25 हजार नौकरियां और पारदर्शिता के पैमाने

  • 2015-12-07 13:30:46.0
  • सुरेश कुमार
25 हजार नौकरियां और पारदर्शिता के पैमाने

सरकार पहले प्रशिक्षित लोगों को पदों पर नियुक्त करे, ताकि प्रशिक्षित लोगों के मन में जो कुंठा घर कर गई है, वह दूर हो। इसके अलावा सरकार को कुछ ऐसे पैमाने बनाने चाहिए कि युवा नौकरी के लिए अपनी उम्र के 45 वें साल का इंतजार न करता रहे। उम्र के इस पड़ाव पर उसमें नौकरी पाने का कोई खास उन्माद नहीं होगाज्‘सरकारी नौकरी’ यानी एक सुरक्षित जीवन। युवा पढ़-लिख कर यही सपने बुनता है कि किसी तरह एक अदद सरकारी नौकरी मिल जाए, तो जीवन आराम से कट जाए। यानी युवा जिंदगी में कुछ करने के बजाय इसे आराम से गुजारना चाहता है। सरकार ने पिछले दिनों आने वाले दो सालों में युवाओं को सरकारी क्षेत्र में 25 हजार नौकरियां देने का ऐलान किया है, तो जाहिर है कि नौजवानों की उम्मीदों को पंख लगना स्वभाविक है। नौकरियां देना तो हर सरकार अपने एजेंडे में शामिल करती है। पर हर सरकार के मानदंड ऐसे होते हैं कि पात्र लोग इन नौकरियों से वंचित रह जाते हैं और वे लोग इन पदों पर काबिज हो जाते हैं, जो शर्तें ही पूरी नहीं करते। शिक्षा के क्षेत्र की ही बात करें, तो भाजपा ने विद्या उपासक रखे, तो कांग्रेस ने पीटीए को प्राथमिकता दी। जो लोग बीएड और जेबीटी कर के बैठे हैं, वे सडक़ों पर खाक छान रहे हैं। शायद ही किसी दूसरे प्रदेश में अध्यापकों की इतनी केटागरी होंगी, जितनी कि हिमाचल में हैं। कोई पीटीए, कोई पैरा टीचर, कोई पैट और अब एसएमसी टीचर। कुल मिलाकर रोजगार देने के ये पैमाने ही बेरोजगारी को बढ़ा रहे हैं। हर साल कितने ही युवा बीएड, जेबीटी और दूसरे कोर्स करके निकल रहे हैं और सरकार के पास इन को एडजस्ट करने का कोई विकल्प ही नहीं है। देखा जाए तो हिमाचल में शिक्षा ढांचा ही ऐसा बना दिया गया है कि यहां शिक्षा का मकसद सिर्फ सरकारी नौकरी हासिल करना ही है।  सरकार की सब से बड़ी घोषणा कि अगले दो साल में हिमाचल में 25000 युवाओं को सरकारी नौकरियां दी जाएंगी, ने युवाओं के सरकारी नौकरी के इस मोहपाश को और मजबूत किया है। हिमाचल के रोजगार कार्यालयों में बेरोजगारों का नौ लाख का आंकड़ा और दो साल में 25 हजार नौकरियां देने का ऐलान ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ ही नहीं, जीरे का भी जरा सा ही कहा जा सकता है। सरकार ने 6000 बैकलॉग भर्तियों को मंजूरी भी दे दी। ये घोषणाएं कितना सुकून देती हैं जबकि इन का धरातलीय सच क्या है, खुद सरकार भी नहीं जानती।  हम ने कंडक्टर भर्ती को कोर्ट में उलझते देखा है। सरकार चाहे कांग्रेस की हो या भाजपा की, नौकरियों में पारदर्शिता की बातें होती हैं, पर रसूखदार बाजी मार जाते हैं।

अभी हाल ही में एक खुलासा हुआ कि किस तरह से फोरेस्ट गार्ड भर्ती में कम नंबरों को ज्यादा बनाकर अयोग्य लोगों को नौकरी पर रख लिया गया। हिमाचल में तो यह ट्रेंड ही बन चुका है कि हर भर्ती कोर्ट की चौखट पर पहुंच जाती है। वजह यही है कि किसी भी भर्ती के पैमाने पारदर्शी नहीं हैं। इसी पक्ष का दूसरा पहलू यह कि सरकार वर्तमान कर्मचारियों को वेतन देने के लिए हर दूसरे महीने  करोड़ों का लोन उठाती है, तो इन कर्मचारियों के लिए वेतन की व्यवस्था के लिए सरकार क्या बंदोवस्त करेगी। सरकारी नौकरी देना सरकार की रूटीन प्रक्रिया है, पर क्या सरकार इस बात से वाकिफ नहीं है कि हर साल के बजट में वेतन, पेंशन और कर्ज की अदायगी में ही कितना हिस्सा चला जाता है। हर कार्यकाल में औसतन 9 हजार करोड़ रुपए का कर्ज प्रदेश पर चढ़ जाता है। अब जनवरी से केंद्र में लागू होने वाली सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें सिर दर्द बनेंगी।

आकंठ  कर्ज में डूबा एक छोटा सा प्रदेश, जिसे केंद्र ने मदद करने से मना कर दिया हो, कैसे सब करेगा, समझ से परे है। सरकार को ऐसे में रोजगार देने के मामले में फूंक-फूंक कर कदम रखना चाहिए। जो जरूरी हैं, उन पदों को ही सृजित करे और उन पदों पर भर्ती पूरी पारदर्शिता से हो।

अगर ऐसा होगा, तो कोई भी भर्ती कोर्ट के चक्करों से बच जाएगी। सरकार का भी समय बचेगा और समय पर पदों पर सही लोगों की नियुक्तियां भी होंगी। दूसरी बात यह कि सरकार पहले प्रशिक्षित लोगों को पदों पर नियुक्त करे, ताकि प्रशिक्षित लोगों के मन में जो कुंठा घर कर गई है, वह दूर हो। इसके अलावा सरकार को कुछ ऐसे पैमाने बनाने चाहिए कि युवा नौकरी के लिए अपनी उम्र के 45वें साल का इंतजार न करता रहे। उम्र के इस पड़ाव पर उसमें नौकरी पाने का कोई खास उन्माद नहीं होगा और न ही वह अपने पद पर रह कर उस जोश से काम कर पाएगा।

यानी कि सरकार अपने सिस्टम को चलाने के लिए युवा पीढ़ी का इस्तेमान करे न कि अधेड़ वर्ग का। वैसे तो युवाओं को सरकारी नौकरी का मोह पालना ही नहीं चाहिए क्यों कि जब तक सरकार की तरफ से नौकरी का ऑफर मिलेगा, तब तक तो स्वरोजगार से कितना कुछ हासिल किया जा सकता है। प्रतिस्पर्धा के इस दौर में अब निजी क्षेत्र सरकारी से बेहतर हो गए हैं। अगर सरकार 25 हजार नौकरियां दो साल में देती है, तो चलो बेरोजगारी का कुछ आंकड़ा तो कम होगा ही। उम्मीद यही करते हैं कि ये नौकरियां पारदर्शी पैमाने पर पात्र लोगों को मिलें और बिना कोर्ट के दखल के ये पद भरे जाएं।