भूख के साए में कैसे जी रहा है बचपन

  • 2016-10-24 12:30:12.0
  • सुभाष गताड़े
भूख के साए में कैसे जी रहा है बचपन

अभी चंद रोज पहले (सोलह अक्तूबर) को वल्र्ड फूड डे अर्थात 'विश्व खाद्य दिवस' मनाया गया, जिसके जरिए मानवता ने भूख के खिलाफ संघर्ष के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई। एक क्षेपक के तौर पर बता दें कि संयुक्त राष्ट्र के तत्त्वावधान में बने खाद्य एवं कृषि संगठन की 1945 में इसी दिन स्थापना हुई थी। यह अलग बात है कि पहली दफा यह दिवस 1979 में मनाया गया। इसे महज संयोग कहा जा सकता है कि चंद रोज पहले ही ग्लोबल हंगर इंडेक्स अर्थात वैश्विक भूख सूचकांक के आंकड़े जारी हुए, जिन्होंने इस सच्चाई की तरफ नए सिरे से इशारा किया कि दुनिया में भूख की समस्या कितनी विकराल है, किस तरह हर साल पचास लाख बच्चे कुपोषण से काल-कवलित होते हैं, किस तरह गरीब मुल्कों के दस में से चार बच्चे उसी के चलते कमजोर शरीरों और दिमागों के साथ बड़े होते हैं। ध्यान रहे, भूख सूचकांक कुछ पैमानों को मद््देनजर रख कर तय किया जाता है। आबादी में कुपोषितों का प्रतिशत, पांच साल से कम उम्र के बच्चों में अल्पविकसित तथा कमजोर बच्चे और उसी आयु वर्ग में शिशु मृत्यु दर आदि।


विश्व भूख सूचकांक में, जिसमें 118 देशों की रैंकिंग की गई, भारत 97वें नंबर पर है। श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल और चीन जैसे पड़ोसी देशों की स्थितियां भारत से अधिक अच्छी हैं। भारत पर ज्यादा मुग्ध रहने वालों को थोड़ा सुकून इस बात से मिल सकता है कि भारत से अधिक खराब रैंकिंग पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सब सहारन अफ्रीका के मुल्कों तथा उत्तरी कोरिया की है। फिलवक्त भारत की इस स्थिति में कोई खास बदलाव मुमकिन नहीं दिखता क्योंकि भारत का कृषि विकास और अनाज उत्पादन ढलान पर है। भारत भले अब कृषि अर्थव्यवस्था न हो, मगर ग्रामीण भारत का खासा हिस्सा मुख्यत: कृषि पर आश्रित है और गरीबी रेखा के नीचे जी रहा है। विडंबना यह है कि सरकार इस मसले पर या तो गाफिल है या उसे जिस हद तक सक्रिय दिखना चाहिए, नहीं है। वैश्विक भूख सूचकांक जारी होने के कुछ रोज पहले सर्वोच्च अदालत द्वारा केंद्र सरकार को दी गई चेतावनी इसी की बानगी कही जा सकती है, जिसमें अदालत ने सरकार से साफ कहा कि वह बीते साल की गलती न दोहराए तथा समय रहते अकाल की घोषणा कर दे और उसके अनुरूप कदम उठाए। उसने केंद्र सरकार को साफ चेताया कि वह 'आग लगने पर कुआं खोदने जैसा उद्यम न करे।'

गौरतलब है कि अदालत 'स्वराज अभियान' द्वारा वकील प्रशांत भूषण के माध्यम से डाली गई याचिका पर अपनी प्रतिक्रिया दे रही थी। प्रस्तुत याचिका में भारतीय मौसम विभाग के हवाले से जारी उन आंकड़ों की तरफ इशारा किया गया था जिनमें यह स्पष्ट किया गया है कि देश के कई जिलों में पर्याप्त बारिश नहीं हुई है। इन आंकड़ों के मुताबिक बिहार के बारह, उत्तर प्रदेश के बत्तीस, पंजाब के ग्यारह और गुजरात के ग्यारह जिलों में कम बरसात हुई है। इन तथ्यों को रेखांकित करते हुए उसने सरकार से यह जानना चाहा कि क्या उसने इस संबंध में राज्यों को कोई दिशा-निर्देश जारी किया है। अदालत इस तथ्य को जानकर भी चिंतित थी कि भूख की समस्या से पार पाने के लिए बने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत- जिसके अंतर्गत जिला स्तर पर शिकायत निवारण अधिकारी नियुक्त करने का आदेश है - अभी तक महाराष्ट्र सरकार ने कोई नियुक्तियां नहीं की हैं, जबकि कुछ आदिवासी-बहुल जिलों में भूख से मरने के समाचार हैं। मिसाल के तौर पर पालघर के 'पालक मंत्री' विष्णु सवारा को स्थानीय आदिवासियों ने बताया था कि जनवरी 2015 से इस इलाके में भुखमरी से छह सौ से अधिक बच्चे काल-कवलित हुए हैं।

श्न उठता है कि आखिर बीते साल की सरकार की किस गलती की तरफ सर्वोच्च अदालत इशारा कर रही थी? गौरतलब है कि जिन दिनों मोदी सरकार ने अपनी हुकूमत के दो साल पूरे किए और उसे लेकर पूरे भारत में जश्न मनाया, जिसमें कई सितारों को भी आमंत्रित किया गया था, उसके कुछ समय पहले स्वराज अभियान की ही याचिका पर हस्तक्षेप करते हुए सर्वोच्च न्यायालय को कहना पड़ा था कि देश के लगभग तीस फीसद भाग में सूखा पड़ा है और सरकार कुछ नहीं कर रही है। इतना ही नहीं, केंद्र सरकार ने इस बात को आधिकारिक तौर पर स्वीकारा तक नहीं था कि सूखे की व्यापकता इतनी अधिक है, उसे लेकर ठोस कदम उठाने की बात तो दूर रही। ग्यारह मई के उस अपूर्व आदेश में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र व राज्य सरकारों को यहां तक निर्देश दिए थे कि वे सूखाग्रस्त इलाकों में क्या कदम उठाएं। अन्न की उपलब्धता को लेकर तथा कोई व्यक्ति भले ही गरीबी रेखा के नीचे की सूची में हो या न हो या उसके पास राशन कार्ड न भी हो तो भी वह उसका लाभ उठा सके, इसके लिए अदालत ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से उनके लिए अनाज उपलब्ध कराने की बात कही थी। लेकिन विडंबना यह कि किसी भी राज्य ने इस पर अमल नहीं किया था।

क्या ही अच्छा होता कि कुछ वक्त पहले अपनी कर्मण्यता को लेकर शीर्ष अदालत की डांट खा चुकी सरकार एलान करती कि चूंकि मुल्क में सूखा पड़ा है, लिहाजा हम अपने समारोहों को स्थगित कर रहे हैं। उसका एक सकारात्मक असर होता। लोग सोचते देर आए, दुरुस्त आए। मगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। सरकार का जश्न बदस्तूर जारी रहा था। और देश के तीस फीसद भाग में सूखे को लेकर उसकी शीतनिद्रा या अनदेखी जारी रही। सुप्रीम कोर्ट द्वारा खाद्य आयुक्त के दफ्तर के लिए प्रमुख सलाहकार के तौर पर नियुक्त किए गए बिराज पटनायक का साक्षात्कार- जो उसके चंद रोज बाद प्रकाशित हुआ था- इस मामले में आंखें खोलने वाला था। इस साक्षात्कार में उन्होंने स्पष्ट किया था कि सर्वोच्च अदालत द्वारा इस मामले में स्पष्ट तथा सख्त निर्देश के बावजूद सूखाग्रस्त इलाकों में जमीनी स्तर पर कुछ भी नहीं किया गया था। उनके मुताबिक 2013 में बने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम पर अमल शुरू तक नहीं किया गया है। सत्ता की बागडोर संभालने के बाद राजग सरकार ने तीन दफा इस अधिनियम को लागू करने की अंतिम तारीख आगे बढ़ा दी। ऐसा महज संसद की स्वीकृति से ही संभव है, मगर इसे कार्यपालिका की कार्रवाई के तहत अंजाम दिया गया। जाहिर है कि इसने सूखाग्रस्त इलाकों में भूख की समस्या को बढ़ाया है।

अगर खाद्य सुरक्षा कानून जब से बना तब से लागू किया गया होता तो ग्रामीण आबादी के लगभग पचहत्तर फीसद के पास अनाज पहुंचाने की प्रणालियां कायम हो चुकी होतीं। बिराज पटनायक के मुताबिक राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम को लागू करने का कुल बजट पंद्रह हजार करोड़ रुपए है, जबकि केंद्र सरकार ने उसके लिए अभी तक महज चार सौ करोड़ रुपए आबंटित किए हैं। पिछले साल इसकी पायलट स्कीम अर्थात शुरुआती प्रायोगिक योजना पर उसने 438 करोड़ रुपए खर्च किए थे, जो इसी बात को रेखांकित करता है कि किस तरह वह इस योजना को हल्का करने की फिराक में है।
जो हाल राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम का था, कमोबेश वही हाल मनरेगा का भी था। याद रहे कि जब भी सूखे की स्थिति होती है तो यह मान्य प्रतिक्रिया है, जो अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही है, कि राहत कार्य शुरू किए जाएं, लोग सूखे का सामना ठीक से कर सकें इसलिए रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाएं। विडंबना यह कि यही वह समय था जब मनरेगा को बजट कटौती का सामना करना पड़ा। जहां एक तरफ सरकार की तरफ से कहा गया कि हमने इस साल इस योजना के लिए 43,000 करोड़ रुपए आबंटित किए, वहीं यह सच्चाई छिपा ली गई कि उसमें से बारह हजार करोड़ रुपए पिछले साल की मनरेगा मजदूरी का बकाया ही था। और सूखे के इस वर्ष में त्रासदी यह थी कि बीते सालों की तुलना में बाईस करोड़ मनरेगा दिवसों का आबंटन घटा दिया गया है। जहां गरीबों के लिए, भुखमरी के कगार पर खड़े लोगों के लिए खजाना खोलने में सरकार सकुचाती दिखती है, वहीं दूसरी तरफ इस सरकार को कोई गम नहीं कि वह 'खराब कर्ज' से निपटने के नाम पर पूंजीपतियों द्वारा सरकारी बैंकों से लिया गया लाखों करोड़ रुपए का कर्ज माफ कर दे, भले ही उससे सरकारी बैंकों का दिवाला निकलने की नौबत आ जाए, भले ही वहां जमा पैसे का अधिकतर हिस्सा आम लोगों की गाढ़ी कमाई से आता हो।

अपने साक्षात्कार के अंत में बिराज पटनायक ने एक मराठी कहावत का उद्धरण दिया था, जिसके मुताबिक सूखा 'आसमानी नहीं बल्कि सुलतानी' होता है अर्थात सूखा प्रशासन की नाकामी के चलते सामने आता है, न कि बरसात की कमी से। उनका कहना था कि सदियों पुरानी यह कहावत शायद आज की स्थिति में भी लागू होती दिखती है, जो एक ऐसा युग है जब कोई 'विजन' नहीं है और यहां 'टेलीविजन' मॉडल आफ गवर्नेंस चल रहा है।

इस सवाल का जवाब भविष्य के गर्भ में छिपा है कि सरकार ने अदालत की चेतावनी के मद््देनजर क्या कदम उठाए!