श्रीमती बेसेंट ने विदेशी होकर भी भारतीयता को अपनाया

प्रमुख समाचार/संपादकीय

बढ़ती आबादी से जूझ रहे भारत जैसे देश में ब्रिटेन से आकर बसने और भारतीय स्वाधीनता संग्राम में भारतीयों के कंधो से कंधा मिलाकर चलने वाली वाली एनी बेसेंट को अपने देश में जन्म नियंत्रण के बारे में पर्चे बांटने के कारण मुकदमे का सामना करना पड़ा था। यह एनी बेसेंट ही थीं जिन्होंने हिन्दू धर्म से पश्चिम को वाकिफ कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के साथ भारतवासियों में यह भावना विकसित की कि उनका धर्म और संस्कृति किसी से कम नहीं है। भारत में आने के बाद वह कांग्रेस की सबसे बड़ी महिला नेता बनीं और बाल गंगाधार तिलक के साथ मिलकर कांग्रेस को बंद कमरे की राजनीति से निकालकर सड़क की राजनीति के लिए प्रेरित किया। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पांचवीं और पहली महिला अधयक्ष बनीं। वह पार्टी की आखिरी ब्रिटिश अधयक्ष बनीं। भारत में समाज सुधार और जनकल्याण के कई कामों का आगाज करने वाली एनी के सामाजिक और धार्मनिरपेक्ष विचारों ने उनके पारिवारिक जीवन को एक तरह से नष्ट कर दिया था। भारत की आजादी से सौ साल पहले एक अक्तूबर 1948 को आयरिश परिवार में पैदा एनी वुड का बचपन संघर्ष पूर्ण रहा। हालांकि उनका परिवार संभ्रांत था लेकिन उसकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो रही थी। एनी का विवाह 1867 में फ्रैंक बेसेंट से हुआ जिनसे उनकी दो संतानें भी हुईं। उनके धर्मविरोधी विचारों ने विवाह में दरार डाल दी और 1873 में पति से उनका कानूनी तौर पर अलगाव हो गया। पति से अलगाव के बाद भी वह मिसेज बेसेंट के तौर पर जानी जाती रहीं और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय नेता उन्हें इसी नाम से संबोधित करते थे।

द. भारत में शिक्षा के महत्व को वह जानती थीं और वाराणसी में उन्होंने सेंट्रल हिन्दू कालेज की स्थापना की जो बाद में बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय की स्थापना का आधार बना।

बाद में उन्होंने अपना सामाजिक जीवन ज्यादा सक्रियता से शुरू किया और वह नेशनल सेक्युलर सोसायटी की सदस्य बन गईं जो आजाद खयाली को प्रोत्साहन देता था। इसके साथ ही वह फेबियन सोसायटी की सदस्य बनीं जो ब्रिटेन का प्रख्यात सामाजिक संगठन था। समाज में सुधार की पैरोकार एनी ने चार्ल्स ब्रेडलाग के साथ नेशनल रिफार्मर साप्ताहिक का संपादन किया जो ट्रेड यूनियन, राष्ट्रीय शिक्षा, महिलाओं के मतदान के अधिाकार और जन्म नियंत्रण आदि विषयों पर प्रगतिशील विचारों की वकालत करता था। जन्म नियंत्रण संबंधी उनके पर्चे के लिए एनी पर ब्रैडलाग के साथ मुकदमा चला। हालांकि वे बाद में बरी हो गईं। बाद में एनी की रूचि मैडम ब्लावत्स्की की अगुवाई वाले थिआसाफिकल सोसायटी में जगी जो 1875 में शुरू हुआ धार्मिक आंदोलन था और कर्म तथा पुनर्जन्म के हिन्दू विचारों पर आधारित था। बाद में वह इस संगठन की अधयक्ष भी बनीं और 1907 से लेकर अपनी मृत्यु तक इस पद पर बनी रहीं। एनी पहली बार 1893 में भारत आईं और बाद में यहीं बस गईं। इसके बाद वह भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में गहराई से जुड़ गईं और 1916 में इंडियन होम रूल लीग की स्थापना की और इसकी अधयक्ष बनीं। भारत आकर एनी पूरी तरह भारतीय हो गईं और उन्होंने साड़ी पहननी शुरू कर दी। भारत पहुंचकर एनी ने संस्कृत सीखी और भगवद् गीता का अनुवाद किया। भगवद् गीता की उनकी व्याख्या पढ़कर महात्मा गांधी बहुत प्रभावित हुए थे। वह भारत ब्रिटेन राष्ट्रमंडल की पैरोकार थीं और कहा जा सकता है कि राष्ट्रमंडल शब्द उन्होंने ही दिया।

भारत में शिक्षा के महत्व को वह जानती थीं और वाराणसी में उन्होंने सेंट्रल हिन्दू कालेज की स्थापना की जो बाद में बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय की स्थापना का आधार बना। वह पहले स्वयं यह विश्वविद्यालय स्थापित करना चाहती थीं लेकिन बाद में यह जिम्मेदारी महामना मालवीय को सौंपने पर सहमत हो गईं। वह अपने कालेज में विवाहित छात्रों को स्थान नहीं देती थीं और उनका यह कदम बाल विवाह को हतोत्साहित करता था। कांग्रेस की राजनीति में उनका दखल बढ़ रहा था लेकिन 1919 में पंजाब में जलियांवाला बाग नरसंहार के बाद हुई हिंसा का विरोधी और ब्रिटिश नीति का समर्थन करने से वह आम जनता से दूर होने लगीं औरमोहन दास करमचंद गांधी का नेतृत्व उभरने लगा। बाद में थिआसाफी आंदोलन उनके केंद्र बिन्दु में आ गया और वह अपने मानस पुत्र जे. कृष्णमूर्ति के साथ पश्चिमी देशों की यात्रा पर निकलीं। कृष्णमूर्ति को वह नया मसीहा मानती थीं। एनी का 20 सितंबर 1933 को अड्यार में निधान हो गया जहां उन्होंने थियोसाफी का मुख्यालय स्थापित किया था।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *