धीमे जहर से कब मुक्ति मिलेगी देशवासियों को

  • 2016-11-26 09:30:04.0
  • पीयूष द्विवेदी
धीमे जहर से कब मुक्ति मिलेगी देशवासियों को

यह सर्वमान्य तथ्य है कि जिस राष्ट्र के लोग जितना अधिक स्वस्थ और सुदृढ़ रहेंगे, वह उतनी ही तीव्रता से प्रगति करेगा। लोगों के स्वस्थ रहने के लिए मुख्य रूप से तीन चीजें आवश्यक होती हैं। पौष्टिक और पर्याप्त आहार, समुचित चिकित्सा व्यवस्था और नुकसानदेह चीजों से दूरी। इनमें से पहली दो चीजों की समुचित व्यवस्था करने का दायित्व मुख्यत: सरकार का होता है, पर तीसरी के लिए सरकार के साथ-साथ देश के नागरिकों को भी सजग और सचेत रहने की जरूरत होती है। नागरिकों के लिए जरूरी है कि वे ऐसे अपशिष्ट तत्त्वों के सेवन से बचें, जिनका उनके शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो। ऐसे ही तत्त्वों में से एक है तंबाकू।

तंबाकू एक मादक और उत्तेजक पदार्थ है। दुनिया में सर्वाधिक तंबाकू उत्पादन अमेरिका और चीन के बाद भारत में होता है। इस उत्पादन के एक बड़े हिस्से की खपत नशाखोरी के कारण देश में ही हो जाती है और निर्यात के लिए काफी कम तंबाकू बचता है। कोई गुटखे, खैनी आदि के रूप में तंबाकू चबाता है, तो कोई इसे बीड़ी-सिगरेट के रूप में लेता है। हर नशे की तरह तंबाकू का भी व्यक्ति के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। तंबाकू देश के लोगों के स्वास्थ्य को किस कदर प्रभावित कर रहा है, इसकी झलक स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा हाल में जारी एक रिपोर्ट मिल जाती है। स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा डब्ल्यूएचओ, पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया, हीलिस सेक्षारिया इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ, सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल ऐंड प्रीवेंशन और अमेरिका के नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट के साथ मिल कर देश में तंबाकू चबाने के प्रभाव पर समग्र रिपोर्ट जारी की है।

रिपोर्ट कहती है कि मुंह और गले के कैंसर को भारत में एक अहम स्वास्थ्य समस्या करार देते हुए हर साल पुरुषों में करीब पचासी हजार और महिलाओं में चौंतीस हजार नए मामले सामने आते हैं, जिनमें नब्बे फीसद मामलों में किसी न किसी रूप में तंबाकू का इस्तेमाल होता है और आधे से अधिक मामलों की वजह तंबाकू चबाना है। इसी रिपोर्ट में एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आई है कि देश में पंद्रह साल और उससे अधिक उम्र की करीब सात करोड़ महिलाएं तंबाकू चबाती हैं और उसकी एक अहम वजह मेहनत वाले काम के दौरान भूख को दबाने की इच्छा है। यह स्थिति हमें सोचने पर विवश करती है।

एक अन्य आंकड़े के मुताबिक देश में हर साल लगभग दस लाख मौतें तंबाकूजनित बीमारियों के कारण होती हैं और 6.1 प्रतिशत लोग तंबाकू सेवन के कारण तमाम तरह की बीमारियों से ग्रस्त अस्वस्थ जीवन जीने को मजबूर होते हैं। पर बावजूद इसके अगर भारत में तंबाकू उत्पादन पूरी तरह से वैध है, तो इसलिए कि इसके व्यापार से भारत सरकार को भारी राजस्व मिलता है। इसी वजह से जहां एक तरफ तंबाकू की खेती को वैध घोषित किया गया है, वहीं दूसरी तरफ तंबाकू नशा उन्मूलन के लिए तमाम कार्यक्रम और कानून बनाए गए हैं। इसी संबंध में 2008 में सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान वर्जित करने संबंधी कानून बनाया गया, पर इसका कोई बहुत असर हुआ हो, ऐसा नहींं कह सकते। इसके अलावा विश्व स्वास्थ्य संगठन, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा 2001 में तंबाकू नशा उन्मूलन केंद्र की स्थापना भी की गई, जिसका उद्देश्य लोगों को तंबाकू छोडऩे के लिए प्रेरित करना और इसे छोडऩे के उपाय बताना था। धीरे-धीरे ऐसे और भी कई केंद्र खोले गए। अब तो टीवी आदि माध्यमों पर तंबाकू के विषय में वैधानिक चेतावनी अनिवार्य कर दी गई है। तंबाकू नशा उन्मूलन के लिए इन कार्यक्रमों और कानूनों आदि के कारण आज भारत में तंबाकू सेवन करने वालों की संख्या में काफी कमी आई है, पर बावजूद इसके अब भी एक बड़ी आबादी तंबाकू के नशे की चपेट में है।

एक आंकड़े के मुताबिक देश में पंद्रह साल से ऊपर की आयु के लगभग पैंतीस प्रतिशत लोग किसी न किसी रूप में तंबाकू का सेवन करते हैं। इनमें से इक्कीस प्रतिशत लोग गुटखा आदि के रूप में और बाकी लोग बीड़ी-सिगरेट आदि में तंबाकू का सेवन करते हैं। हालांकि बीड़ी-सिगरेट का सेवन करने वालों की संख्या में पहले की तुलना में गिरावट आई है, पर अब भी लगभग छब्बीस प्रतिशत लोग इनका नशा करते हैं, जिनमें तीन प्रतिशत महिलाएं भी हैं। शहरी क्षेत्रों की अपेक्षा तंबाकू का अधिक सेवन ग्रामीण क्षेत्रों में किया जाता है। वहां सत्तावन प्रतिशत पुरुष और उन्नीस प्रतिशत महिलाएं तंबाकू का नशा करती हैं। शहरी लोगों की अपेक्षा ग्रामीण लोगों के तंबाकू का अधिक सेवन करने के लिए मुख्य कारण इसका सहजता से उपलब्ध होना है। अब चूंकि, शहरी क्षेत्रों में नशे के लिए लोगों को शराब समेत कई तरह की ड्रग्स आदि बड़ी आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं, इसलिए वे तंबाकू को अधिक तवज्जो नहीं देते हैं। जबकि ग्रामीण इलाकों में तंबाकू एकमात्र ऐसा नशीला पदार्थ है, जो आसानी से और सस्ते में मिल जाता है। ग्रामीण इलाकों के बड़े बाजारों से लेकर पंसारी की दुकान तक हर जगह तंबाकू मौजूद होता है। तंबाकू की सहज उपलब्धता के कारण ही ग्रामीण लोगों में तंबाकू का नशा शहरी लोगों की अपेक्षा अधिक पाया जाता है। पर इन सबके ठीक उलट भारत सरकार के तंबाकू नशा उन्मूलन संबंधी कार्यक्रम ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा अधिकाधिक रूप से शहरों में चलाए जाते हैं।

साफ है कि सरकार द्वारा इस समस्या का ठीक से अध्ययन किए बिना ही समाधान बनाया और लागू किया गया है, जिससे आज स्थिति यह हो गई है कि रोग कहीं और है और निदान कहीं और हो रहा है। ऐसे में सवाल है कि क्या ग्रामीण क्षेत्रों पर सरकार के इस अनदेखेपन के होते हुए इस देश का पूरी तरह तंबाकू के नशे से मुक्त हो पाना संभव है? एक तरफ तंबाकू उद्योग से जहां देश को राजस्व की भारी आमद होती है, वहीं इससे बड़ी तादाद में लोगों को रोजगार भी मिला है। सरकार तंबाकू उद्योग के जरिए राजस्व की कितनी उम्मीद पाले है, इसको इसी से समझा जा सकता है कि अधिकाधिक बार बजट में तंबाकू की कीमतों में वृद्धि की जाती है। सरकार को पता है कि यह कितना भी महंगा हो जाए, जिन्हें इसकी लत है वे इसका सेवन करेंगे ही। हालांकि इसका सकारात्मक पक्ष यह है कि बहुत लोग जो इसके कम लती होते हैं, महंगे होने के कारण इसका सेवन छोड़ भी देते हैं। लेकिन, क्या इस तरह पूरी तरह तंबाकू नशा उन्मूलन संभव होगा, यह बड़ा सवाल है।
वैसे, तंबाकू से मुक्ति के लिए जल्दबाजी और उत्तेजना में इसकी खेती पर प्रतिबंध लगाने की बात करना भी किसी लिहाज से उचित नहीं है। सरकार को इस बात पर एक बार फिर अवश्य अध्ययन करना चाहिए कि तंबाकू की खेती से होने वाले राजस्व लाभ और उसके नशे के रोकथाम पर होने वाले खर्च के बीच कितना अंतर है। इसके बाद जो तथ्य सामने आएं उनके आधार पर यह तय होना चाहिए कि तंबाकू की खेती कितनी लाभकारी है और कितनी नुकसानदेह और इस पर प्रतिबंध लगना चाहिए या नहींं। इसके अलावा सरकार को चाहिए कि वह अपने तंबाकू नशा मुक्ति कार्यक्रमों का गांवों तक विस्तार करे, जिससे ग्रामीण लोगों को भी तंबाकू से मुक्त होने में सहायता मिले। अगर सरकार द्वारा इन सब चीजों पर सही ढंग से अमल किया जाए तो इसमें दो राय नहीं कि आने वाले समय में हम काफी हद तक तंबाकू के नशे से मुक्त राष्ट्र होंगे।

पीयूष द्विवेदी ( 12 )

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