असमानता की ओर तेज कदम

  • 2015-12-17 05:30:31.0
  • बीरेंद्र सिंह रावत

चार दिसंबर को दिल्ली विधानसभा ने शिक्षा संबंधी तीन विधेयक पारित किए। इन विधेयकों का उद्देश्य दिल्ली विद्यालय शिक्षा अधिनियम, 1973 (अब से अधिनियम 1973 कहा जाएगा) तथा शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009 में संशोधन करना है। इन विधेयकों में से एक, विधेयक संख्या 10, दिल्ली विद्यालय शिक्षा अधिनियम, 1973 में संशोधन करने से संबंधित है। इस आलेख में हम विधेयक संख्या 10 संबंधी तथ्यों, संदर्भ तथा इसके संभावित असर का विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं।
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इस विधेयक के जरिए बयालीस साल पुराने अधिनियम 1973 के खंड दस के उप-खंड (1) में संशोधन किया जा रहा है। खंड दस के उप-खंड (1) का संशोधित रूप कहता है- ‘‘निजी मान्यता प्राप्त विद्यालय के कर्मचारियों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उसके सेवा के निबंधन और शर्तें वे होंगी जो विहित की जाएं।’’

अधिनियम 1973 के अनुसार, निजी विद्यालय के कर्मचारियों का वेतन तथा अन्य सभी लाभों सहित भत्ते, सरकारी विद्यालय के कर्मचारियों से कम नहीं होंगे। इतना ही नहीं, अधिनियम 1973 का यह खंड यह भी कहता है कि जिन निजी विद्यालयों के कर्मचारियों को सरकारी विद्यालयों के समकक्ष कर्मचारियों की तुलना में वेतन और अन्य लाभ कम मिल रहे हैं, सरकार उन विद्यालयों की प्रबंध समिति को लिखित रूप में यह कहेगी कि वे अपने कर्मचारियों को समान स्तर का वेतन और अन्य लाभ दें। यदि प्रबंधन सरकार के आदेश का पालन नहीं करता है तो उसके खिलाफ अधिनियम 1973 के खंड 4 के तहत कार्रवाई की जाएगी। इस अधिनियम का खंड 4 स्कूलों को मान्यता देने की शर्तों से संबंधित है। इस खंड में दी गई शर्तों में से एक शर्त यह है कि मान्यता चाहने वाले स्कूलों की वित्तीय क्षमता ऐसी होनी चाहिए कि वे अपने कर्मचारियों को सरकारी स्कूल के कर्मचारियों के बराबर का वेतन और अन्य लाभ दे सकें।

अधिनियम 1973 के खंड 10 (1) में अपने कर्मचारियों को सरकारी स्कूल के कर्मचारियों के बराबर का वेतन और अन्य लाभ न दे सकने वाले स्कूलों की मान्यता रद्द करने का प्रावधान है। लेकिन अधिनियम 1973 के खंड 10 (1) के संशोधित रूप में यह प्रावधान हटा लिया गया है। स्पष्ट है कि अब अपने कर्मचारियों को वेतन आदि का भुगतान न करने वाले स्कूलों के कर्मचारियों को राज्य से किसी प्रकार का संरक्षण नहीं मिलने वाला। इस संशोधन के जरिए कर्मचारियों को स्कूल-मालिकों के रहमो-करम पर छोड़ दिया गया है। इसका अर्थ है कि राज्य अपनी संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ कर निजी स्कूल-मालिकों के हक में कर्मचारियों के अधिकारों की बलि दे रहा है।

इस विधेयक में दिए गए ‘लक्ष्यों और कारणों का विवरण’ में कहा गया है, ‘‘वर्तमान में दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम-1973 में सिर्फ दो दंडात्मक प्रावधान उपलब्ध हैं जो कि विद्यालय की मान्यता रद्द करना तथा विद्यालय के प्रबंधन को सरकारी नियत्रंण में लेना है। ये दोनों अत्यधिक कठोर कदम हैं जो प्रभावी दंडात्मक कार्यवाही को बाधित करते हैं। इसलिए यह प्रस्ताव किया जाता है कि दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम 1973 में कुछ और दंडात्मक प्रावधान और सजा देने का प्रावधान शामिल किया जाए, ताकि इसे अधिक प्रभावकारी बनाया जा सके।’’ अधिनियम-1973 में पहले से मौजूद दंडात्मक प्रावधानों की तुलना में जो और ‘अधिक प्रभावकारी’ दंडात्मक प्रावधान जोड़े गए हैं उनमें शिक्षा निदेशक द्वारा लिखित चेतावनी देना तथा आर्थिक दंड लगाना शामिल है। इन प्रावधानों को अधिक प्रभावी बताया जा रहा है!

अधिनियम-1973 के खंड 10 के उप-खंड (1) में किए जा रहे बदलावों को ‘शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009 के अनुरूप’ बताया जा रहा है। शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009 को बनाने की प्रक्रिया से जुड़े लोगों और राजनीतिक दलों से अपेक्षा है कि वे दिल्ली सरकार के इस दावे की सच्चाई जनता को समझाएं।

अगर शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009 के खंड 23 के उप-खंड (3) के साथ अधिनियम-1973 के खंड 10 के उप-खंड (1) में किए जा रहे बदलावों का मिलान करें तो हमें पता चलेगा कि दिल्ली सरकार ने ‘शिक्षकों’ की जगह ‘कर्मचारी’ कर उसमें ‘मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों’ जोड़ दिया है। वास्तव में दिल्ली सरकार ने शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009 की मंशा को समझ कर फिलहाल उसे सिर्फ निजी स्कूलों के कर्मचारियों पर लागू करने के लिए यह संशोधन पारित किया है। लेकिन स्कूल के कर्मचारियों के पक्ष में उनके वेतन तथा अन्य भत्तों को लेकर जैसी स्पष्टता अधिनियम-1973 के खंड 10 के उप-खंड (1) में है वैसी न तो शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009 में है और न ही दिल्ली सरकार द्वारा पारित विधेयक संख्या 10 में है। किसी भी अन्य कानून की तरह इस संशोधन को समझने के लिए भी हमें इसे उन अन्य वृहद बदलावों व प्रक्रियाओं के परिप्रेक्ष्य में देखना होगा जिसके इर्दगिर्द इसे रचा जा रहा है। फिलवक्त हम राजनीतिक समझ की कम-से-कम तीन ऐसी कडिय़ां पहचान सकते हैं जो इस संशोधन में निहित हैं और इसे दिशा दे रही हैं। भले ही हम यहां इन कडिय़ों के उदाहरण मुख्यत: राज्य सरकार के संदर्भ में प्रस्तुत करें लेकिन हमारा मानना है कि ये कडिय़ां दिल्ली सरकार या उसके सत्तारूढ़ दल तक सीमित नहीं हैं और पिछले दो-ढाई दशक से राज्य के चरित्र को निरंतर निर्देशित कर रही हैं।

पहली कड़ी हमें शिक्षामंत्री व मुख्यमंत्री के उन अखबारी बयानों में मिलती है जिनमें उन्होंने यह स्पष्ट घोषणा की कि उनकी सरकार शिक्षा में निजीकरण के खिलाफ नहीं है। विधेयक पर कुछ निजी स्कूलों के प्रबंधकों के विरोध पर प्रतिक्रिया करते हुए शिक्षामंत्री ने आश्वस्त किया कि सरकार न सिर्फ निजीकरण के विरुद्ध नहीं है बल्कि उसे निजी स्कूलों से कोई शिकायत भी नहीं है। अपने इस बयान को विचित्रता प्रदान करते हुए शिक्षामंत्री ने आगे कहा कि सरकार लोगों को लूटने वाली शिक्षा और शिक्षा को व्यवसाय बनाने के खिलाफ है। इसी तर्ज पर स्वयं मुख्यमंत्री ने कहा कि शिक्षकों का वेतन कम करके वे निजी स्कूलों में वसूली जाने वाली फीस पर अंकुश लगाना चाहते हैं क्योंकि वे नहीं चाहते कि ये स्कूल बंद हों और इस मकसद से ही निजी स्कूलों में शिक्षकों को कुशल कामगारों के न्यूनतम दैनिक भत्ते के समान वेतन दिलाने का कानून लाया जा रहा है। एक तरफ यह दावा करना कि सरकार की मंशा सार्वजनिक शिक्षा को मजबूत करने की है और दूसरी तरफ निजी स्कूलों के प्रबंधन, मालिकों के पक्ष में कानून बनाना कथनी व करनी के बीच में एक कुटिल विरोधाभास दिखाता है।

संदर्भ की दूसरी कड़ी श्रम कानूनों में मजदूरों के हितों के विरुद्ध किए जा रहे बदलावों के रूप में देखी जा सकती है। तीसरी कड़ी उस आग्रह में प्रकट होती है जो उपर्युक्त दोनों कडिय़ों को दार्शनिक-मनोवैज्ञानिक आधार प्रदान करता है। यह व्यक्तिवाद का वह सिद्धांत है जिसके अनुसार सामाजिक परिघटना व राजनीतिक समस्या को निजी कमजोरी या खूबी के आधार पर परिभाषित करके विषमता तथा सत्ता के बुनियादी सवालों को दबा दिया जाता है। यदि निजी स्कूलों के शिक्षकों के वेतन को नियंत्रित करने वाला विधेयक लागू हो जाएगा तो इसके क्या असर होंगे यह एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण प्रश्न है।