भाजपा को आडवाणी की सीख

विशेष संपादकीय

हरियाणा की धरती परिवर्तन की प्रतीक रही है। धर्मक्षेत्र कुरूक्षेत्र तो इस बात की साक्षी देता ही है साथ ही पानीपत का वह मैदान भी यहीं पर है जिसमें बाबर और इब्राहीम लोदी के मध्य 1526 में जंग हुई थी। इसी जंग ने सवा तीन सौ साल पुरानी दिल्ली सल्तनत को उखाड़ कर सवा तीन सौ मिनट के युद्घ में ही आने वाले सवा तीन सौ सालों के लिए मुगल बादशाहत की नींव रख दी थी। उसी परिवर्तनकारी हरियाणा की भूमि पर भाजपा के वयोवृद्घ और अनुभवी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सूरजकुंड में आयोजित हुए पार्टी के कार्यकर्ता सम्मेलन में पार्टी को ‘नई सोच और नई ऊर्जा’ से आगामी चुनावों के दृष्टिगत चुनावी मैदान में उतरने के लिए आंदोलित किया।
पार्टी के वयोवृद्घ नेता ने भाजपा को नेतृत्व की विश्वसनीयता और मतभेदों से उबरने की शिक्षा दी। साथ ही उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा में प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार नरेन्द्र मोदी की उपस्थिति में पार्टी को धर्मनिरपेक्ष छवि की भी याद दिलाई। उन्होंने कहा कि भाजपा को विश्वसनीय नेतृत्व की मिसाल बनना पड़ेगा। यदि हम दूसरों के द्वारा फैलाये जा रहे भ्रष्टाचार के विरोधी हैं तो हमें अपने लोगों के द्वारा फैलाये जा रहे ऐसे भ्रष्टाचार की भी उसी अनुपात में आलोचना करनी चाहिए।
भाजपा के लिए पार्टी के बड़े नेता की सीख शिक्षाप्रद हो सकती है। लेकिन भाजपा ने यदि कांग्रेसी छदमवादी धर्मनिरपेक्षता की सोच का अनुकरण किया तो उससे वह कांग्रेस की कार्बन कॉपी तो बन सकती है, लेकिन सक्षम विपक्ष की भूमिका वह नही निभा पाएगी। देश का बहुसंख्यक समाज इस समय भाजपा की ओर देख रहा है। भाजपा के वरिष्ठ नेता की यह बात सही हो सकती है, लेकिन देश के बहुसंख्यक समाज का भाजपा की ओर देखने का अभिप्राय स्पष्ट है कि वह भाजपा से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की परिभाषा को पूछना चाहता है? वह चाहता है कि भाजपा के उस नारे का क्या रहा जिसमें उसने कहा था कि ‘सौगंध राम की खाते हैं-मंदिर वहीं बनाएंगे’। क्या राम की सौगंध झूठी खायी गयी थी?
किसी मस्जिद को गिराने पर आडवाणी अफसोस व्यक्त करें ये तो समझ में आ सकता है, लेकिन एक राष्ट्र मंदिर के बनाने से पीछे हटें, यह समझ में नही आता। हमें सचमुच प्रतिक्रियावादी राष्ट्रवाद नही चाहिए। हमें समन्वयवादी राष्ट्रवाद चाहिए, परंतु समन्वयवादी राष्ट्रवाद का अर्थ भी ये नही है कि अपने सांस्कृतिक गौरव को समन्वयवाद के नाम पर भूलो और उसे दूसरों के गुणगान के सामने मंदिर में प्रसाद की भांति चढ़ा दो। जैसा कि कांग्रेस ने किया है। देश को बचाने के लिए देश के सांस्कृतिक कीर्तिमानों प्रतीकों, स्तंभों, मूल्यों आदि की सुरक्षा करना समाज का कत्र्तव्य होता है। भाजपा हरियाणा की पावन भूमि से धर्मक्षेत्र में खड़ी होकर महाभारत की तैयारी कर रही है तो वह युद्घ के लिए कुरूक्षेत्र तो तलाश कर चुकी है परंतु अभी उसे इस कुरूक्षेत्र को धर्मक्षेत्र भी घोषित करना होगा। यह तभी संभव है जब भाजपा कांग्रेस की कार्बन कॉपी बनने के स्थान पर भारतीयता की कॉपी बनने का संकल्प लेगी, फिर भी भाजपा के वरिष्ठ नेता के उदगार स्वागत योग्य हैं, बशर्ते कि भाजपा समय की गंभीरता को समझे। भाजपा को इस समय नेतृत्व के विषय में एकमत होना चाहिए। आडवाणी ने अपने आपको इस समय ‘एक बड़े’ की भूमिका में रखकर पार्टी को सही समय पर सही सलाह दी है। वह प्रधानमंत्री पद की दौड़ में नही हैं, लेकिन यह दौड़ अभी रूकी भी नही है। भाजपा इसे रोके।

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