मुस्लिमों को आधुनिक शिक्षा देना चाहते थे सर सैयद

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अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (अमुवि) के संस्थापक सर सैयद अहमद खां ने मुसलमानों में आधुनिक शिक्षा के प्रसार के लिए यह विश्व प्रसिद्ध शिक्षण संस्थान ही नहीं बनाया बल्कि ईसाई मिशनरियों के हमलों से इस्लाम को बचाने का कार्य भी किया। विश्वविद्यालय की अधिकृत वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के अनुसार सर ने ईसाई मिशनरियों के हमलों से इस्लाम को बचाने के लिए भी कार्य किया। उन्होंने अमुवि की स्थापना से पहले 1872 में एक लेख में कालेज और विश्वविद्यालय संबंधित अपनी परिकल्पना का विवरण लिखा था। सर सैयद ने अपने पत्रों में लिखा- ऐसा लग सकता है कि मैं शेखचिल्ली की तरह सपने देख रहा हूं और डींग हांक रहा हूं। लेकिन हमारा मकसद मोहमडन एंग्लो ओरियंटल कालेज (एमएओ) को ऑक्सफोर्ड या कैम्ब्रिज की तर्ज पर विश्वविद्यालय में तब्दील करना है।

एमएओ कालेज ने ही बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का रूप ले लिया। उन्होंने मुस्लिम समाज के शैक्षिक विकास के साथ धार्मिक आस्था को भी प्रभावी बनाए रखने का स्वप्न देखा था। यह बात उनके इस विचार में झलकती है कि ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज में मौजूद चर्चों की तरह हर कालेज में मस्जिद होगी। इस बात की भी उन्होंने ताकीद की कि शिया और सुन्नी छात्र कालेज या छात्रावास में अपने धार्मिक मतभेदों पर चर्चा नहीं करें यह बात सख्ती से लागू होगी। इन दिनों सर सैयद की जीवनी का अनुवाद हिंदुस्तान की सभी भाषाओं में किया जा रहा है और कई भाषाओं में यह काम पूरा हो चुका है।

अमुवि स्थित सर सैयद एकेडेमी के सहायक क्यूरेटर (संग्रहालय) साजिद नईम ने बताया कि खां साहब की जीवनी का अनुवाद हिंदुस्तान की सभी भाषाओं में कराया जा रहा है। तमिल, तेलुगू, उर्दू, संस्कृत आदि भाषाओं में तो यह काम पूरा हो चुका है और फिलहाल बांग्ला, असमिया और मराठी में काम चल रहा है। सत्रह अक्तूबर 1817 को दिल्ली में जन्मे सैयद अहमद खां के जीवन में 1857 के स्वतंत्रता संग्राम ने बहुत असर डाला। उन्होंने 1857 के बाद एक प्रसिद्ध पुस्तक असबाब ए बगावत ए हिंद (भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के कारण) भी लिखी। नईम के मुताबिक दिल्ली में पले-बढ़े खां साहब ने 1864 में अलीगढ़ साइंटिफिक सोसायटी की स्थापना की थी जिसका मकसद मुस्लिम समाज में विज्ञान के प्रति जागरूकता लाना और किसानों की माली हालत सुधारने के लिए वैज्ञानिक तरीकों पर काम करना था। 

यहीं से उनका मिशन शुरू हो गया था। इसके बाद सर सैयद अहमद खां बनारस चले गए थे और बाद में 1876 में वह हमेशा के लिए अलीगढ़ आ गए और जीवन के आखिरी दो दशक उन्होंने अलीगढ़ में बिताये। 27 मार्च 1898 को उनका निधन हो गया। पश्चिमी शिक्षण पद्धति, संस्कृति और परंपराओं से वह खासे प्रभावित थे और भारतीय मुस्लिम समाज के विकास के लिए भी उन्होंने शिक्षा को ही सर्वाधिक प्राथमिकता दी। उन्होंने 1875 में अलीगढ़ में एमएओ कालेज की स्थापना की जिसने बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का रूप ले लिया।

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