सेनाध्यक्ष के सच का सार

विशेष संपादकीय

सेनाध्यक्ष वीके सिंह ने देश की कमजोर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर प्रधानमंत्री को पत्र लिखा और अब यह समाचार पत्रों के लिए लीक हो गया। अपनी जन्मतिथि संबंधी विवाद को लेकर जनरल मुंह की खाये बैठे थे। इसलिए उनके द्वारा अब उठाये इस मुद्दे को पूरा देश उनकी खींझ मिटाने की एक कोशिश के रूप में देख रहा है। उनका मुद्दा चाहे जितना राष्टï्रहित से जुडा हो और चाहे कितना ही महत्वपूर्ण क्यों ना हो उसमें खीझ मिटाने की गंध तो आती ही है। परंतु इस सबके बावजूद एक सच देश के सामने आ गया है कि पिछले लगभग 25 वर्ष से देश की सेना के लिए साजो सामान लाने ले जाने के लिए ट्रकों को बाहर से ही खरीदा जा रहा है। चीन ने अपनी सेना का जिस स्तर पर आधुनिकी करण किया है उस सीमा तक हमें अपनी सेना को आधुनिकतम अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित करने के लिए 12000 करोड़ रूपये की आवश्यकता होगी। बात साफ है कि कमीशन की बीमारी के कारण ऐसा होता रहा है। पंडित नेहरू के प्रधानमंत्री काल में ही इस कमीशन की बीमारी ने हमें घेर लिया था। आज यह हमारे लिए राष्टï्रीय एकता का एक महत्वपूर्ण कारण बन गया है। क्योंकि हम और बिंदुओं पर चाहे एक हो या न हो पर कमीशन के बिंदु पर तो सभी एक होते हैं। व्यवस्था के ढीले पन ने स्थिति को बद से बदतर कर दिया है। देश का वित्तमंत्री यहां स्वीकार कर रहा है कि देश की कुल संपत्ति के लगभग 70 प्रतिशत भाग पर देश के 8200 लोगों का एकाधिकार है। कमीशन को समाजवाद के लिए आवश्यक बना देने की हमारी ढिलाई और स्वार्थपूर्ण मनोवृत्ति के कारण ऐसा हो गया है। पंडित नेहरू के समय में हमने भारी उद्योग स्थापित कर कुटीर उद्योग धंधों को चौपट कर दिया था। छोटे लोगों को उजाडकर एक बड़े आदमी की भेंट चढ़ा दिया कि अपना समय श्रम एवं ऊर्जा एक व्यक्ति के लिए व्यय करो। इससे एक व्यक्ति पूंजीपति होता चला गया और जो व्यक्ति वास्तव में मालिक था अर्थात वह श्रमिक कार्य जो अपना समय, श्रम, और शक्ति व्यय करता है-वो तो चौपट हो गया और जो व्यक्ति नौकर था वह मालिक हो गया। पूंजी वैसे भी श्रम पर शासन करती ही है। ये ही भारत में हुआ और हम फिर भी जोर से नारे लगाते रहे कि हमने देश में समाजवाद की स्थापना की है। आज हम इसी खून चूसने वाले पंूजीवादी समाजवाद में जीवन यापन कर रहे हैं। इस पूंजीवादी समाजवाद के कारण ही कमीशन बाजों और चोरों ने देश की संपत्ति को हथिया लिया है। तमाम कानून और सारी व्यवस्था लाचार होकर रह गयी है। इसी कमीशन की बीमारी ने हमारी सेना को भी अपने शिकंजे में खड़ा कर दिया। सेना के लिए बनने वाले साजो सामान और हथियारों में भी बीच के लोग कमीशन खा रहे हैं। इसलिए हमारे देश के वीर जवानों के पास वह सामान नहंी पहुंच पा रहा है, जिससे वह पूरी मुस्तैदी के साथ देश की सुरक्षा कर सकता है। फिर भी हमारे सेनाध्यक्ष के लिए उचित होता कि वह देश की सुरक्षा से जुड़े इतने संवेदन शील मुद्दे को सार्वजनिक ना करते। उन्हें चाहिए था कि वह रक्षामंत्री प्रधानमंत्री और राष्टï्रपति के लिए पत्र लिखते और अपनी सेवानिवृत्ति के पश्चात कुछ उचित बातों को मर्यादित ढंग से सार्वजनिक करते। फिर भी आज उनकी बातों को बहुत हल्के से लेने की आवश्यकता नहीं है। बातों में अमर्यादा है, उतावलापन है, भड़ास मिटाने की गंध है पर फिर भी तथ्य है और तथ्यों की कभी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। हमें सार-सार ग्रहण करने और थोथे को उड़ाने की नीति का सहारा लेना चाहिए।

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