उगता भारत के दो वर्ष पूर्ण होने पर पाठकों के प्रति आभार अभिव्यक्ति-देखा नहीं अवलंब तुम सा अन्य है

प्रमुख समाचार/संपादकीय

सुबुद्घ पाठकवृन्द!
आपके प्रिय समाचार पत्र उगता भारत के दो वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। इस पावन अवसर पर मेरा धर्म मुझे प्रेरित कर रहा है कि आपके प्यार और आशीर्वाद का आभार व्यक्त करूं। डा. राधाकृष्णन ने कहा था कि ईश्वर के अस्तित्व में दृढ़ आस्था होने से जो आचरण स्वभावत: होने लगता है, धर्म उसी को जीवन का आदर्श बनाने की आज्ञा देता है। वह कहते हैं कि ईश्वर की सत्य और पवित्रता के साथ सेवा करना और जीवन की सभी घटनाओं में उसकी आज्ञाओं का श्रद्घापूर्वक पालन करना ही यथार्थ धर्म है।
सचमुच इस पावन बेला में मेरे लिए ईश्वरीय आज्ञा है जिसे मेरे हृदय का तार-तार और पूरा उगता भारत परिवार बड़ी श्रद्घा से अनुभव कर रहा है। दो वर्ष के बीते हुए समय में आपका प्यार और आशीर्वाद ही वह पतवार बना जिसके सहारे हम आज तीसरे वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं।
हमें मालूम है कि देश में हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्रों की भरमार है। ऐसे में अपना स्थान बनाना तो दूर खोजना भी कठिन है। लेकिन फिर भी उगता भारत समाचार पत्र चलाया गया। एक चुनौती थी, इसे चलाना। वह चुनौती सरल होती गयी, उसकी बर्फ पिघलती गयी जब उस पर आपके प्यार और आशीर्वाद की हल्की हल्की धूप लगी। आपके ताप ने हमें हौंसला दिया और हम आगे बढ़े। चुनौती आज भी है और कल भी रहेगी लेकिन हम यह भी जानते हैं कि हमारे साथ आप कल भी थे, आज भी हैं और कल भी रहेंगे। ईश्वर की कृपा सर्वत्र बिखरी है, उसी के नूर को आपके प्यार और आशीर्वाद में जब उतरते देखता हूं तो हृदय कहने लगता है :- हर दिल की धड़कन बोल रही-प्रभु धन्यवाद प्रभु धन्यवाद। आपके प्रति धन्यवाद के इन शब्दों को लिखते हुए मुझे गार्डनर के ये शब्द याद आ रहे हैं:-कृपया और धन्यवाद ये छोटी रेजगारी हैं, जिनके द्वारा हम सामाजिक प्राणी होने का मूल्य चुकाते हैं, ये ऐसे शिष्टïाचार हैं, जिनके द्वारा हम जीवन यंत्र को स्नेहयुक्त तथा चालित रखते हैं।
हम सामाजिक प्राणी हैं और इसलिए अपना मूल्य चुका रहे हैं।
आपके प्यार और आशीर्वाद का भार हम पर है, उसी को हम आभार के रूप में व्यक्त कर रहे हैं। हमें आशावादी होना चाहिए कि जैसे सूर्य से वनस्पतियों को जीवन प्राप्त होता है, वैसे ही हमें आशा है कि आपका प्यार और आशीर्वाद हमें इस विषय में भी जीवन प्रदान करता रहेगा। मैथिलीशरण गुप्त की इन पंक्तियों के साथ अपनी बात खत्म करता हूं :-
बीती नहीं यद्यपि अभी तक हैं निराशा की निशा।
है किंतु आशा भी कि होगी दीप्त फिर प्राची दिशा।।
महिमा तुम्हारी ही जगत में धन्य आशे धन्य है।
देखा नहीं कोई कहीं अवलम्ब तुम सा अन्य है।।

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