मोहन की बंसरी पर मोदी की तान

संपादकीय

नरेन्द्र मोदी के समर्थन में जिस प्रकार भाजपा और संघ उतरकर मैदान में आये हैं उससे मोदी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी मजबूत हुई है। आर. एस. एस. के सरसंघचालक मोहन भागवत ने लातूर में स्पष्ट कह दिया है कि एक हिन्दुत्ववादी व्यक्ति प्रधानमंत्री क्यों नही हो सकता? बात सही भी है क्योंकि हिन्दुत्व एक मानवतावादी आदर्श जीवन प्रणाली है, जो कि समाज के प्रत्येक वर्ग को अपने अन्दर उसी प्रकार समाहित और समायोजित करती है जिस प्रकार दूध शक्कर को कर लेता है। हिन्दुत्व एक दर्शन है जो सबकी पहचानों को नमन करता है, लेकिन सबकी एक पहचान बनाकर चलने पर बल देता है। सबकी एक पहचान में विखण्डन करने वाली शक्तियों को ये दर्शन राष्ट्रघाती शक्तियाँ मानता है। देश में आजादी के पश्चात नेहरू जी और इन्दिरा जी ऐसे प्रधानमंत्री रहे जिन्हे उनके व्यक्तित्व से वोट मिले और वह अपने समय में अपनी पार्टी के घोषित प्रधानमंत्री रहे। इसलिए नेतृत्व का संकट कांग्रेस में उस समय नही रहा। 1977 तक देश का विपक्ष नेहरू या इन्दिरा बनने का अलग-अलग प्रयास करता रहा। लेकिन 1977 में एक अलग प्रयोग करने का फैसला लिया गया और विपक्ष की पांच पार्टियों ने मिलकर जनता पार्टी बनायी। जिसे चुनाव में सफलता मिली और एक गैर कांग्रेसी सरकार अस्तित्व में आयी। यहाँ दो बातें हमें एक साथ देखने को मिलीं। एक तो ये कि जनता पार्टी की जीत कांग्रेस की हार में निहित थी। लोग कांग्रेस के आपातकाल के अत्याचारों से तंग आ चुके थे, इसलिये उन्होंने जनता पार्टी को एक विकल्प के रूप में चुना। दूसरे, विभिन्न महत्वाकांक्षाओं के सम्मेलन के रूप में उभरी जनता पार्टी के पास राष्ट्रव्यापी छवि का एक नेता नही था। इसलिये नेहरू इन्दिरा की बराबरी वो नही कर पाये और कई महत्वाकांक्षाऐं जब-जब टकराई तो जनता पार्टी उसके विस्फोट में उड़ गयी। 1977 से हम निरन्तर सत्ता का सरल रास्ता गठबन्धन में तलाशते आ रहे हैं। 1989 में वी. पी. सिंह ने इसी रास्ते को चुना तो बाद में अटलजी ने भी अपने लिये इसी को उत्तम माना। आज भी हम इसी गठबन्धन (जिसे घटिया बन्धन कहा जाना उचित होगा) की राजनीति में जी रहे हैं। भाजपा 2004 में सत्ता से क्यों हटी? कुछ लोगों का बेतुका तर्क है कि उसके हिन्दुत्ववादी दर्शन ने या सिद्धान्तों ने उसे बाहर का रास्ता दिखाया। हमारा मानना इसके विपरीत है। भाजपा सत्ता से इसलिये हटी कि उसने अपने सिद्धान्तों को और हिन्दुत्व के राजधर्म को गठबन्धन धर्म पर कुर्बान कर दिया। यदि भाजपा कश्मीर से धारा 370 को हटाने, समान नागरिक संहिता को लागू कराने तथा अयोध्या में श्रीराम मन्दिर का निर्माणकरने के अपने वचन पर अडिग रहती और गठबन्धन धर्म के साथ-साथ अपने वास्तविक धर्म के प्रति भी समर्पित रहती तो वह निरन्तर आगे बढ़ती। उसने आगे बढ़ते कदम पीछे हटा लिये और देश के बहुसंख्यक समाज के अपने प्रति बढ़ते विश्वास में घात किया। करवट लेते देश को उसने जबरन सो जाने के लिये विवश किया। देश का जनमानस नेता की तलाश कर रहा है। 1984 से देश नेतृत्वविहीन है। हमारा आशय नेहरू-इन्दिरा की प्रशंसा करना नही है। बल्कि उन जैसे राष्ट्रव्यापी छवि के नेता की तलाश से है। छोटे-छोटे नेता बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं। जिनकी सोच तंग है वो हमें ऊँचाईयों पर पहुँचाने के सपने दिखा रहे हैं। कर्नाटक से उठाकर एक व्यक्ति को देश का प्रधानमंत्री बना दिया। देश के किसी भी व्यक्ति ने तब ऐसा नही सोचा था कि तुम्हारे दिये गये मत का अर्थ क्या निकाला जायेगा? यहाँ तक कि उस प्रधानमंत्री ने भी नही सोचा होगा कि इस चुनाव के बाद तेरी लॉटरी खुलने वाली है। आज उस प्रधानमंत्री की गाड़ी ब्रष्ट हुई खड़ी है। ऐसे कई नेता हैं जो स्वयं को भावी प्रधानमंत्री समझ रहे हैं और इसके लिये गठबन्धन (घटिया बन्धन) की जोड़-तोड़ में लगे हुए हैं। संघर्ष के नाम पर ये लोग जीरो हैं और अपने आप में पूरे हीरो हैं। अब यदि नरेन्द्र मोदी एक संघर्ष का सफर तय करने के लिये कमर कस रहे हैं तो इसमें बुरा क्या है? वह देश के नागरिक हैं और इस नाते वह किसी भी पद के दावेदार उसी प्रकार हो सकते हैं जिस प्रकार कोई अन्य नागरिक हो सकता है। उनमें विशेषता ये है कि वो कुछ करके कुछ पाना चाहते हैं गुजरात उनके लिये छोटा पड़ चुका है। उनका नाम पूरा देश जान चुका है। इसलिये वह उन नेताओं से लाख दर्जे बेहतर हैं जो सिरों की गिनती के गणित के लिये जोड़ तोड़ करने की राजनीति में यकीन रखते हैं और चोर दरवाजे से देश के बड़े पद पर पहुँचना चाहते हैं। चोरों के मुकाबले वह आदमी सदा ही बेहतर होता है जो अपने पुरूषार्थ, परिश्रम और योग्यता का प्रदर्शन कर आगे बढ़ने को प्राथमिकता देता है। हमारे देश में प्रधानमंत्री का पद सबसे महत्वपूर्ण है। वह विदेश में देश की आवाज माना जाता है। वह देश का नेता होता है और शासन प्रमुख माना जाता है। देश का शासन प्रमुख जननायक होना चाहिये, उसमें पूरे देश का नेतृत्व करने और उसकी राष्ट्रव्यापी छवि होने के गुण अनिवार्य रूप से होने चाहियें। संविधान के तत्सम्बन्धी प्राविधान य़द्यपि ऊपरी तौर पर सिरों की गिनती का खेल कराते से जान पड़ते हैं, लेकिन संविधान निर्माताओं ने लोकसभा में बहुमत दल के नेता को पी. एम. बनाने की इच्छा इसलिये की थी कि लोकसभा जन प्रतिनिधियों से बनती है, और उसमें जनता सीधे भाग लेती है। लोकसभा में बहुमत दल का नेता होने का अर्थ है जनमत के बहुमत का समर्थन प्राप्त नेता होना। जिसके नाम और काम से प्रभावित होकर लोगों ने उसकी पार्टी को समर्थन दिया हो और जो बहुमत प्राप्त कर लोकसभा में प्रवेश करने में सफल हुआ हो। प्रधानमंत्री के लिये आवश्यक होना चाहिये कि वह जनमत का बहुमत प्राप्त करके लोकसभा में जाये जहाँ उसकी नियुक्ति मात्र औपचारिकता रह जाये। उसकी नियुक्ति के पीछे लोक शक्ति कार्य करती हो। इसलिये लोक शक्ति का प्रधानमंत्री के साथ रहना बहुत ही आवश्यक है। यह शक्ति ही उसके लिये शास्ति है, जिससे शासन की उत्पत्ति होती है। गठबन्धन की राजनीति भारत में असफल हो चुकी है। इसलिये अब एक दल और एक नेता के लिये देश अकुला रहा है।आर. एस. एस. के सरसंघाचालक मोहन भागवत ने देश की अकुलाहट को पहचाना है और नीतिश से सही पूछा है कि देश में हिन्दुत्ववादी प्रधानमंत्री क्यों नही हो सकता? जिस देश की पहचान आन-बान और शान हिन्दुत्व हो उस देश पर वास्तव में तो हिन्दुत्ववादी प्रधानमंत्री ही होना चाहिये। ऐसा प्रधानमंत्री जो सारे समाज को शक्कर और दूध की तरह समायोजित कर सके। इसके अतिरिक्त यदि कोई साम्प्रदायिक व्यक्ति तुष्टिकरण की राजनीति के माध्यम से या जातिवादी व्यक्ति जातीय आरक्षण के आधार पर देश में विखण्डन के बीज बोकर भी देश का प्रधानमंत्री बन सकता है या बनने का सपना देख सकता है, तो एक ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री क्यों नही बनना चाहिये जो देश को इन दोनों बिन्दुओं पर एकरस कर सकता हो? नरेन्द्र मोदी हिन्दुत्व की शक्ति का जागरण कर रहे हैं और देश को राजनीतिक वितण्डवाद और पाखण्डवाद से पार ले जाना चाहते हैं। वह देश को बताना चाहते हैं कि पन्थनिरपेक्षता का वास्तविक स्वरूप क्या है? तुष्टीकरण देश के लिये कितना घातक रहा है? जातीय आरक्षण से देश के सामाजिक परिवेश में कितनी विसंगतियाँ पनपी हैं? धारा 370 देश के लिये कितनी घातक रही है? समान नागरिक संहिता देश में कितनी आवश्यक है? और यह भी कि देश के संविधान की सौगन्ध उठाने वालों ने ही देश के संविधान की किस प्रकार हत्या की है? इन सारे पापों की धुलाई के लिये नरेन्द्र मोदी आवश्यक हैं या गठबन्धन का घटिया बन्धनी कोई अदना सा नेता? सचमुच आर. एस. एस. सरसंघचालक मोहन भागवत और भाजपा के मोदी के पीछे खड़े होने से लगता है अब इस सवाल का जवाब मिलने में देश को अधिक समय नही लगेगा।मोहन यदि अब बंसरी बजा चुके हैं तो मोदी को भी अपनी तान दिखाने में अब देर नही करनी चाहिये। भाजपा के आडवाणी जैसे बड़े नेता प्रशंसा के पात्र हैं जिन्होंने समय के अनुरूप चलना सीखा है और समय की पुकार को सही अर्थो व सन्दर्भो में सुना है।

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