टूटता पाषाण है, पाषाण के आघात से

संपादकीय

राकेश कुमार आर्य

गतांक से आगे…ये प्राविधान वास्तव में तो राज्य की
धर्मनिष्ठ राजनीति के प्रति निष्ठा की घोषणा है, परन्तु यह शब्द इसमें डाला नही गया है। यदि इनके साथ शीर्षक में ही यह स्पष्ट कर दिया जाता कि राज्य की धर्मनिष्ठ राजनीति के प्रति निष्ठा की घोषणा’ तो महर्षि का मन्तव्य पूर्णतः स्पष्ट हो जाता। इसका परिणाम ये होता कि व्यवहार में हमने भारतीय राजनीतिज्ञों को जिस प्रकार की अधर्म और अनीति की राजनीति को करते हुए देखा है वह कदापि नही होती।

अन्य नीति
निर्देशक तत्वः
संविधान का अनुच्छेद 39 (क) समान न्याय और निःशुल्क कानूनी सहायता की व्यवस्था करता है। महर्षि दयानन्द याज्ञवल्क्य (1/334) की इस व्यवस्था को मानते थे कि ‘‘राजा को अपनी प्रजा तथा सेवकों के साथ पितृवत व्यवहार करना चाहिए।’’ राजा को अपनी प्रजा के आमोद-प्रमोद में उसी प्रकार आनन्दित होना चाहिए जिस प्रकार एक पिता अपनी सन्तान के आमोद प्रमोद में आनन्दित होता है। श्री राम के विषय में रामायण में हमें ऐसा ही उल्लेख मिलता है। जो राम (देश का शासक वर्ग) अपने देशवासियों के प्रति ऐसा व्यवहार करते हैं वास्तव में वही उत्तम शासक होते हैं। ऐसे शासक समान न्याय की व्यवस्था करते हैं, और कोई भी व्यक्ति न्याय से वंचित न रह जाये इसलिए शासन की प्रचलित विधियों का ज्ञान कराने
के लिए उसे निःशुल्क विधिक सहायता दिलाने का प्रबन्ध राज्य करता है। क्योंकि कानून का पालन तभी सम्भव है जबकि कानून की सहायता सभी को निःशुल्क उपलब्ध हो। कानून का यथावत पालन कराना ही वास्तविक न्याय है। हमारे संविधान ने समान न्याय और निःशुल्क कानूनी सहायता हर एक नागरिक को उपलब्ध कराना आवश्यक और उचित माना है। संविधान का अनुच्छेद 42 कुछ दशाओं में काम शिक्षा तथा लोक सहायता पाने का अधिकार नागरिकों को देता है। यदि राज्य के भौतिक साधन अनुमति देंगे तो लोगों को काम का अधिकार दिया जायेगा। जिससे कि लोगों में बेकारी न फैलने पाये। बुढ़ापे और बीमारी की अवस्था में या अंग भंग की स्थिति में नागरिकों को आर्थिक सहायता देने की भी व्यवस्था यह अनुच्छेद करता है। यह अनुच्छेद संविधान की सामाजिक न्याय प्रदान करने की प्रतिबद्धता की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करता है। महर्षि के शब्दों में यह राजा का अपनी प्रजा के प्रति पितृवत व्यवहार ही कहा जायेगा। उसे ऐसे रक्षोपाय करते
रहना चाहिए जिनसे कि जनसाधारण के कष्ट दूर हों और राज्य में ‘जनहित’ की सर्वोपरिता सदैव बनी रहे। हमारे संविधान के अनुच्छेद 42 में काम की न्याय संगत और मानवोचित दशाओं तथा प्रसूति सहायता का उपबंध है। अनुच्छेद 43 में श्रमिकों-कर्मकारों का निर्वाह युक्त पारिश्रमिक, 43 (क) में औद्योगिक संस्थाओं के प्रबन्ध में श्रमिकों का भाग लेना, सुनिश्चित किया गया है। ये अनुच्छेद भी राजा के अपनी प्रजा के प्रति पितृवत व्यवहार की ओर हीहमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं।

(क्रमशः)

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