आर्यसमाज के वेद प्रचार शिविर का श्रद्धापूर्ण वातावरण

  • 2016-03-23 06:30:43.0
  • मनमोहन सिंह आर्य

हरिद्वार में 20 मार्च, 2016 को कुम्भ के मेले में वेद प्रचार शिविर और पाखण्ड खंडिनी पताका का सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के यशस्वी प्रधान स्वामी आर्यवेश जी ने आर्यसमाज के अनेक विद्वान संन्यासियों मुख्यत: स्वामी चन्द्रवेश जी, स्वामी सोम्यानन्दजी सहित आर्य प्रतिनिधि सभा,  उत्तराखण्ड के यशस्वी प्रधान श्री गोविन्द सिंह भण्डारी, मन्त्री श्री दयाकृष्ण  काण्डपाल, जिला आर्य उपप्रतिनिधि सभा हरिद्वार व देहरादून के पदाधिकारियों एवं कार्यकत्र्ताओं, आर्यनेता इं. श्री प्रेमप्रकाश शर्मा, बहिन पूनम आर्या, बहिन प्रवेश आर्या, श्री कृष्णकान्त वैदिक, श्री वीरेन्द्र पंवार, श्री राजेन्द्र काम्बोज अधिवक्ता आदि अनेक गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में उद्घाटन व शुभारम्भ किया। इस अवसर पर चतुर्वेद पारायण यज्ञ स्वामी चन्द्रवेश सरस्वती जी के ब्रह्मतत्व में आरम्भ हुआ जिसके आज के मुख्य यजमान श्री गोविन्द सिंह भण्डारी एवं श्री दयाकृष्ण काण्डपाल थे। यज्ञ की पूर्णाहुति पर स्वामी आर्यवेश जी ने प्रेरणादायक व उत्साहवर्धक उद्बोधन सभी श्रद्धालुओं को दिया। यज्ञ के ब्रह्मा स्वामी चन्द्रवेश जी ने प्रेरक एवं सामयिक उपदेश सहित सभी यजमानों को आशीर्वाद दिया। यज्ञ के पश्चात महर्षि दयानन्द द्वारा सन् 1867 में हरिद्वार के कुम्भ में गाड़ी गई पाखण्ड खण्डिनी पताका की प्रतीक ओ3म् ध्वज पताका का आरोहण आर्यनेता स्वामी आर्यवेश एवं स्वामी चन्द्रवेश जी द्वारा किया गया जिसके बाद राष्ट्रीय प्रार्थना का उच्चारण किया गया। सभी उपस्थित आर्य बहिनों व बन्धुओं ने राष्ट्रीय प्रार्थना का श्रद्धापूर्वक समवेत पाठ किया। ध्वाजारोहण के पश्चात पण्डाल में भजन एवं उपदेश वा व्याख्यानों का आयोजन किया गया जिसे स्वामी आर्यवेश, स्वामी चन्द्रवेश, आर्यनेता श्री अनिल आर्य, दिल्ली, श्री गोविन्द सिंह भण्डारी, श्री हाकिमसिंह, श्री इ. प्रेमप्रकाश शर्मा, बहिन पूनम आर्या, डा. वीरेन्द्र पंवार आदि ने सम्बोधित किया। भजन व गीतों की प्रस्तुति पं. उम्मेदसिंह विशादर, कन्या द्रोणस्थली आर्ष गुरुकुल की 6 छात्राओं द्वारा तथा तेजस्विनी पंवार द्वारा की गई।

आर्यसमाज के वेद प्रचार शिविर का श्रद्धापूर्ण वातावरण

ध्वजारोहण के बाद व्याख्यानों की श्रृंखला आरम्भ हुई। सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान स्वामी आर्यवेश जी ने अपने सम्बोधन में कहा कि आज हमने हरिद्वार में कुम्भ मेले में वेद प्रचार शिविर का शुभारम्भ किया है। प्रात:काल वर्षा से कुछ देर के लिए आये व्यवधान की भी आपने चर्चा की। महर्षि दयानन्द द्वारा हरिद्वार में पाखण्ड खण्डिनी पताका लहराये जाने की भी चर्चा की। आपने अपने रोहतक भ्रमण की चर्चा की और कहा कि हमें हर कीमत पर समाज के विभिन्न वर्गों में भाईचारे को बनाये रखना है और इसे टूटने से बचाना है। उन्होंने वहां आर्यसमाज के सद्भाव रैली भी निकाली और लोगों की राय भी पता की। अधिकांश लोगों ने आर्यसमाज के द्वारा समाज के विभिन्न वर्गों में शान्ति स्थापना के प्रयासों की सराहना की गई। उन्होंने कहा कि हमारे संविधान निर्माताओं ने समाज के शैक्षिक, आर्थिक व सामाजिक पिछड़े हुए लोगों के लिए निश्चित अवधि के लिए आरक्षण का प्रावधान किया था। बाद में यह राजनैतिक मुद्दा बन गया। उन्होंने इस समस्या का समाधान बताते हुए कहा कि हमें इसके स्थाई समाधान के लिए महर्षि दयानन्द की शिक्षा नीति को लागू करना होगा। राजनियम और जाति नियम यह होना चाहिये कि देश का प्रत्येक बच्चा अनिवार्य रुप से विद्यालय में जाये। जो माता-पिता न भेजे वह दण्डित होने चाहिये। उन्होंने कहा कि स्वामी दयानन्द जी ने कहा है कि जो माता-पिता अपने बच्चों को पढ़ाते नहीं है वह उनके बैरी अर्थात् अपराधी होते हैं। अमीर व निर्धन, अर्थात् राजकुमार, राजकुमारी व निर्धन सभी बच्चों को एक समान पूर्णतया नि:शुल्क शिक्षा दी जानी चाहिये। इतना ही नहीं उन्हें एक समान वस्त्र, भोजन व आसन व प्रतिष्ठा अर्थात् निवास का सबको एक समान स्थान आदि सुविधायें भी दी जानी चाहिये। किसी प्रकार का किसी से किंचित भेदभाव न हो। यह महर्षि दयानन्द की शिक्षा नीति के मुख्य सिद्धान्त हैं। इसका पालन व व्यवहार असम्भव नहीं अपितु सम्भव है। ऐसा होने पर जो नई पीढ़ी बनेगी वह जातिवाद के दोष से सर्वथा दूर व पृथक होगी।

उन्होंने आगे कहा कि बच्चों को उनकी योग्यतानुसार कार्य, व्यवसाय व नौकरी मिलनी चाहिये। स्वामी आर्यवेश जी ने कहा कि वर्णव्यवस्था का सार भी यही है कि सबको शिक्षा प्राप्ति में एक समान सुविधायें मिले और अध्ययन के पूरा होने पर उनके गुण कर्म व स्वभाव के अनुसार उनको मान-प्रतिष्ठा व व्यवसाय करने का अवसर प्राप्त हो।

स्वामी आर्यवेश जी ने बाल्मिकी रामायण का उल्लेखकर कहा कि जब राजा दशरश ने अपने चार पुत्रों  राम, लक्ष्म्ण, भरत व शत्रुघ्न को गुरुकुल में न भेजकर उनकी शिक्षा की व्यवस्था महर्षि वसिष्ठ जी के अन्तर्गत राजधानी अयोध्या में करने का प्रयास किया तो वहां ऋषि विश्वामित्र जी ने पहुंच कर उनको फटकारा और उनके पुत्रों को शिक्षा हेतु अपने साथ वनों में ले गये। वन में एक स्थान पर रामचन्द्र जी द्वारा हडिड़यों के ढेर देखने की चर्चा कर स्वामीजी ने कहा कि महर्षि विश्वामित्र ने उन्हें बताया था कि यह उन धर्मपारायण ऋषियों की अस्थियां थी जिन्हें राक्षस अकारण मृत्यु का ग्रास बनाकर उनकी हत्या कर देते थे। तब विश्वामित्र जी के विद्यार्थी राम ने संकल्प किया था कि मैं कालान्तर में इस धरती को राक्षसों से विहीन कर दूंगा। स्वामी जी ने जर्मन के म्यूनिख के अपने मित्रों की चर्चा की और बताया कि वहां सबके लिए शिक्षा समान, मत-मजहब आदि भेदभावरहित, अनिवार्य व निशुल्क है जो महर्षि दयानन्द के विचारों व सिद्धान्तों के अनुरुप है। स्वामी जी ने कहा कि महर्षि दयानन्द के यह विचार व्यवहारिक हैं और भारत में भी लागू किये जा सकते हैं। जर्मन की शिक्षा की यह बात आपने मुख्य रूप से इंगित की कि वहां विद्यार्थियों से फीस या शुल्क नहीं लिया जाता। वहां सब कुछ नि:शुल्क है। स्वामी आर्यवेश जी ने कहा कि भारत में मिड-डे मिल व नवोदय विद्यालय की शिक्षा का आधार महर्षि दयानन्द व जर्मनी की शिक्षा प्रणाली को आंशिक रुप से अपनाया जाना है। स्वामी आर्यवेश जी ने आगे कहा कि जिस दिन संसार में शिक्षा से सभी प्रकार के भेदभाव मिटा दिये जायेंगे उस दिन भारत में हरियाणा के जाट आन्दोलन जैसे जातीय आरक्षण के आन्दोलन नहीं होंगे और न वह तकलीफ लोगों को होगी जो हरयाणा में इस आन्दोलन से हुई है। उन्होंने कहा कि जब सबके बच्चे एक साथ पढ़ेंगे तो कोई यह शिकायत नहीं करेगा कि हमारे साथ अन्याय हो रहा है। उन्होंने कहा कि हरयाणा में हमारे विचारों का व्यापक रूप से स्वागत हुआ है। इस अवसर स्वामी जी ने अनेक सूचनायें दी और पाखण्ड खण्डन व वेदप्रचार के कार्यों को प्रभावशाली रूप से करने का आह्वान किया। स्वामीजी ने इस अवसर पर उत्तराखण्ड के एक बन्धु महात्मा ज्ञानभिक्षु वानप्रस्थी द्वारा स्वामी विद्यानन्द सरस्वती की लघु पुस्तिका ‘आर्यो का आदि देश’ की 1 हजार पुस्तकों को अपने धन से प्रकाशित कर नि:शुल्क वितरण की जानकारी दी।

उन्हीं के कर कमलों से इस पुस्तक का विमोचन हुआ। इस अवसर पर उन्होंने कांग्रेसी नेता श्री खडगे के लोकसभा में उस ब्यान की आलोचना भी की और उसे तथ्यों के विपरीत, अज्ञानतापूर्ण, निराधार व स्वार्थ से प्रेरित बताया जिसमें उन्होंने कहा कि आर्य विदेशी हमलावर हैं, आर्य बाहर से आये और वो, श्री खडगे, भारत के मूल निवासी हैं। स्वामी जी ने बताया कि सार्वदेशिक सभा के नेतृत्व में दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर किये गये विशाल व प्रभावशाली प्रदर्शन किया गया था। उन्होंने बताया कि श्री खडगे के इस निन्दनीय बयान के लिए जन्तर मन्तर पर प्रदर्शन के दौरान उनका पुतला भी फंूका गया।
-मनमोहन कुमार आर्य