कोयला खदान घोटाला है आजादी की 65वीं वर्षगांठ पर संप्रग सरकार का राष्ट्र को उपहार

बिखरे मोती

विजेन्द्र सिंह आर्य
सीएजी की रिपोर्ट में अब तक का बंपर घोटाला (1.86 लाख करोड़ का) कोयला घोटाला सामने आया है। 2जी स्पैक्ट्रम घोटाला (1.76 लाख) से भी बड़ा यह घोटाला संप्रग सरकार का आजादी की 65वीं वर्षगांठ पर राष्ट्र को उपहार है। इसकी काली छाया में बोलते प्रधानमंत्री के भाषण का सारे देश ने बहिष्कार किया। स्कूली बच्चों को औपचारिकता निभाने के लिए इकट्ठा करके बैठाया गया। कुछ पार्टी कार्यकर्ता दिल्ली के लालकिले के मैदान पहुंचे और कुछ लोग शौकिया तौर पर पहुंचे। बस उन्हीं की उपस्थिति में देश के प्रधानमंत्री के द्वारा झण्डारोहण हो गया। लालकिले की प्राचीर ने इतना बेदम और बेढंगा भाषण अब से पूर्व कभी नही सुना।
बेदम इसलिए कि प्रधानमंत्री के भाषण में तनिक सा भी आकर्षण नही था, ओज नही था, जोश नही था, विपक्ष को ललकारने और शत्रु को कड़ा संदेश देने की कोई बात उस भाषण में नही थी। बाबा रामदेव व भ्रष्टाचार की काली छाया प्रधानमंत्री के सिर पर मंडराती रही और देश एक सहमे हुए से प्रधानमंत्री के सहमे हुए भाषण को सुनने के लिए मजबूर हुआ। भ्रष्टाचार का आतंक प्रधानमंत्री को आतंकित करता रहा सारी सुरक्षा व्यवस्था में लगे लोग और सुरक्षा कर्मी खूब चौकन्ने रहे पर प्रधानमंत्री के आतंक को समाप्त नही कर पाये।
प्रधानमंत्री का भाषण बेढंगा हम इसलिए मानते हैं कि इसमें महंगाई बढऩे के जिन कारणों पर प्रकाश डाला गया है वे, कतई बेढंगे थे। मौसम और मानसून की दगाबाजी को प्रधानमंत्री ने महंगाई बढऩे का प्रमुख कारण माना। जब वह इस बात का उल्लेख अपने भाषण में कर रहे थे, तो उनके सुनने वाले हंस रहे थे। एक प्रधानमंत्री देश के राष्ट्रीय दिवस पर जारी अपने संबोधन में ऐसा मजाक करेगा, यह किसी ने सोचा ही नही था। मौसम और मानसून के विषय में सब जानते हैं कि ये तो दोनों ही दो माह पुरानी बातें हैं, जबकि हुजूर की सरकार तो 8 वर्ष से भी अधिक पुरानी है। देश की जनता 8 वर्ष से जिस महंगाई से त्रस्त है, वह उसका उत्तर जानना चाहती थी, ना कि दो माह में मौसम और मानसून की दगाबाजी पर प्रधानमंत्री की बयानबाजी। प्रधानमंत्री के भाषण को सुनकर लोगों को लगा कि देश में सत्ता प्रतिष्ठान अब लोक की अभिव्यक्ति को किस प्रकार उपेक्षित कर रहे हैं? सचमुच यह भाषण लोगों को कांग्रेस से दो कदम और दूर कर गया।
अब कोयला घोटाला संप्रग सरकार के कफन में कील साबित होने जा रहा है। देश की जनता जागरूक है और वह नेताओं से अपना हिसाब किताब पाक साफ करना अच्छी तरह जानती है। 2014 का चुनाव अब दूर नही है। जनता संकल्प ले चुकी है, पर संकल्प के लिए विकल्प तलाश रही है। विकल्प मिलते ही जनता की माला उसी संभावित विकल्प की ओर स्वाभाविक रूप से ही चली जाएगी। मौसम और मानसून की दगाबाजी को महंगाई का सबसे बड़ा कारण मानने वालों को उस समय पता चलेगा कि जनता को बहकाने की कीमत क्या होती है?
सीएजी की रिपोर्ट पर भाजपा ने प्रधानमंत्री से इस्तीफा मांगा है। ये सब जानते हैं कि इस्तीफा मांगना एक राजनीति का खेल होता है। इस्तीफा मांगने से इस्तीफा नही दिया जाता है। लेकिन फिर भी बहुत सी बातें ऐसी होतीं हैं, जो दीखने में औपचारिकता सी लगती हैं, लेकिन वास्तव में उनके पीछे लोकशक्ति एक शक्ति बनकर खड़ी होती है। भाजपा की प्रधानमंत्री से इस्तीफा लेने की मांग के पीछे लोकशक्ति की शास्ति है। जनता मानो देश की संसद में घुसकर भाजपा की आवाज में आवाज मिलाकर प्रधानमंत्री से इस्तीफा मांग रही थी। उसे प्रधानमंत्री ने और उनकी पार्टी ने अनसुना कर दिया। अन्ना के अनशन की तरह तो यह सरकार की जात नही है, क्योंकि सरकार को आवाज-ए-आवाम का अंदाज हो चुका है। वह घबराई हुई हैं। घबराई हुई सरकार से बहुत अच्छे कार्यों की आशा नही की जा सकती। कोयला घोटाला से देश को एक लाख 86 हजार करोड़ का नुकसान हुआ है, लेकिन कांग्रेस को कितना होगा? यह 2014 के आम चुनावों के परिणामों से पता चल जाएगा। अभी तो इतना ही कहा सकता है कि कांग्रेस के लिए कोयला घोटाले ने खतरे की घंटी बजा दी है।

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