौगिकी से लेकर एकात्म मानव दर्शन तक पहुँच पाने की यात्रा बहुत लम्बी है । 1926 में उनकी यह जीवन यात्रा आगरा से शुरु हुई थी। यह परिवार आगरा का ही रहने वाला है। वही आगरा जिसने इतिहास के न जाने कितने उतार चढ़ाव अपने जीवन काल में देखे। इसी आगरा से निकले अशोक सिंहल ने स्वयं भी भारतीय इतिहास पर अपना एक स्थायी पद चिन्ह छोड़ दिया। अशोक जी के निकटवर्ती विजय कुमार के अनुसार नौवीं कक्षा में पढ़ते हुये उन्होंने स्वामी दयानन्द की जीवनी पढ़ ली थी। ज़ाहिर है इस जीवनी ने बाद में अशोक जी को कभी चैन से नहीं बैठने दिया। लेकिन सभी जानते हैं कि शुरुआत चाहे आगरा से हो या किसी और स्थान से, भारत को अपने भीतर आत्मसात करने का रास्ता प्रयागराज से होता हुआ काशी जी में जाकर ही रुकता है। 1942 में अशोक जी भी प्रयागराज इलाहाबाद में ही अध्ययन कर रहे थे। इलाहाबाद उबल रहा था। आनन्द भवन कांग्रेस की गतिविधियों का केन्द्र था। महात्मा गान्धी ने अंग्रेज़ों को भारत छोडऩे का अल्टीमेटम दे दिया था। सत्याग्रह हो रहा था। उधर द्वितीय विश्व युद्ध की ज्वालाओं में यूरोप दग्ध  हो रहा था। बाबा साहिब आम्बेडकर कौंसिल के सदस्य होकर भारत में से अस्पृश्यता उन्मूलन के रास्ते तलाश रहे थे । गान्धी जी गिरफ़्तार हो चुके थे। देश में निराशा का वातावरण छाने लगा था। अशोक सिंहल जी की उम्र उस समय सोलह साल की थी। वे संगम तट पर खड़े होकर , यह कल कल छल छल बहती-क्या कहती गंगाधारा, को समझने का प्रयास कर रहे थे। वे जानते थे , यह गंगाधारा ही अनन्त काल से भारत की आवाज़ है । वहीं उनकी भेंट प्रो0 राजेन्द्र सिंह (जो बाद में रज्जु भैया के नाम से जाने गये) से हुई जिन्होंने गंगा की कल कल ध्वनियों की व्याख्या किशोर अशोक को समझाई। भारत माँ को विश्व गुरु के आसन पर स्थापित करने की ध्वनि। विदेशी दासता से मुक्त करवाने की गुहार। अशोक जी उसी उम्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गये थे। लेकिन संघ से सोलह वर्ष के उस किशोर के लिये जुडऩा उस समय भी इतना आसान नहीं था। प्रो0 राजेन्द्र सिंह को बाक़ायदा परिवार में बुलाया गया और उनसे संघ की प्रार्थना सुनी गई। नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे । प्रार्थना सुन कर अशोक जी के माता जी की संतुष्टि हुई। यही देश की मुक्ति का रास्ता है।  सिंहल जी ने शाखा जाना शुरु कर दिया। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। कभी घर की तरफ़ भी नहीं।

प्रयागराज से ही अशोक जी काशी गये। महामना मालवीय जी के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में धातु विज्ञान की पढ़ाई करने के लिये। यहीं उन्होंने मनुष्यों के भीतर भी ऐसी धातु निर्माण का मंत्र सीखा जिसके चलते कोई अपना सर्वस्व भारत माता के चरणों में अर्पित कर देता है। सबसे पहले उन्होंने यह ताक़त अपने भीतर ही पैदा की। गंगा के चौरासी घाटों पर गंगा को निहारते हुये, काशी विश्वनाथ मंदिर के घंटानाद को सुनते हुये, महामना की प्रयोगस्थली में घूमते हुये, उन्होंने अपने भीतर को फ़ौलादी बना लिया। बी.ई की पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर वे 1948 में जेल चले गये। पंडित नेहरु ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। जेल से छूटने के बाद ही उन्होंने अपनी बी.ई की पढ़ाई पूरी कर डिग्री हासिल की। लेकिन इसके साथ साथ उन्हेंने संघ की पढ़ाई भी पूरी कर ली थी। यही कारण है कि इंजीनियर बनने के बाद वे वापिस घर नहीं गये बल्कि संघ के प्रचारक बन गये।

लगभग आठ सौ साल की ग़ुलामी के कारण भारतीय इतिहास पुरुष के शरीर पर पड़ गये काले धब्बे अशोक जी की चिन्ता का कारण थे । यह चिन्ता तो देश में और अनेक चिन्तकों को भी है। लेकिन अशोक जी चिन्तन और यथार्थ के अन्तराल को कर्म से पाटने वाले वीरव्रती थे। यही कारण है कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से धातु विज्ञान में पढ़ाई करने के वाद भी सांसारिक झमेलों से किनारा करते हुये वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बन गये थे। अशोक जी की यही चिन्ता उन्हें बार बार अयोध्या की ओर खींच कर ले जाती थी। विदेशी आक्रमणकारियों ने अयोध्या में राम स्मृति मंदिर को ध्वस्त कर उसके स्थान पर बाबर की स्मृति में एक ढाँचा खड़ा कर दिया था। भारत के लोगों को आशा थी कि जिस प्रकार यूरोपीय विदेशी शासकों के भारत से चले जाने के बाद सरकार ने उन शासकों के बुत और अन्य चिन्ह सार्वजनिक स्थानों से हटा दिये थे, उसी प्रकार मंगोल , तुर्क, अफग़़ान व अरब शासकों के चिन्ह भी हटा दिये जायेंगे। सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण से उसकी शुरुआत भी की थी, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद वह कार्य वहीं स्थगित हो गया। सरदार पटेल के उसी कार्य को आगे बढ़ाने का प्रश्न था।  अयोध्या में बने बाबरी ढाँचे को लेकर अशोक जी की चिन्ता भी यही थी। बहुत से लोग अज्ञानतावश यह मानते हैं कि वे मुसलमानों के विरोधी थे, इसलिये बाबरी ढाँचा हटाना चाहते थे। लेकिन इस का लेशमात्र भी सत्य नहीं है। मुझे अशोक जी का सान्निध्य पिछले लगभग पन्द्रह बीस सालों से मिलता रहा है। दरअसल वे तो आश्चर्य व्यक्त किया करते थे कि भारत के मुसलमानों का बाबर से क्या सम्बंध है ? ये मुसलमान तो अपने ही बन्धु हैं जो विदेशी इस्लामी सत्ता के दिनों में किन्हीं कारणों से मतान्तरित हो गये। इनका बाबर से क्या लेना देना है। अशोक जी का कहना था कि इन लोगों को कुछ निहित स्वार्थी तत्व अपने राजनैतिक नफ़ा नुक़सान से भडक़ाते रहते हैं। बाबर मध्य एशिया से आया विदेशी आक्रमणकारी था। जिसने भारत के इस खंड को जीत ही नहीं लिया था बल्कि यहाँ के लोगों पर अमानुषिक अत्याचार किये थे । धीरे धीरे देश में बाबर के वंशजों का राज्य फैलता गया। मतान्तरण उसी कालखण्ड के अत्याचारों का परिणाम है । लेकिन उस कालखंड में भी भारत के लोग निरन्तर संघर्षशील रहे। आज जिन भारतीयों ने इस्लाम मज़हब को अँगीकार कर लिया है, उन्हीं के पूर्वज इन विदेशी इस्लामी आक्रमणकारियों के अत्याचारों का सर्वाधिक शिकार हुये थे।  भारत के मुसलमानों का न तो मध्य एशिया से और न ही बाबर से कोई ताल्लुक़ है, बल्कि इन के पूर्वज तो बाबर और उनके वंशजों के अत्याचारों का शिकार हुये। इसीलिये अयोध्या का प्रश्न राष्ट्रीय प्रश्न है , उसका मज़हब से कुछ लेना देना नहीं है। यह सभी भारतीयों के सम्मान का प्रश्न है, चाहे वे इस्लाम मज़हब को मानते हों, वैष्णव सम्प्रदाय के हों, या शैव मत के, जैन मताबलम्बी हों या बौद्ध पंथ के अनुरागी हों। सिक्ख पंथ के उपासक हों या नास्तिक ही क्यों न हों। क्योंकि राम सभी के यशस्वी पूर्वज थे। कभी अल्लामा इक़बाल ने सभी भारतीयों की तरफ़ से राम की महत्ता का जिक्र करते हुये लिखा था -

है राम के वुजूद पे हिन्दोस्तां को नाज़

अहले नजऱ समझते हैं उसको इमाम ए हिन्द

अशोक जी इसी राम के वुजूद की निशानियों को समेट रहे थे , जिनको नष्ट कर दिया गया था या करने के प्रयास हो रहे थे।