कोई धर्म राष्ट्रीय धर्म से बड़ा नहीं

राजनीति

अब्दुल रशीद
हम एक ऐसे सनसनीखेज़ दौर से गुजऱ रहे हैं जहां बहुत मुमकिन है अफ़वाहों का तेज़ी से बढना। लेकिन यह भी सच है कि इस दौर मे ऐसे तमाम माध्यम उपलब्ध है जिससे अफ़वाहों की हक़ीकत को जाना जा सकता है वो भी चंद मिनटों में। तब कैसे कुछ लोग तबाही का जाल बुनकर देश के अमन चैन को तार तार करने मे कामयाब हो जा रहे है? इन सबके लिए सिफऱ् सरकारी तन्त्र की विफलता कह कर पल्ला नहीं झाडा जा सकता है। कहीं न कहीं वे लोग भी जि़म्मेदार हैं जो जाने अनजाने में देश के दुश्मनों के मनसूबे को कामयाब करने मे मददगार साबित हो रहे हैं । कोई धर्म राष्ट्रीय ध्रर्म से बडा नहीं होता, कारण जब राष्ट्रीय धर्म निभाते हैं तो सदभावना अमन चैन और खुशी के पैरोकार हो कर अपना दायित्व निभाते हैं। लेकिन जब हम किसी धर्म को ही अपना विचार बना लेते हैं तब हम स्वार्थी हो जाते हैं। कहते हैं धर्म का नशा अफ़ीम से भी ज़्यादा होता है यह नशा और भी गहरा तब हो जाता है जब इन्सान जाहिल हो। और इसी जहालत का फ़ायदा उठाकर देश द्रोही प्रवृति के लोग आम जनता को धर्म का अफ़ीम चटाकर अपना मक़सद पूरा करने मे क़ामयाब हो जाते हैं। सबसे ज़्यादा निन्दनीय और दुखद बात तो यह है कि कुछ बुद्धिजीवी लोग भी इसमे शुमार हो जाते हैं। पुर्वोत्तर मे जो हुआ वह यकिऩन गलत हुआ लेकिन उसके बाद देश के कोने कोने मे रहने वाले पुर्वोत्तर के लोगो के साथ जो हुआ वह न केवल गलत हुआ बल्कि यह घटना जहां एक ओर इस देश के कथित धार्मिक बुद्धिजीवी वर्ग की योग्यता को कटघरे में खड़ा करता है वहीं सरकारी तन्त्र कि विफलता को भी झलकाता है। जो वक़्त रहते कोई सख्त कदम नही उठा सके। किसी भी समस्या का हल जंग नहीं होता इस दुनिया मे उदाहरणो की कमी नहीं, हिरोशिमा का हश्र सबने देखा है।धर्म और नफऱत के आधार पर बने मुल्क़ का हश्र भी दुनिया के सामने है इसके बावजूद लोग गुमराह हो रहे हैं,यह बेहद अफ़्सोस जनक बात है। हम आज़ाद हैं इसका कतई यह मायना नही होना चाहिए कि हम अपनी मंजूरी से हर फ़ैसला ले सकते हैं। आप अपने नीजि फ़ैसले लेने के लिए स्वतन्त्र हैं लेकिन जिस फ़ैसले से देश की अखण्डता खण्डित हो ऐसा फ़ैसला लेने का किसी वर्ग विशेष के चन्द लोगों को हक़ नहीं, जऱा सोचिए क्या गुजऱी होगी उन लोगो पर, जो अफ़वाह के बाद अफऱा तफऱी के शिकार हुए। यह मुल्क़ जितना आपका है उतना उनका भी है हमारा देश है हम सभी को हक़ है देश से उम्मीद लगाने का कि हम सबकी हर जायज़ बात पूरी हो लेकिन इससे पहले हम सभी को इस बात पर गम्भीरता से विचार करना होगा कि हमने अपने देश के लिए क्या किया है? कोई अपने पुरखों द्वारा किये गए अमूल्य योगदान की बदौलत यदि कुछ चाहता है तो यह बात न केवल आपके पुरखों के रष्ट्रभक्ति का अपमान है बल्कि आप की जहालत को भी दर्शाता है। यह वह मुल्क जहां एक अल्पसंख्यक देश के सर्वोच्च पद पर बैठता है, यह वह मुल्क है जहां डाकिया का बेटा क्रिकेट का कप्तान बनता है, यह वह मुल्क है जहां के वीरसपूत चांद पर पहुंच कर अपने देश के प्रधानमंत्री के पुछने पर के वहां से भारत कैसा लगता है तो जवाब आता है सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा। जहालत से निकलकर देश के दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब दीजिए। और देश के बेहतरी के लिए कदम बढाईए।

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