उत्तर प्रदेश में गरमाता चुनावी माहौल

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उत्तर प्रदेश देश का एक महत्वपूर्ण प्रांत है। देश की राजनीति को इसने आजादी के बाद से ही निर्णायिक दिशा दी है। हर क्षेत्र में इसकी अहम भूमिका रही है, पर फिर भी इस प्रदेश का उतना विकास नहीं हो पाया है, जितना कि होना चाहिए था। दो चार साल मुख्यमंत्री रह लेने वाला हर व्यक्ति प्रदेश को छोड़कर देश की राजनीति की ओर चलने लगता है। यहाँ के मुख्यमंत्री का शरीर लखनऊ में रहता है पर, दिल दिल्ली में रहने लगता है। इसलिए प्रदेश की जनता नेताओं की दोहरी मानसिकता के झूले में ही झूलती रह जाती है।
काँग्रेस के एन॰डी॰तिवारी, कमलापति त्रिपाठी, वी॰पी॰सिंह भाजपा के कल्याणसिंह और राजनाथसिंह, सपा के मुलायम सिंह यादव और अब बसपा की सुप्रीमो मायावती सभी एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं। इन्हें प्रदेश से अधिक देश की राजनीति में अपने दखल की चिन्ता रही है। मायावती अपनी सरकार की मुखिया रहते एक बार में ही पूरे पाँचवर्ष का कार्यकाल पूर्ण करने वाली मुख्यमंत्री होंगी। उन्होने अपनी कार्यशैली से सिद्ध कर दिया है कि वह किस प्रकार दमदार निर्णय ले सकती हैं और यह भी कि उन्हें अपने विरोधियों के विरोध की कोई चिन्ता नहीं है। इसलिए देश की राजनीति में दखल देने की उनकी महत्वाकांक्षा और भी बढ़ जाती है।
राजनीति में रहकर महत्वाकांक्षी होना कोई बुरी बात नहीं है। राजनीति एक जुआ का खेल है, जब तक जुआ में आप जीत रहे हैं तब तक आप दाव पर दाव लगाते चले जाते हैं। क्योकि बराबर मिल रही सफलता आपको प्रोत्साहित करती जाती है। यही हाल राजनीति का है, यहाँ यदि आपके लिए लगातार तालियाँ बज रही हैं, तो आपको भाजपा वाला ‘फीलगुड’ बना रहेगा। वास्तव में यह ‘फीलगुड़’ की बीमारी भाजपा की देन नहीं है, अपितु यह राजनीति की देन है और मायावती इसी बीमारी से ग्रस्त होकर लखनऊ से दिल्ली कूच करना चाहती हैं, जिसका उन्हें हक है।
कु॰मायावती ने बड़ी सावधानी से प्रदेश के माहौल में राजनीति को चुनावी रंगत देकर गरमाने की कोशिश कि है। जिसे भाजपा, सपा, काँग्रेस या कोई भी राजनीतिक दल काटने की स्थिति में नहीं है। प्रदेश में बसपा फिलहाल ऊपर है, और लगता है कि थोड़ी बहुत कम सीटों के साथ बसपा फिर अपनी सरकार बनायेगी। काँग्रेस के पास एक चेहरा राहुल गांधी के रूप में है, पर उस चेहरे के पास अपना चिंतन नहीं है। काँग्रेस एक परिवार के नाम पर चुनाव जीतना चाहती है, पर अब एक परिवार की परिक्रमा के दिन लद गये लगते हैं। नेहरू, इन्दिरा, राजीव तीनों ही कहीं तक चिन्तनशील व्यक्तित्व के धनी थे। इसलिए जनता उनकी ओर आकर्षित होती थी, पर राहुल के पास यह शक्ति नहीं है।
भाजपा अपनी ही दुनिया में मस्त है। उसके पास पहली बार कोई मुद्दा नहीं है। बहुसंख्यकों के साथ उसने जो छल किया था, उसके ‘पापबोझ’ से वह स्वयं ही टूट रही है, पर मानने को तैयार नहीं है। भाजपा की फजीहत को कल्याणसिंह भी चार जूते लगाने को तैयार बैठे हैं। वह स्वयं जानते हैं कि उनके लिए अभी “दिल्ली दूर है” पर वह दिल्ली को भाजपा जैसी ‘बिल्ली’ की झपट से भी दूर करने के मकसद को लेकर चुनाव में उतर रहे है। भाजपा चाहे कल्याणसिंह को कुछ भी मान रही हो, पर यह सच है कि कल्याणसिंह के बिना भाजपा आज भी सूनी सूनी सी है। कल्याणसिंह राजनीति में अपने बेटे को स्थापित कर रहे है और उनकी जनक्रांति पार्टी इन चुनावों में जितना भी पा लेगी वह उनके लिए उपलब्धि ही होगी। सपा की छवि प्रदेश में ‘गुंडातत्वों’ को प्रोत्साहित करने वाली पार्टी के रूप में रही है। इसलिए अब साधारण आदमी उसकी ओर देखने को तैयार नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में प्रदेश की जनता के सामने मायावती ही एक विकल्प बचती और बनती नजर आ रही हैं। इसलिए चुनाव के गरमाते माहौल का शुरुआती रुझान बसपा के साथ होता नजर आ रहा है।

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