देश की समृद्धि व विकास में किसानों का योगदान

प्रमुख समाचार/संपादकीय

प्रो. डी.सी. सारण

भारतीय समाज की ये विसंगतियां और खुली धांधली किसान के शिक्षित, जागृत और संगठित होने के साथ ही समाप्त होने वाली है।

गांव और किसान के शोषण की व्यथा-कथाओं से इतिहस भरा पड़ा है। किसान शक्ति का योजनाबद्ध विभाजन और उसके आर्थिक स्रोतों को चूसने का सिलसिला अंग्रेजों ने शुरू किया था। अफसोस! स्वतंत्रता भारत के अपनों ने भी अलग-अलग रूपों में उसे बदस्तूर आज तक जारी रखा है। परंपरागत रूप में भारतीय समाज में किसानों का स्थान सम्मानपूर्ण था। गांव-शहर, कृषि-उद्योग व्यापार के बीच एक न्यायपूर्ण मानवीय रिश्ता था। खेती किसानों की आय का अधिकांश हिस्सा स्थानीय स्तर पर बंट जाता था। बढ़ई, लुहार, कुम्हार, नाई आदि वर्गों की पगार, शिक्षा व्यवस्था, सराय-धर्मशाला मंदिर-मस्जिदों के संचालन में काम आता था। किसानों की कमाई का एक मामूली अंश शहरों या राजदरबारों को जाता था। इस पुरातन राज-व्यवस्था में आर्थिक शोषण का अंश कम था। अंग्रेज नीतिकारों ने गांव किसान की परंपरागत व्यवस्था को एकदम तहस-नहस कर दिया। इसके स्थान पर जमींदारी व्यवस्था लाद दी गई तथा गांव किसानों के बीच के ही कुछ लोगों को जमींदार, जेलदार, बनाकर किसानों के साथ बर्बरता करने के लिए स्वच्छंद छोड़ दिया गया। जिन्होने लाल बाग और बेगार के साथ अपने ही गांव, समाज के किसानों के साथ सदियों तक मानमर्दन किया। जब-जब किसानों ने इन अमानवीय अत्याचारों का विरोध किया तब-तब किसानों के खून की नदियां बहीं। ब्रिटिश राज और देशी रियासतों के स्थानीय गुर्गे गैरों के हिमायती बनाकर अपनों पर जुल्म ढाते रहे।

इतिहास गवाह है कि भारतीय सामंत, व्यापारी एवं तथाकथित बुद्धिजीवियों ने गांव और किसान की न्यायपूर्ण लड़ाई में कभी साथ नहीं दिया। यहीं से ब्रिटिश शासकों को किसान की न्यायपूर्ण लड़ाई मे कभी साथ नहीं दिया। यहीं से ब्रिटिश शासकों को ताकतवर भारत समाज तोड़कर चार सौ साल तक बांटो और राज करो का अचूक हथियार मिला। अफसोस! आगे चलकर अंग्रेजों ने किसी को नहीं बख्शा। दुःखद पहलू यह भी है कि स्वतंत्र भारत के बाद की नीतियां भी खेती-किसानों के हक में काम करती नहीं दिखी, किसानों की उपज का वाजिब मूल्य निर्धारण की बात हो चाहे जमीन अधिग्रहण का मुद्दा किसानों के साथ आज तक न्याय नहीं हुआ। चाहे राष्ट्रीय और राज्य सरकारें किसी भी दल की रही हों

कीड़ा रोधी बीटी कौटन, बीटी बैगन और भिंडी में कीड़ों की अगली ग्लोबल कंपनियों के लाख दावों के बावजूद निर्बाध पनप रही हैं। किसानों की चुनी हुई अपनी सरकारें बीज कंपनियों के वकील की भूमिका में खड़ी नजर आ रही हैं। बीज बेचने वाले देशी-विदेशी व्यापारी ज्यादा मोटे दिखाई देने लगे हैं, जबकि किसान की जिल्लत की जिंदगी से निजात के लिए आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प ही नहीं दिखाई देता। सरकारी आंकड़े बोलते हैं कि भारत में कर्ज के बोझ तले हर घण्टे एक किसान आत्महत्या करने को मजबूर है। आसमान छूती महंगाई में भी बिचौलिए मौज मार रहे हैं, बड़े घराने, खुदरा व्यापार में उतर गये जिससे छोटे दुकानदार भी ज्यादा दिन महफूज रहने वाले नहीं हैं। सरकारें बाजार के कब्जे में है और बाजार चंद ताकतवर व्यापारिक घरानों के इरादों के अनुरूप व्यवहार कर रहा है। यह है भारत का सबसे बड़ा व्यवसाय कृषि और उस तिलस्म से उलझे भारतीय किसान की असली तस्वीर। वहीं दूसरी ओर किसानों की दुर्दशा, बेबसी और खुदकुशी से बेपरवाह काल्पनिक खुशहाली का सपना बेचने वाले बेहयाई से किसानो के लिए समृद्धि के टापुओं पर बाजार सजाये बैठे हैं। शर्मनाक बात यह भी है कि किसानों को भ्रमित करने के इस छद्म व्यापार में तथाकथ्ति प्रगतिशील या पढ़े लिखे भी जाने-अनजाने कंपनियों के एजेंटों का किरदार निभा रहे हैं। एक और गभीर चिंता और विचार का मुद्दा यह है कि कृषि विश्वविद्यालय और कृषि अनुसंधान केन्द्रो के वैज्ञानिक आज तक लैब से लैण्ड पर नहीं पहुंच पा रहा है। नतीजन किसानों को बीच खाद और कीटनाशी बेचने वाले दुकानदार जिनकी विगत सौ पीढि़यां कभी खेत नहीं गई वे खेती-किसानी के नुस्खे बेच रहे हैं। देश की आबादी ऑक्सीटोसिन युक्त दूध-सब्जियां, सेक्रीन से मीठा किये तरबूज पपीते जहर से उगाये अनाज दालें तथा अखाद्य मिलावट वाला घी तथा मावा खाने को तैयार रहे। हमें हर पल यह भी याद रखना होगा कि किसान की आर्थिक और सामाजिक बेहतरी भारतीय समाज की सहज समृद्धि के लिए भी आवश्यक है। चिरस्थायी विकास के लिए समाज का किसान फ्रेंडली होना समय का तकाजा है।

किसानों के शोषण के अनंत किस्सों से हर कोई वाकिफ है। शोषण की मिसालें ग्रंथों में नहीं समाती। समझदार किसान कहते हैं कि यदि हम खेती किसानी का कारोबारियों की भांति लेखा-जोखा रखना शुरू कर दे तो किसानों का काम बंद करना पड़ेगा। विकसित देशों में कृषि उत्पादों का उपभोक्ता किसान, गांव, घर और खेत जाता है। ठीक उसी प्रकार जैसे औद्योगिक उत्पादों के लिए किसान निकट बाजारों में जाते हैं। इस प्रकार नगरीय आबादी का गांव आना जाना बनेगा लेकिन यह तभी संभव है जब भारतीय किसान गेहूं और दूध के बजाय उनसे बनने वाले उत्पाद स्वयं तैयार कर विपणन करें। सही मायने मे भारत के किसान का सशक्तीकरण भी तभी संभव होगा।

;योग संदेश से साभारद्ध

 

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