भावशून्य हो रही है नई पीढ़ी

प्रमुख समाचार/संपादकीय

शिक्षा व्यवस्था में हैं खामियां

डा. ब्रह्मदेव

गतांक से आगे।…अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह रूप पांच यम और शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्र्रणिधान रूप पांच नियम ये दोनों मनुष्यों के इंद्रियघोड़ों में लगाम का कार्य करते हैं। आधुनिक शिक्षा पद्धति में इनका कोई नाम लेने वाला भी नहीं है। अतः मानव बेलगाम घोड़ों के समान अर्थ के पीछे दौड़ लगा रहा है। ये जानते हुए भी कि सब यही रह जाना है और अनैतिक कार्यों में मानो प्रतिस्पर्धा करके जुटा है।

सद्गुणों के कारण ही स्वामी श्रद्धानंद की तपः स्थली गुरकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय ने अपने शैशव काल मे ही विश्व कीर्ति अर्जित की थी।

अन्य अनेक दोष भी विचार करने पर इस शिक्षा पद्धति में संकेतित किए जा सकते हैं, जिनके चलते आज स्थिति यह हो गई है कि साधन साध्य हो गया है। विश्व के समस्त शैक्षणिक संस्थानों में आज प्रायः अंधी दौड़ है और उसी का परिणाम है कि मानव अर्थलिप्सु हुआ, येन केन प्रकारेण शिक्षित कहलाता हुआ भी भ्रष्टाचार, अनैतिक आचरणों के दलदल में आकण्ठ डूबा जा रहा है। सुख शांति यदि धन एैश्वर्य में होती तो विश्व के चोटी के शांति धनाढ्यों में अशांति देखने को न मिलती लेकिन आज की शिक्षा व्यवस्था इसी धूरी पर चक्कर लगा रही है, जो मानव ऐकांतिक अज्ञैर अत्यांतिक सुख की अवाप्ति का साधन नहीं। ऐसी स्थिति में आज की सामाजिक विसंतगतियों, स्थितियों को देखते हुए प्रश्न खड़ा होता है कि क्या आज की शिक्षा व्यवस्था उचित है? कोइ भी विचारक उत्तर में नहीं ही कहेगा और सुधारने की बात करेगा।

हिंदी में हो शिक्षा व्यवस्था

स्वामी रामदेव का कहना है कि – हम राष्ट्रभाषा हिंदी के साथ-साथ भारतीय भाषाओं यथ गुजराती, तमिल, तेलगू, कन्नड़, मराठी, पंजाबी, बांग्ला आदि को उचित सम्मान दिलवायेंगे। विदेशी भाषाओं का ज्ञान रखना उत्तम बात है परंतु अन्य देश की भाषा का राष्ट्रभाषा के रूप में प्रयेग करना घोर अपमान व शर्म की बात है। विश्व का कोई भी सभ्य देश अपने नागरिकों को विदेशी भाषा में शिक्षा नहीं देता। तकनीकी शिक्षा, चिकित्सा शिक्षा, प्रबंधन आदि की शिक्षा भारतीय भाषाओं एवं राष्ट्रभाषा हिंदी में न होकर विदेशी भाषा में होने के कारण कई बच्चे वैज्ञानिक, डाक्टर एवं प्रबंधक आदि बनने के सपनों को पूरा नहीं कर पाते।

कई मजदूर, किसान, गरीब के हजारों बच्चे अन्य विषयों मे प्रतिभाशाली होते हुए भी अंग्रेजी भाषा की अनिवार्यता होने के कारण उसमें फैल होने पर मिडिल या मैट्रिक परीक्षा तक पास नहीं कर पाते तथा डाक्टर, आईएएस अथवा वैज्ञानिक बनने से वंचित रह जाते हैं।

हम अपने बच्चों को अपनी भाषा में समान अवसर उपलब्ध करवायेंगे। उन्हें मातृभाषाओं, मलयालम, गुजराती, तमिल, तेलगू, कन्नड़, मराठी, पंजाबी, बांग्ला सहित राष्ट्रीय भाषाओं एवं राष्ट्रभाषा में व्यावसायिक शिक्षा उपलब्ध करवायेंगे। (समाप्त)

(योग संदेश से साभार)

विकल्प आश्रम व्यवथा : उक्त विकट परिस्थतियों के जनक दूषणरूप तमःपुज को ध्वस्त करने की एकमात्र प्रकाशज्योति भारतीय आश्रम व्यवस्था में निहित है, जो वेदादि शास्त्रों के अविर्भाव से लेकर रामायणकाल तक समृद्धि को प्राप्त हुई दिखायी देती है तथा महाभारत काल के आते-आते क्षीण हो गई और आज पुनः लुप्त है। जिसे आधुनिक काल में पूरे विश्व के कल्याण की इच्छा रखने वाले महान शिक्षा शास्त्री दयानंद ने अपने उपदेशोंsss और ग्रंथों से पुनः स्थापित करने की कोशिश की। उन्हीं की प्रेरणा लेकर अनेक गुरकुलों ने आश्रम व्यवस्था को अपनाया और आज समाज के द्वारा प्राप्त करवाये गये स्वल्प संसाधनों के बीच कार्य कर ख्याति अर्जित कर रहे हैं। प्रमुखतः प्राच्य संस्कृत ग्रन्थों के ही अध्ययन, अध्यापन में पूर्ण निष्ठा से ये संस्थान कार्य कर रहे हैं, यदि उन पाठ्यक्रमों के साथ अर्वाचीन ज्ञान विज्ञान को भी पठन-पाठन का अंग बना दिया जाये तो उनमें उत्तम कोटि का कोई शिक्षण संस्थान संभवतः न होगा। ग्रामों और नगरों से दूर होने के कारण समाज में पनप रहा प्रदूषण भी वहां नहीं है और यही दूषण मानव मस्तिष्क से हटाने का उद्देश्य लिए वे कार्य कर रहे हैं, उसमें सफलता भी किसी हद तक प्राप्त हो रही है, क्योंकि यहां जीवन के अंतर्गत स्वरूप शारीरिक, मानसिक और आत्मिक को प्रबलता प्रदान करवाते हुए जीने की कला भी है और अध्ययन अध्यापन के द्वारा बौद्धिक विकास का पूर्ण प्रबंध। इन्हीं गुणों के कारण स्वामी श्रद्धानंद की तपः स्थली गुरकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय ने अपने शैशव काल मे ही विश्व कीर्ति अर्जित की थी। अब भी यदि आश्रम व्यवस्था को निकट से देखना चाहे तो तीरंदाजी में ओलंपिक तक भारत की ध्वजा को उत्तेलित करने वाले, लड़कों के गुरकुल प्रभात आश्रम, मेरठ और लड़कियों के गुरकुल चोटीपुरा, अमरोहा को देख लीजिए। जो बिना किसी सरकारी सहायता के देश की सेवा कर रहे हैं और अपनी संस्कृति के आराधक हैं। गत दो तीन वर्षों में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा आयोजित संस्कृत में एनईटी, जेआरएफ परीक्षाओं को उत्तीर्ण करने वाले यहीं के सर्वाधिक विद्यार्थी रहे हैं।

गत वर्ष यही छह लड़कियों ने एनईटी परीक्षा उत्तीर्ण की और उनमें जेआरएफ करने वाली पांच थी। शायद किसी एक संस्था के इतने बच्चों की इस परीक्षा में सफलता आश्रम व्यवस्था की ही उत्कृष्टता को स्पष्टतः कह रही है। कहने का तात्पर्य यह है कि भारत वर्ष में ऐसे अनेक लड़के-लड़कियां के अलग-अलग गुरकुल स्थल हैं जिनमें समर्पण भाव और अच्छी मानसिकता से बच्चों का निर्माण प्राच्यपद्धति से किया जा रहा है। यदि यहां अच्छे साधन उपलब्ध करवाये जाये सरकारी सहयोग भी हो तो आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानों को भी नई दिशाएं दी जा सकती हैं। थोड़े प्रयास से भी बहुत उन्नत अवस्था तक पहुंचाया जा सकता है।

 

 

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