महान दार्शनिक कन्फ्यूशियश का एक प्रेरक प्रसंग

बिखरे मोती

चीन के महान दार्शनिक कन्फ्यूशियश का नाम चीन में ही नही अपितु समस्त विश्व में बड़ी श्रद्घा और सत्कार के साथ लिया जाता है। उनकी ज्ञान की गंभीरता से प्रभावित होकर तत्कालीन चीन के सम्राट ने उन्हें तिब्बत के एक प्रांत का गवर्नर बना दिया था। वह ईश्वर भक्त और महान दार्शनिक थे। इसलिए वे सत्य की खोज और प्रभु चिंतन में लीन रहते थे। राज काज में उनकी रूचि नही थी। लोगों की शिकायत पर सम्राट ने उन्हें गवर्नर के पद से हटा दिया। इसकी सूचना जब उन्हें दी गयी तो कन्यफ्यूशियश ने मंद मुस्कान के साथ कहा, अच्छा हुआ…..। कालांतर के बाद एक दिन राजा को कन्यफ्यूशियश की याद आई। उन्होंने अपने मंत्री को बुलाकर पूछा आजकल कन्यफ्यूशियश कहां रहते हैं और क्या करते हैं? पता चला कि आजकल कन्यफ्यूशियश तिब्बत के पठार पर एक आश्रम में अपने शिष्यों के साथ रहते हैं, वहीं प्रभु चिंतन करते हैं और लोगों को उपदेश देते हैं। राजा ने उनसे भेंट करने की इच्छा व्यक्त की और वे अपने लाव-लश्कर के साथ उस महान दार्शनिक कन्यफ्यूशियश से मिलने चल दिये। राजा का काफिला कन्यफ्यूशियश के आश्रम में पहुंचा। देखते क्या हैं, वह महान  संत प्रकृति की सुरम्य गोदी में एक पत्थर के टुकड़े पर बैठा है और ईश-चिंतन में समाधिस्थ है। राजा को उनसे भेंट करने के लिए प्रतीक्षारत रहना पड़ा। उस महान संत ने कुछ देर बाद आंखें खोली तो देखा चीनी सम्राट सामने विद्यमान है। उन्होंने चीनी सम्राट का मधुर मुस्कान बिखेरते हुए आदर किया और कुशलक्षेम पूछी। तत्पश्चात चीनी सम्राट ने उस महान संत को शाही अंदाज में संबोधित करते हुए कहा-कन्यफ्यूशियश मैंने तुम्हें गवर्नर के पद से नीचे उतार दिया जिस पर तुम्हारी प्रतिक्रिया थी-अच्छा हुआ। इसका क्या रहस्य है? मंद मुस्कान के साथ उस महान संत ने राजा को उत्तर दिया-राजन! देखो, वह पक्षी कुछ क्षण पहले इस ऊंचे वृक्ष की सबसे ऊंची डाली पर बैठा था, किंतु अब वह इस रमणीक स्थान की हरी घास में बड़ी मस्ती से अपना दाना चुग रहा है। जैसे उसकी मस्ती पर कोई प्रभाव नही पड़ता ऐसे मेरी मस्ती पर कोई प्रभाव नही पड़ता-मैं पद पर रहूं या पद से नीचे रहूं। यह मस्ती आनंद प्रभु प्रदत्त है। किसी की दी हुई सौगात नही। दी हुई सौगात को तो कोई कभी भी वापिस ले सकता है किंतु प्रभु प्रदत्त आनंद को कौन वापिस ले सकता है? हे राजन! सत्ताबल, धनबल, बाहुबल, बुद्घिबल संसार के जितने भी बल हैं-उन सब में गरूर होता है, अकड़ होती है किंतु ये रूहानी दौलत की मस्ती, आनंद की मस्ती इन सबसे परे है। इस मस्ती का तो आलम ही दूसरा है। कन्यफ्यूशियश ने चीनी सम्राट से बड़े भावपूर्ण शब्दों में कहा- सत्ता के अंदर तो अहं का गरूर होता है। प्रभु, भक्ति में मस्ती का सरूर होता है।।  लेकिन इस बुलंदी तक केवल पहुंचता वही है,  जिसका दिल, उसके प्रेम से भरपूर होता है।। उस महान दार्शनिक और महान संत कन्यफ्यूशियश के ये शब्द चीनी सम्राट के हृदय को बेंध गये। तत्क्षण अपनी भूल की क्षमायाचना कर हृदय से पश्चाताप किया और कन्यफ्यूशियश के चरणों में चीनी सम्राट नतमस्तक हो गया। सचमुच संत अपने सहज और सरल स्वभाव से बड़े-बड़े सम्राटों का हृदय परिवर्तन कर देते हैं, क्योंकि उनके पास अपने आचरण की शक्ति होती है।

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