देश में तैयार होते भस्मासुर

विशेष संपादकीय

देश की शिक्षा प्रणाली को नैतिक शिक्षा से दूर करके फिर उसको रोजगार प्रद बनाकर विद्यालयों ने जिस समाज का निर्माण किया है वह एकदम संवेदनाशून्य मानो पत्थर का समाज बना दिया है। देश में बड़े – बड़े उद्योग स्थापित किये गये और देश के लघु कुटीर उद्योगों की बलि चढा दी गयी । परिणाम ये आया कि आज देश में बड़े उद्योगों का एकाधिकार हो गया है। ये उद्योग धन्धे देश में पर्यावरण प्रदूषण को बढ़ावा दे रहे हैं। पर्यावरण सन्तुलन बिगाडऩे में सहायक हो रहे हैं। परिणामस्वरूप देश में कितने ही पक्षी और जानवर और अन्य प्राणी खत्म हो रहे हैं। पशु-पक्षिओं की कितनी ही प्रजातियां नष्ट हो गयी ।
अब गाजियाबद और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों के विषय में सूचना है कि यहां भूगर्भीय जल प्रदूषित हो गया है। लोगों में कैंसर और लीवर की बीमारियां बढ़ रही है। इसका कारण भी उद्योग धन्धों से निकला हुआ गन्दा पानी ही है। जिसे कम्पनी के लोग बाहर ना निकल कर धरती में ही उतार रहें हैं।परिणामस्वरूप ये कैमिकल्स मिला हुआ पानी भूगर्भीय जल को प्रदूषित कर रहा है। यही स्थिति प्रदेश और देश के अन्य क्षेत्रों की है। देश के अधिकांश  बूचडज़ाने पशुओं को अन्धे होकर काटते जा रहे हैं और दिन प्रतिदिन दुधारू पशु कम होते जा रहे है। पशुओं की स्थिति बड़ी ही दयनीय है । यदि यही स्थिति पशुहिंसा की रही तो अगले दस पन्द्रह साल में ही सारा देश दूध से वंचित हो जायेगा। सारे बूजड़खाने बड़े उद्योगों की तरह ही भस्मासुर हो गये हैं। ये भी पशुओं के खून को या ता धरती में उतार रहे हैं या फिर उसे नदियों में बहा दिया जाता है। गंगा नदी भी इतनी कहीं प्रदूषित नहीं होती जितनी कि कानपुर के बूचड़खाने से होती है। पशुओं का खून धरती में जाकर नदियों में मिलकर भूगर्भीय जल और नदीय जल को प्रदूषित कर रहा है, और विभिन्न जानलेवा बिमारियों को फैला रहा है। हमारे जनप्रतिनिधियों को आजकल के इन भस्मासुरों पर जुबान खोलने तक की फुर्सत नही है बस कनून बना देने से कर्तव्य की इतिश्री करली जाती है। यह नहीं देखा जाता कि कानून का क्रियान्वयन सही ढंग से हो पा रहा है या नहीं। सारे उद्योग और कटटीघर कानून का संरक्षण पाकर ही कानून की धज्जियां उड़ा रहें हैं। कानून की उड़ती इन धज्जियों में मानवता शर्मसार होकर रह जाती हैं। तब सवाल पैदा होता है कि यह सब क्यों और किस लिए हो रहा है? क्या आदमी आदमी का शत्रु हो गया है, या स्वार्थी हो गया है कि उसे अब अपने स्वार्थ के आगे और कुछ दीख ही नहीं रहा है। हमें समझ नहीं आ रहा कि आदमी को मिटाकर आदमी का दुश्मन बना आदमी फिर किस पर शासन करेगा? जब शासित ही नहीं रहेगा तो शासक क्या करेगा? शासन भी तो तभी तक रहता है जब तक कि कहीं न कहीं शासित का भी अस्तित्व हो। इसीलिए शासक वर्ग पर शासित वर्ग को प्रश्न्न रखने की विशेष जिम्मेदारी होती है। जब शासित वर्ग के हितों की अपेक्षा के अनुसार काम नहीं होता है तो उस समय अराजकता फैल जाती है । यह अराजकता भयंकर विनाश की ओर मानवता को ले जाती है । जिस देश में लोगों का दिन यज्ञ हवन से प्रारम्भ होता था उस में आजकल प्राता: काल में ही लाखों निरीह पशुओं की बलि ले ली जाती है । अहिंसा परमो धर्म: को अपना आदर्श बनाकर चलने वाले गांधीवादी कांग्रेसियों ने छद्म धर्मनिरपेक्षता के सामने गांधी की अहिंसा को भी नीलाम कर दिया। कैसे इस देश को अहिंसावादियों का देश कहा जायगा?

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