वेद, महर्षि दयानंद और भारतीय संविधान-36

प्रमुख समाचार/संपादकीय

गतांक से आगे…..

जिसका परिणाम निकला कि हमारे संविधानविदों ने और संविधान निर्माताओं ने अस्पृश्यता को देश और समाज के लिए एक कोढ़ माना। इसलिए अस्पृश्यता को मिटाने की और पंथ जाति व लिंग के आधार पर किसी प्रकार की असमानता का व्यवहार न होने देने की दिशा में समाज के लिए एक क्रांतिकारी कदम उठाया।
पर हमारे संविधान ने जिस प्रकार समता स्थापना की बात कही है वेद उससे ऊंची बात कहता है। वह मनुष्य को सूर्य समान तेजस्वी कहता है और उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर चढऩे के लिए प्रेरित करता है। संविधान ने अपने नागरिकों को अमृत पुत्र नही कहा और ना ही सूर्य समान तेजस्वी कहता है और उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर चढऩे के लिए प्रेरित करता है। संविधान ने अपने नागरिकों को अमृत पुत्र नही कहा और ना ही सूर्य समान तेजस्वी कहा। संविधान ने अपने नागरिकों को उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर चढऩे के लिए ओजस्वी विचारों के साथ संबोधित भी नही किया। यहां एक मौन आवाहन है कि सब बराबर के लोग हैं, इसलिए सबके साथ समानता का व्यवहार होगा। परंतु वेद के शब्दों में एक ललकार है, अत्यंत ओजस्वी शब्दों में किया गया एक क्रांतिकारी आवाहन है कि बराबर वालों से आगे निकल और श्रेष्ठों तक पहुंच। इस आवाहन का अभिप्राय है कि बराबर वालों के साथ आकर भी रूकना नही है, अकर्मण्य या निकम्मा नही हो जाना है अपितु उनसे आगे निकलना है और श्रेष्ठों तक पहुंचना है। वेद हमें सतत संघर्ष की प्रेरणा दे रहा है। महर्षि इसी प्रेरणा शक्ति के प्रतीक थे। जबकि हमारा संविधान सबको साथ में लाकर बैठाने की तो बात करता है, परंतु सब साथ साथ बैठेंगे कैसे? यह स्पष्ट नही करता। साथ बैठ जाने को ही संविधान कहता है कि काम पूरा हो गया। इससे यथास्थितिवाद विकसित हुआ है। फलस्वरूप शोषण का एक नया वर्ग तैयार हो गया है। समाज शोषित और शोषक का अंतर समाप्त नही कर पाया है। वेद की शैली है कि वह बैठे हुए को ललकारता है कि बैठो मत अपितु आगे बढ़ो। उठो, जागो और लक्ष्य की प्राप्ति तक आगे बढ़ते रहो। यह स्थिति समता मूलक समाज में एक स्वस्थ संघर्ष की भावना को जन्म देती है। ऐसा संघर्ष जो हमारी आत्मोन्नति के लिए हो व हमारी परमगति के लिए हो। आत्मोन्नति भी ऐसी कि जिसमें दूसरे के अधिकारों का सम्मान हो और अपने कत्र्तव्यों का पालन हो। इस संघर्ष का मूल आधार है-कर्मशीलता। इस प्रकार कर्मशील मानवों के समतावादी समाज की कामना वेद करता है। यह कर्मशील और कर्तव्यशील समाज को सभ्यसमाज कहता है। हम आज निठल्ले निकम्मे (भ्रष्टाचार में डूबे) लोगों के और कर्तव्य विमुख (धर्म निरपेक्ष) लोगों के समाज को सभ्य समाज कह रहे हैं। महर्षि का सपना इस प्रकार के समाज का निर्माण करना कदापि नही था।
महर्षि जन्म के आधार पर नही अपितु कर्म के आधार पर वर्ण व्यवस्था को मानते थे। वेद भी यही कहता है। महर्षि के चिंतन की हल्की सी छाया तो हमारे संविधान पर इस संवैधानिक अनुच्छे में दीखती है, पर चिंतन को पैनापन नही दिया गया। फलस्वरूप समता के नाम पर असमता समाज में फैल गयी और वोटों की राजनीति ने सारी व्यवस्था का और इन संवैधानिक अनुच्छेदों का गुड़ गोबर कर डाला। महर्षि के चिंतन से प्रभावित लोग भी महर्षि की व्यवस्था क प्रतिपादन करने में असमर्थ रहे। सत्ता का संघर्ष सारे सामाजिक आदर्शों को खा गया और समाज में जाति, पंथ और लिंग के आधार पर असमता और भी बढ़ गयी है।
महर्षि दयानंद कैसी समता चाहते थे?
महर्षि दयानंद सामाजिक समता के परमोपासक थे। उन्होंने सामाजिक असमता के लिए भिन्न भिन्न मतों के प्राबल्य को उत्तरदायी माना। इसलिए वह विभिन्न मतों को समाप्त करके देश में एक मत वेदमत की स्थापना के स्पष्ट पक्षधर थे। उन्होंने लिखा-”उस समय सर्व भूगोल में एक मत था। उसी में सबकी निष्ठाा थी और एक थे। सभी भूगोल में सुख था। अब तो बहुत से मत वाले होने से बहुत सा दुख और विरोध बढ़ गया है। इसका निवारण करना बुद्घिमानों का काम है।
परमात्मा सबके मन में सत्य का ऐसा अंकुर डाले कि जिससे मिथ्या मत शीघ्र ही प्रलय को प्राप्त हों। इसमें सब विद्वान लोग विचार कर विरोधभाव छोड़ के अविरूद्घ मत के स्वीकार से सब जने मिलकर सबके आनंद को बढ़ावें।”
(स.प्र.स. 10, 185)
उन्होंने अन्यत्र लिखा-जब तक मनुष्य जाति में परस्पर मिथ्या मत मतांतर का विरूद्घ वाद न छूटेगा, जब तक अन्याय का अंत न होगा। यदि हम सब मनुष्य और विशेष विद्वज्जन ईष्र्या, द्वेष छोड़, सत्यासत्य का निर्णय करके, सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करना कराना चाहें तो हमारे लिए यह बात असाध्य नही है।
यह निश्चय है कि इन विद्वानों के विरोध ही ने सबको विरोध जाल में फंसा रखा है, यदि ये लोग अपने प्रयोजन में न फंसकर सबके प्रयोजन को सिद्घ करना चाहें तो अभी एकमत्य हो जायें।
(स.प्र.सं. 186)
इससे स्पष्टï है कि महर्षि दयानंद ऐकमत्यता की प्रतिपादिका समता के समर्थक थे। महर्षि दयानंद अंगूर के समान रसभरी एकता के पक्षधर थे। जबकि हमारा संविधान अंगूर के स्थान पर संतरा का उपासक है। सह संतरा की फाडिय़ों की भांति समाज में विभिन्न समप्रदायों का अस्तित्व बनाये रखकर उनसे ऊपरी एकता की प्रत्याशा करता है। संविधान की यह प्रत्याशा ही इसके चिंतन पर पश्चिमी जगत का प्रभाव परिलक्षित करती है।
स्वतंत्रता का अधिकार
अनुच्छे 19-संविधान के अनुच्छेद 19 के द्वारा नागरिकों को सात प्रकार की स्वतंत्रता प्रदान की गयी। जन्हें 44वें संविधानिक संशोधन 1978 द्वारा समत्ति के अधिकार को निकालकर अब छह कर दिया गया है। ये छह प्रकार की स्वतंत्रताएं निम्नवत हैं :-
(1) भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।
(2) शांतिपूर्ण ढंग से बिना हथियारों के सभा सम्मेलन करने की स्वतंत्रता।
(3) संघ या संस्था बढ़ाने की स्वतंत्रता।
(4) देश के भीतर घूमने फिरने की स्वतंत्रता
(5) देश के किसी भी भाग में निवास करने या बसने की स्वतंत्रता।
(6) कोई भी व्यवसाय या धंधा आरंभ करने की स्वतंत्रता।
अनुच्छेद 20-अपराधों के लिए दोष सिद्घि के संबंध में संरक्षण या दोषी ठहराए जाने के बारे में बचाव—
(1) किसी कानून को भंग करने पर एक अपराध के लिए एक बार से अधिक केस न चलाया जाएगा और न ही एक बार से अधिक सजा दी जाएगी।
(2) किसी कानून को भंग करने पर ही व्यक्ति को दंडित किया जा सकता है।
(3) किसी व्यक्ति को अपने विरूद्घ गवपही देन के लिए मजबूर नही किया जाएगा।
अनुच्छेद 21 में जीवन में सुरक्षा तथा अनुच्छे 22 में कुछ दशाओं में गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण की स्वतंत्रता का उल्लेख किया गया है।द्घ
वास्तव में स्वतंत्रता वेद के ‘स्वराज्य’ की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करती है। वेद ने जिस स्वराज्य का उद्बोधन कर उन्नति मानव समाज की कल्पना की, उस मानव समाज के लिए इस प्रकार के मौलिक अधिकारों की अतीव आवश्यकता है। इन स्वतंत्रओं के शत्रु आततायियों के लिए वेद निर्देश करता है :-
प्रेहय भीहि घृष्णुहि-अर्चन्ननु स्वराज्यम। (ऋ 1/80/3)
स्वराज्य का आदर करते हुए सेनापति, तू शत्रु के सम्मुख जा, उसे घेर कर नष्ट कर दे।
स्वतंत्रता सुरक्षित कब रहेगी? जब प्रजा स्वभावत: नियमों का पालन करती हो। वेद ने कहा है :-
व्रतान्यस्य सश्चिरे पुरूणि (अथर्व 20/109/3)
अर्थात स्वराज्य में प्रजा नियमों, मर्यादाओं का और अपने कत्र्तव्यों का पालन करती है। वेद स्वतंत्रता की रक्षा का उपाय भी बताता है:-
नमसा सह: सपर्यन्ति प्रचेतस:। (अथर्व 20/109/3)
विद्वान स्वराज्य रूपी शक्ति की नमस्कार के साथ पूजा करते हैं। यहां नमस्कार का अर्थ दूसरों की स्वतंत्रता का सम्मान करना भी है। जब हम दूसरों की स्वतंत्रता का या मौलिक अधिकारों का हृदय से सम्मान करना सीख जाते हैं, तभी हमारे अपने मौलिक अधिकारों की सुरक्षा हो पाना संभव है।
अनुच्छेद 19 में जो स्वतंत्रताएं हैं जो प्राचीन काल से ही भारत में जनसाधारण को प्रदान की जाती रही थी। हम स्वतंत्रता के इस मौलिक अधिकार को वेद और महर्षि दयानंद के चिंतन के सर्वाधिक निकट मानते हैं। मनुष्य का विकास तभी संभव है जब उसके व्यक्तित्व के विकास के लिए समाज उसे कुछ खुलापन दे, कुछ खुली हवा में घूमने, फिरने और सांस लेने का अवसर उपलब्ध कराये। उसके व्यक्तित्व पर और व्यक्तित्व के विकास पर अपने किसी रूढि़वादी दृष्टिकोण या मान्यताओं का पहरा न बैठाए।
उड़ते हुए पक्षी के यदि आप पंख कैच कर देंगे तो वह उड़ नही पाएगा। पंख कैच करना अमानवीयता है, पंखों को यथावत छोड़े रखना मानवता है और किसी पंखहीन को पंख दे देना, मानव स्वभाव की दिव्यता है। ये स्वतंत्रताएं महर्षि के इसी दिव्य चिंतन तक प्रदान की जानी चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरे के लिए ऐसे ही दिव्य भावों से भर जाए तो दिव्य मानव समाज का निर्माण किया जा सकता है। हमारा संविधान इस प्रकार की स्वतंत्रताएं को प्रदान करके ही दिव्य मानव समाज की स्थापना करता जान पड़ता है।
वेद का आदेश है –
ओउम। यद्वामीमचक्षसा मित्र च सूरय:।
व्यचिष्ठे बहुपाय्ये यतेमहि स्वराज्ये।। (ऋ 5/66/6)
इसकी व्याख्या करते हुए स्वामी विद्यानंद जी तीर्थ अपनी पुस्तक स्वाध्याय सन्दोह में कहते हैं। क्रमश:

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