आध्यात्मिक सत्पुरुष गुरु समर्थ रामदास

  • 2016-03-02 09:30:51.0
  • अशोक “प्रवृद्ध”

मुखमण्डलपर दाढ़ी, मस्तकपर जटाएँ,भालप्रदेश पर चन्दन का टीका,कंधेपर भिक्षा के लिए झोली तथा एक हाथ में जपमाला व कमण्डलु और दूसरे हाथ में योगदण्ड (कुबड़ी) लिए व पैरोंमें लकड़ी कीपादुकाएँ धारण किये भक्ति, ज्ञान व वैराग्य से ओत-प्रोत व्यक्तित्व के स्वामी समर्थ रामदास भारत के ऐसे सन्त हैं, जिनकी महाराष्ट्र तथा सम्पूर्ण दक्षिण भारत में प्रत्यक्ष हनुमान जी के अवतार के रूप में पूजा की जातीहै ।भारत के साधु-सन्तों व विद्वत समाज में लोकख्यात आध्यात्मिक सत्पुरुष गुरु समर्थ स्वामीरामदास के जन्मस्थल जाम्बगाँव में तो उनकी मूर्ति मन्दिर में स्थापित की गयी है। कहा जाता है कि समर्थ रामदास के मूर्ति स्थापना के समय अनेक विद्वानों ने कहा कि मनुष्यों की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा देवताओं के समान नहीं की जा सकती,परन्तु समर्थ रामदास के हनुमान जी के अवतार वाली जन मान्यता के सम्मुख उन्हें झुकना पड़ा।योगशास्त्र के अनुसार उनकी भूचरी मुद्रा थी। मुखमें सदैव रामनाम का जाप चलता था और बहुत कम बोलते थे। समकालीन ग्रंथों में उल्लेखित प्रसंगों के अनुसार वे संगीत के उत्तम जानकार थे। उन्होनें अनेकोंरागों में गायी जानेवाली रचनाएँ की हैं। वे प्रतिदिन बारह सौ सूर्यनमस्कार लगाते थे। इस कारण शरीर अत्यंत बलवान था। जीवन के अंतिम कुछ वर्ष छोडक़र पूरे जीवन में वे कभी एक जगह पर नहीं रुके। उनका वास्तव्य दुर्गम गुफाएँपर्वत शिखर, नदी के किनारें तथा घने अरण्यमें रहता था। बचपन से ही किसी बात को एक बार सुनकर याद कर लेने की अद्भुत शक्ति उनमें विद्यमान थी।रामदास स्वामी ने अपने जीवन काल में बहुत से ग्रंथ लिखे। इनमें दासबोधप्रमुख है। उन्होंने मानव मन को भी 'मनाचे श्लोक' के द्वारासंस्कारित करने का कार्य किया ।इनके इस ग्रन्थ मं् मात्र छ:श्लोकों में ही मन को वश मे रखने के लिये अनेक शिक्षाप्रद उदहारण दिये गये है । महाराष्ट्र के प्रसिद्ध सन्त और हिन्दू पद पादशाही के संस्थापक छत्रपति शिवाजी के गुरु एवं मराठी ग्रन्थ दासबोध के रचयिता गुरु समर्थ रामदास (1608-1682) का जन्म महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले के जाम्ब नामक स्थान पर चैत्र शुक्ल नवमी अर्थात रामनवमी को विक्रम सम्वत् 1665 तदनुसार शालिवाहन शके 1530 (1608 ई0) को दोपहर में जमदग्नी गोत्र के देशस्थ ऋग्वेदी ब्राह्मण परिवार में हुआ था ।समर्थ रामदास का मूल नाम नारायण सूर्य (सूर्या) जीपंत कुलकर्णी (ठोसर) था। बाल्यकाल में उन्हें नारायण कहकर पुकारा जाता था ।श्री राम के जन्म दिन श्रीरामनवमी के दिन इनका जन्म होने के कारण इनका नाम रामदास रखा गया।एक अन्य कथा के अनुसार, बचपन में ही उन्हें साक्षात प्रभु श्रीराम के दर्शन हुए थे। इसलिए वे अपने आपको रामदास कहलाते थे। समर्थ रामदास के पिता का नाम सूर्यजी पन्त तथा उनकी माता का नाम राणुबाई था।सूर्याजी पन्त सूर्यदेव के उपासक थे और प्रतिदिन 'आदित्यह्रदय' स्तोत्र का पाठ करते थे। वे गाँव के पटवारी थे लेकिन उनका अधिकांश समय सूर्योपासना में ही व्यतीत होता था। माता राणुबाई संत एकनाथ जी के परिवार की दूर की रिश्तेदार थी। वे भी सूर्य नारायण की उपासिका थीं। सूर्यदेव की कृपा से सूर्याजी पन्त को दो पुत्र गंगाधर स्वामी और नारायण (समर्थ रामदास) प्राप्त हुए। समर्थ रामदास के बड़े भाई का नाम गंगाधर को सब 'श्रेष्ठ' कहते थे। वे आध्यात्मिक सत्पुरुष थे। उन्होंने सुगमोपायनामक ग्रन्थ की रचना की है। मामा भानजी गोसावी प्रसिद्ध कीर्तनकार थे।

[caption id="attachment_25912" align="alignright" width="308"]गुरु समर्थ रामदास गुरु समर्थ रामदास[/caption]

बाल्यकाल में ही एक दिन माता राणुबाई ने नारायण से कहा, तुम दिनभर शरारत करते रहते हो, कुछ काम-धाम किया करो। नहीं देखते, तुम्हारे बड़े भाई गंगाधर अपने परिवार की कितनी चिंता किया करते हैं ? माँ की यह बात नारायण के मन में घर कर गई और दो-तीन दिन बाद नारायण अपनी शरारत छोडक़र एक कमरे में ध्यानमग्न बैठ गये । दिनभर नारायण के कहीं नहीं दिखलाई देने पर माता ने बड़े पुत्र गंगाधर से पूछा कि तुम्हारा अनुज नारायण कहाँ है? गंगाधर के नारायण को नहीं देखने की बात कहने पर दोनों को इस बात की चिंता हुई और वे उन्हें ढूँढने निकल पड़े,  परन्तुउनका कहीं कोई पता नहीं चला। शाम होने पर माता राणुबाई ने घर के एक कमरे में नारायण को ध्यानस्थ देखा तो उनसे पूछा, नारायण, तुम यहाँ क्या कर रहे हो?तब नारायण ने प्रत्युत्तर दिया, मैं सम्पूर्ण  विश्व की चिंता कर रहा हूँ।कहा जाता है कि इस घटना के पश्चात नारायण की दिनचर्या ही बदल गई। सात वर्ष की अवस्था में उन्होंने हनुमान जी को अपना गुरु मान लिया। इसके बाद तो उनका अधिकांश समय हनुमानमन्दिर में पूजा में बीतने लगा।कहा जाता है कि, एक बार उन्होंने निश्चय किया कि जब तक मुझे हनुमान जी दर्शन नहीं देंगे, तब तक मैं अन्न जल ग्रहण नहीं करूँगा। यह संकल्प देखकर हनुमान जी प्रकट हुए और उन्हें श्रीराम के दर्शन भी कराये। रामचन्द्र जी ने उनका नाम नारायण से बदलकर रामदास कर दिया। समर्थ रामदास ने समाज के युवा वर्ग को यह समझाया कि स्वस्थ एवं सुगठित शरीर के द्वारा ही राष्ट्र की उन्नति संभव है। इसलिए युवाओं को व्यायाम एवं कसरत करने की नितांत आवश्यकता है। इसके साथ ही उन्होंने शक्ति के उपासक हनुमानजी की मूर्ति की स्थापना की।

समस्त भारत का उन्होंने पद-भ्रमण किया। जगह-जगह पर हनुमान की मूर्ति स्थापित की, स्थान-स्थान पर मठ एवं मठाधीश बनाए ताकि सम्पूर्ण राष्ट्र में नव-चेतना का निर्माण हो।उनके जीवन की विचित्र बात यह भी है कि बारह वर्ष की अवस्था में अपने विवाह के समय शुभमंगल सावधान में ‘शुभम लग्नम सावधानं भव’ सावधान शब्द सुनकर वे विवाहमंडप से निकल लापता हो गए ।गृहत्याग करने के बाद बारह वर्ष के नारायण नासिक के पास नंदिनी और गोदावरी नदियों के संगम स्थल पर बसे टाकली नामकगाँवकी भूमि को अपनी तपोभूमि बनाने का निश्चय करके वहाँ उन्होंने कठोर तप शुरू कर दिया।वे प्रात: ब्रह्ममुहूर्त में उठकर प्रतिदिन बारह सौ सूर्यनमस्कार लगाते, तत्पश्चात गोदावरी नदी में खड़े होकर राम नाम और गायत्री मंत्र का जाप किया करते थे। मध्याह्न काल अर्थात दोपहर में सिर्फ पाँच घर की भिक्षा माँग कर वह प्रभु श्रीराम को भोगलगाते थे।उसके बाद प्रसाद का भाग प्राणियों और पंछियों को खिलाने के बाद स्वयं ग्रहण किया करते थे।दोपहर में वे वेद, वेदांत, उपनिषद्, शास्त्र ग्रन्थोंका अध्ययन करते थे। उसके बाद फिर नामजप करते थे।

कहा जाता है कि उन्होंने तेरह करोड़ राम नाम जप बारह वर्षों में पूरा किया ।ऐसा कठोर तप बारह वर्षों तक करते हुए उन्होंने स्वयं एक रामायण लिखा।यही पर उन्होंने प्रभु श्रीरामचन्द्र की प्रार्थनायें रची हैं ,जोआज करुणाष्टकनाम से प्रसिद्ध है।तप करने के बाद उन्हें आत्म साक्षात्कार हुआ, तब उनकी आयु मात्र चौबीस वर्षों की थी। टाकली में ही समर्थ रामदास ने प्रथम हनुमान का मंदिर स्थापन किया । यहीं उनका नाम रामदास पड़ा।वे सदैव जय जय रघुवीर समर्थ कहा करते अर्थात नारा लगाया करते थे। इसलिये लोग उन्हें समर्थ गुरु रामदास कहने लगे।
-अशोक प्रवृद्ध