वैदिक काल गाथा

राजनीति

आदि काल से राष्ट्र हमारा आर्यावर्त कहाता है।
भारतवर्ष नाम से अब भी जग में जाना जाता है।

सुख समृद्घि सदा रहती थी खुशहाली चहुं दिशा रहीं
गौ पालन घर घर होता था दूध की नदियां यहां बहीं
कैसा था दुर्भाग्य देश का द्वापर काल बुरा आया।
देवव्रत शांतनु का बेटा भीष्म प्रतिज्ञा कर आया।

मैं राज्य की चाह नही करूंगा है ईष्ट तुम्हें जो वही करूंगा।
संतान जो सत्यवती जनेगी राज्याधिकारी वही बनेगी।
इसी भांति एक अंधा शासक राष्ट्र हमारे का आया।
उसी समय से आर्य भूमि पर मंडराई काली छाया।

कौरव पांडव द्वन्द्व छिड़ गया शांत न जो होने पाया।
योगीराज कृष्ण का भी तो यत्न काम में ना आया।
युद्घ महाभारत से अपनी आर्य भूमि का पतन हुआ।
शौर्य पराक्रम कौशल का भी सबसे अधिक विनाश हुआ।

घमाशान जब हुआ राष्ट्र में ज्ञानी ध्यानी सभी गये।
आर्य सनातन वैदिक रीति, चाल चलन सब चले गये।
चक्र-कुचक्र चले फिर भारत भू पर ताण्डव नृत्य हुए।
पंथ कुपंथ चले सब मानव और घिनौने कृत्य हुए।

धर्मी कर्मी सत्य मार्ग तज स्वयं विधर्मी चाल चले ।
असत मार्ग अपनाये सबने सत्य मार्ग पर नही चले।
अंधियारा जब भू भारत था उदय हुआ एक व्यक्ति महान।
वैदिक धर्म पताका फहराने की मन में ठानी ठान।

पुन: आर्य पद्वति को देकर ज्ञान का दीप जलाया था।
धर्म सनातन वैदिक अपना सबको ही समझाया था।
ऐसे हितकारी जीवन को दयानंद कहते हैं हम।
आर्यवीर दल आर्य जगत के आर्य राष्ट्र रहते हैं हम।

आज मिला सानिध्य सभी को बाबा रामदेव आये।
बाबा के दर्शन पाकर के आर्य सभी मन हर्षाये।
मार्ग प्रशस्त हुआ हम सबका रामराज्य पा जाने का।
दुष्ट विधर्मी पापाचारी को यूं मार भगाने का।

निर्मल मन संकल्प करें हम वेद धर्म अपनाने का।
सबके मन में भाव उदय हो सत्य मार्ग पर आने का।
-आर्य नरेन्द्र निर्मल

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